मिर्ज़ापुर के सियासती रण में पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल की एंट्री की घोषणा ने बढ़ाया टेंपरेचर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से तीन सौ किमी की दूरी पर स्थित राज्य के आखिरी छोर पर स्थित मिर्ज़ापुर जिला मध्य-प्रदेश की सीमा से लगा हुआ अपने धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक महत्वों को लेकर तो जाना ही जाता है उससे भी कहीं ज़्यादा पिछड़ेपन और अपने राजनैतिक उठा-पटक को लेकर सुर्खियों में रहा है। एक लोकसभा सीट, पांच विधानसभाओं वाले मिर्ज़ापुर जि़ले में दो विधान परिषद सदस्य तथा एक राज्यसभा सदस्य सहित दो मंत्री (एक केंद्रीय राज्यमंत्री, दूसरे यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री) भी हैं। इस प्रकार से देखा जाए तो सत्ता से जुड़े हुए यहां 9 जनप्रतिनिधि हैं।

सभी ‘अपने’ साथ ‘अपनों’ को लेकर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए हाथ-पैर मारने में जुटे हुए हैं, ऐसे समय में मिर्ज़ापुर के सियासती रण में एक पूर्व आईएएस अधिकारी के तौर पर दिव्या मित्तल की इंट्री की घोषणा ने यहां का सियासती तापमान हाई किए हुए है।

मौजूदा समय में जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली को लेकर बात करें तो कुछेक को छोड़ कर सभी के जुबां पर बदलाव कि ही बयार चल रही है। कुछ लोग ‘दल’ को तो महत्व देते हैं, लेकिन मौजूदा ‘चेहरे’ को  बदलने की बात करते हैं। ऐसे समय में लहुरियादह गांव जो आजादी के बाद से नल की टोटियों से पानी की एक बूंद के लिए तरसता आया था वहां पानी पहुंचा कर लहुरियादह पहाड़ी गांव सहित पूरे जिले में छा जाने वाली मिर्ज़ापुर की तत्कालीन जिलाधिकारी रहीं दिव्या मित्तल चुनावी चर्चा के केंद्र बिंदु का मजबूत हिस्सा बन चुकी हैं।

मिर्ज़ापुर को अपनी कर्मभूमि बनाने और सियासती रण में उतरने की घोषणा के साथ अब इस बात की चर्चा जोर-शोर पर है कि, दिव्या मित्तल 2027 का विधान सभा चुनाव नगर विधानसभा सीट से लड़ने के साथ 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जोर-शोर से जुटेंगी, ‌चूंकि चुनाव लड़ना उनके लिए न केवल जुनून बल्कि उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ प्रश्न बना हुआ है। 

बीते माह की मंगलवार, 29 सितंबर को राजनैतिक पारी की शुरुआत की घोषणा करते हुए उन्होंने दल से दूरी रखते हुए भविष्य की संभावनाओं को उन्होंने उजागर नहीं किया है, लेकिन अपनी मंशा साफ़ कर दी है कि वह चुनाव लडे़ेंगी। 

राजनीति के रणनीतिकार बताते हैं कि दिव्या मित्तल शारदीय नवरात्र में मिर्ज़ापुर में पैर रखते हुए मां विंध्यवासिनी देवी की नौ दिनों तक आराधना करेंगी। इसके बाद वह अपनी गतिविधियों को मुकाम तक पहुंचाने में जुट जाएंगी।

‘जनचौक’ ने इन्हीं मुद्दों पर मिर्ज़ापुर नगर क्षेत्र के लोगों की नब्ज़ को टटोलने का प्रयास किया है कि दिव्या मित्तल की मिर्ज़ापुर से राजनीतिक एंट्री कैसी होगी, जिस पर लोगों ने अपनी मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

मिर्ज़ापुर नगर निवासी तथा वैश्य महासम्मेलन के पूर्व जिलाध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता कहते हैं, “दिव्या मित्तल किसी दल से चुनावी मैदान में आती हैं तो निश्चित ही उन्हें सफ़लता हाथ लग सकती है, वरना निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर यहां का किला भेद पाना कठिन है।”

अधिवक्ता मधुकर मिश्रा बडे़े बेबाकी से कहते हैं कि दिव्या मित्तल लोकसभा चुनाव में मैदान में उतरने की तैयारी करती हैं तो निश्चित तौर पर उनका पुरा समर्थन होगा।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात मिश्रा, बोलते हैं “अभी यह तय कर पाना कठिन है कि दिव्या मित्तल की दिव्यता का असर होगा या नहीं इसके लिए पहले वह जिले में पदार्पण तो करें!”

