लातेहार। 22 जुलाई 2025 को संयुक्त ग्राम सभा मंच, बरवाडीह (लातेहार) द्वारा वन अधिकार कानून (2006) के तहत लंबित सामुदायिक एवं व्यक्तिगत दावों को लेकर लातेहार जिला मुख्यालय स्थित कल्याण विभाग परिसर में एक जन सुनवाई कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस जन सुनवाई में लातेहार और गढ़वा जिले के विभिन्न प्रखंडों – गारू, मनिका, बरवाडीह, और चिनिया से हजारों आदिवासी और ग्रामीण महिला-पुरुष शामिल हुए। कार्यक्रम का आयोजन संयुक्त ग्राम सभा मंच और ग्राम स्वशासन अभियान के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
नरेगा वॉच के राज्य समन्वयक जेम्स हेरेंज ने जन सुनवाई में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि बरवाडीह प्रखंड सहित लातेहार के सभी प्रखंडों में कई व्यक्तिगत, सामुदायिक, और वन संसाधन अधिकार के पट्टे लंबित हैं। उन्होंने कहा कि अनुमंडल स्तरीय समिति में जमा हुए दावों में भारी कटौती की गई है।

उन्होंने बताया कि बरवाडीह प्रखंड के 22 गांवों से सामुदायिक अधिकार के लिए कुल 1,60,505 एकड़ भूमि के दावे किए गए थे, लेकिन इनमें से केवल 2.7 एकड़ भूमि ही स्वीकृत हुई। यानी सामुदायिक वन अधिकार के दावों में 99.99% की भारी कटौती की गई, और 0.1% से भी कम भूमि ग्राम सभाओं को स्वीकृत हुई।
हेरेंज ने आगे कहा कि लातेहार जिले में अनुमंडल और जिला स्तरीय वन अधिकार समितियों में लगभग 98 सामुदायिक और 1,700 व्यक्तिगत वन अधिकार दावे लंबित हैं। व्यक्तिगत वन अधिकार दावों में भी कटौती का सामना करना पड़ा है। उदाहरण के लिए, गुआ और ततहा गांवों से क्रमशः 92.6 एकड़ और 85.9 एकड़ भूमि के लिए 31 व्यक्तिगत दावेदारों ने आवेदन किया था, लेकिन इनमें क्रमशः 79.9% और 39.9% की कटौती की गई। बरवाडीह प्रखंड के 11 गांवों से 295 दावेदारों के 580 एकड़ भूमि के दावे, जो 2017 से 2023 के बीच जमा किए गए थे, अब तक लंबित हैं।
उन्होंने कहा कि वन विभाग द्वारा आवेदनों में देरी और दावों की कटौती तो की ही जा रही है, लेकिन अनुमंडल स्तरीय समिति द्वारा अनुशंसित 135 व्यक्तिगत दावों को जून 2019 में स्वीकृति मिलने के बावजूद दावेदारों को आज तक पट्टे नहीं मिले हैं।
हेरेंज ने जोर देकर कहा कि आदिवासी और मूलवासियों ने जंगलों को बचाया है, इसलिए लातेहार में सबसे अधिक वन भूमि बची है, न कि वन विभाग के कारण। उन्होंने आरोप लगाया कि पूंजीपतियों को खदान खोलने के लिए आसानी से जमीन मिल जाती है, लेकिन आदिवासियों और मूलवासियों को वर्षों तक व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार नहीं दिए जा रहे।
जन सुनवाई में जिला परिषद सदस्य, बरवाडीह पूर्वी, कन्हाई सिंह ने कहा कि वन विभाग के अधिकारी कानून के कार्यान्वयन में कोताही बरत रहे हैं और जंगल बचाने के नाम पर केवल खानापूर्ति कर रहे हैं। इसके विपरीत, संयुक्त ग्राम सभा ने बरवाडीह के 16 गांवों के जंगलों में सीड बॉल के माध्यम से 20,000 से अधिक पौधों का रोपण किया है, जिसमें डोरी, साल, बेर, कटहल सहित 13 प्रकार के पौधे शामिल हैं। इससे मनुष्यों और जानवरों की आजीविका सुरक्षित होने के साथ-साथ जंगलों में वृक्षों की वृद्धि हो रही है। इसके अलावा, जंगलों में आग बुझाने के लिए भी कई प्रयास किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट आयुक्त के पूर्व राज्य सलाहकार बलराम ने कहा कि वन अधिकार कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है और दावों में भारी कटौती की जा रही है। उन्होंने मांग की कि दावों की स्वीकृति के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय की जाए और वन विभाग की जवाबदेही सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा कि वन विभाग हमेशा से जंगल और समुदाय का दुश्मन रहा है, जबकि जल-जंगल-जमीन ग्राम सभा के अधीन हैं।
कार्यक्रम में कई ग्रामीणों ने वन अधिकार कानून की जमीनी हकीकत, विभिन्न समस्याओं, और वन विभाग के दुर्व्यवहार और उत्पीड़न की स्थिति पर अपनी बात रखी। ग्रामीणों ने बताया कि वन विभाग के अधिकारी उन्हें डराते हैं और जो लोग अपने पशुओं को जंगल में ले जाते हैं या लकड़ी काटते हैं, उनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। यहाँ तक कि लोगों के टांगी, कुल्हाड़ी, और कुदाल जैसे औज़ार भी वन विभाग के लोग छीन लेते हैं।
ग्रामीण श्यामा ने कहा कि हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहना होगा, क्योंकि बिना संघर्ष के वन अधिकार कानून के तहत पट्टे नहीं मिलेंगे।
जन सुनवाई में उपस्थित अनुमंडल पदाधिकारी अजय रजक ने बताया कि अनुमंडल कार्यालय दावों की अनुशंसा कर जिला स्तर पर भेज देता है। अब तक जिले में 200 से 250 व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार के आवेदन प्राप्त हुए हैं। नियमों के अनुसार, सभी को पट्टे दिए जाएंगे। दावों में भारी कटौती के सवाल पर उन्होंने कहा कि ये दावे उनके कार्यकाल से पहले के हैं, और इस मामले की जाँच की जाएगी। साथ ही, 100 से अधिक सामुदायिक दावे भी लंबित हैं।
अनुमंडल पदाधिकारी ने आश्वासन दिया कि अनुमंडल स्तरीय समिति कार्रवाई कर जिला स्तरीय वन अधिकार समिति को दावे भेजेगी, ताकि आदिवासी दिवस, 9 अगस्त 2025 को सामुदायिक और व्यक्तिगत दावों का वितरण किया जा सके।
इस आश्वासन पर जिला परिषद सदस्य कन्हाई सिंह ने कहा कि यदि 9 अगस्त को वन भूमि पट्टे नहीं मिले, तो वे जन आंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे।
जन सुनवाई में सामाजिक और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता सुनील मिंज, दीपक बाड़ा, भूखन सिंह, कविता सिंह खरवार, श्यामा सिंह, महावीर परहिया, बालकी सिंह, मनीता कुमारी खरवार सहित हजारों की संख्या में आदिवासी और अन्य परंपरागत समुदाय के लोग शामिल थे। इसके साथ ही विभिन्न गांवों के ग्राम सभा के प्रधान, वन अधिकार समिति के अध्यक्ष, और सचिव भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन विमल सिंह ने किया, और धन्यवाद ज्ञापन मिथिलेश कुमार ने किया।
(झारखंड से विशद कुमार की रिपोर्ट)