वहीं संजय तिवारी का कहना है कि, दिव्या मित्तल जिले से चुनाव लड़ेंगी तो यह बेहतर होगा, क्यों कि वह जिले में एक जिलाधिकारी के तौर पर यहां चुकी हैं, यहां की नब्ज़ वह समझ चुकी हैं, प्रशासनिक कार्यकुशलता उनके काम में कारगर साबित होती। सो, वह जिले के लिए एक बेहतर विकल्प और जनप्रतिनिधि के तौर पर चुनी जाती है तो सभी के लिए बेहतर होगा‌।

किन मुद्दों पर वह दिव्या मित्तल को चुनना चाहते हैं के सवाल पर वह बोलते हैं, “दिव्या मित्तल एक आईएएस अधिकारी रहीं हैं, इसके पूर्व लंदन के एक बडे़े पैकैज को त्याग कर उन्होंने वतन लौट सिविल सेवा में आई थी। अब राजनीति में आ रही हैं तो निश्चित तौर पर उनके अनुभवों और कार्य कुशलता का लाभ जनपद को पारदर्शी विकास के तौर पर मिलेगा।”   

राष्ट्रवादी मंच संयोजक अध्यक्ष मनोज श्रीवास्तव दिव्या मित्तल का मिर्ज़ापुर से चुनाव लड़ने के फैसले का स्वागत यह कह कर करते हैं कि वह उनका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन वह जोड़ते हैं, “यदि उनकी ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता की बात होती है तो मैं कत्तई नहीं मानता की वह पारदर्शी थीं। वह कहते हैं क्या उनके कार्यकाल में मिर्ज़ापुर में अवैध खनन, भ्रष्टाचार, भूमाफियाओं का बोलबाला नहीं रहा, कितनी शिकायतों पर उन्होंने कार्रवाई की है बताएं?

वह आगे बोलते हैं कि सिवाय लहुरियादह गांव में पानी पहुंचाने के अलावा उनका कोई और दर्शनीय काम नहीं रहा है जिले में, सोशल मीडिया ने उन्हें शेर बनाया है।”

सियासत का रण बनेगा ‘लहुरियादह’ 

मिर्ज़ापुर की राजनैतिक सरगर्मियां के बीच दिव्या मित्तल की एंट्री की घोषणा ने लहुरियादह को भी केन्द्र बिन्दु में बनाए रखा है। लहुरियादह गांव के लोग दिव्या मित्तल के चुनाव लड़ने की घोषणा से गदगद हैं, तो वहीं जिले के अन्य हिस्सों में इस बात की भी बहस छिड़ी हुई है कि लहुरियादह पहाड़ी पर पानी पहुंचा कर एक तरह से उन्होंने यहां के जनप्रतिनिधियों के नकारेपन को भी उजागर कर दिया था।

इसके बाद श्रेय लेने की होड़-सी लगी और इनके (दिव्या मित्तल) के स्थानान्तरण के बाद इसका पटाक्षेप तो जरुर हुआ लेकिन लहुरियादह गांव के लोगों ने दिव्या मित्तल को जो प्यार सम्मान दिया वह एक लकीर बन कर उभरा है। बता दें कि संभवतः तत्कालीन जिलाधिकारी दिव्या मित्तल मिर्ज़ापुर की शायद ऐसी पहली डीएम रही होगी जिनके स्थानान्तरण के बाद लोगों ने दिव्या मित्तल का भरपूर सम्मान करते हुए उन्हें गुलाब के फूलों से लाद दिया था। 

मिर्ज़ापुर आजाद होगा या चारागाह ही बना रहेगा?

मौजूदा राजनीतिक सरगर्मियों के बीच एक बार फिर से यह मुद्दा भी तेज़ हो उठा है कि क्या मिर्ज़ापुर आजाद होगा या चारागाह ही बना रहेगा? लोगों का कहना है कि पंडित लोकपति त्रिपाठी से लेकर पूर्व दस्यु सुंदरी फूलन देवी, वीरेन्द्र सिंह मस्त, दस्यु ददुआ के छोटे भाई बालकुमार पटेल, अनुप्रिया पटेल तक ने मिर्ज़ापुर से लोकसभा चुनाव लड़कर अपनी राजनैतिक छवि को मजबूत बनाया है। पूर्व सांसद पंडित उमाकांत मिश्र के बाद ऐसा कोई चेहरा क्या किसी दल को नजर नहीं आया है जो मिर्ज़ापुर की नुमाइंदगी कर सके?”

वरिष्ठ समाजसेवी एवं गांधीवादी विचारक अरुण मिश्रा तंज़ कसते हुए कहते हैं, कि, “मिर्ज़ापुर बाहरी लोगों के लिए चारागाह बन चुका है, यहां की हरी भरी वादियां, सभी को भा जातें हैं, लेकिन बात जब विकास की होती है तो उन्हें सर्वप्रथम अपना और अपनों का विकास पहले ज्यादा नज़र आता है।”

आईएएस से सियासत तक: ‘पानी वाली डीएम’ दिव्या मित्तल का मिर्जापुर में क्यों नहीं टूट रहा नाता? 

2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के 13 साल की अविस्मरणीय यात्रा को विराम देने के बाद पूर्वांचल की सियासत में भूचाल आ गया है। 30 अगस्त को इस्तीफा और 14 सितंबर को मंजूर होने के बाद 29 सितंबर 2026 को सुबह 8.30 बजे फेसबुक पर उनका वीडियो “यूपी में ही रहूंगी, डरूंगी नहीं, सवाल करूंगी, मुझे बाहुबल नहीं चाहिए” ने मिर्जापुर से देवरिया तक सियासी पारा हाई कर दिया है। ‘जनचौक’ की ग्राउंड पड़ताल में अब तक सबसे बड़ा सवाल यही उभर कर आया है कि ट्रांसफर के बाद भी मिर्जापुर में उनका ठौर क्यों बना रहा? हालांकि इसके पीछे बच्चों की पढ़ाई की पढ़ाई को बड़ा कारण बताया जा रहा है।

कौन हैं दिव्या मित्तल?

हरियाणा के रेवाड़ी में जन्मीं, 1983 में जन्म, आईआईटी दिल्ली से बी. टेक, आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए, लंदन में जेपी मॉर्गन में ऊंचे पैकेज की नौकरी छोड़कर देश सेवा के लिए लौटीं। 2012 में यूपीएससी क्रैक कर पहले आईपीएस और अगले प्रयास में 2013 में आईएएस बनीं। मेरठ में जॉइंट मजिस्ट्रेट से प्रशासनिक शुरुआत, गोंडा में मुख्य विकास अधिकारी, फिर संत कबीर नगर, विंध्याचल मंडल, मिर्जापुर और देवरिया में जिलाधिकारी। इस्तीफे से पहले लखनऊ में राजस्व विभाग में विशेष सचिव थीं। 

सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय

कभी यूपीएससी छात्रों को टिप्स, कभी किताबों की चर्चा। खुद उन्होंने लिखा था “मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आई हूँ, सच यह है कि सबसे ज्यादा मैंने ही पाया।”

लहुरियादह: 75 साल बाद पानी और आज भी उम्मीद

मिर्जापुर के ड्रमंडगंज थाना क्षेत्र में मध्य प्रदेश सीमा से सटे पहाड़ पर बसा लहुरियादह गांव 1200 आबादी, कोल, धरकार और यादव बिरादरी। आजादी के 76 साल बाद यहां नल से जल पहुंचा तो इसका श्रेय दिव्या मित्तल को जाता है। 29 अगस्त 2023 को तत्कालीन डीएम खुद अधिकारियों के साथ पहुंची थीं। पाइप लाइन बिछी, टैंकर और झरने से मुक्ति मिली। 75 वर्षीया दुईजी देवी ने तब उनके सिर पर हाथ रखकर कहा था – “जुग जुग जियो बिटिया”। आज भी दुईजी कहती हैं “हम चाहथईन वो चुनाव लड़ै, हमइ भर नाही पूरा गांव डीएम साहेब के वोट देई।” उनके बेटे रमेश, राजकली, कृष्णा वर्मा, श्यामकलिया सभी यही कहते हैं। लालबहादुर, हीरालाल यादव बताते हैं – “जो काम पूर्व अधिकारी न कर सके, वो दिव्या मित्तल ने कर दिखाया।”

लेकिन दूसरा पहलू भी है। इसी गांव में 2023 में ग्रामीणों की मांग पर उच्च प्राथमिक विद्यालय का आश्वासन दिया गया था, 22 लाख की राशि अगस्त 2025 में स्वीकृत भी हो गई, पर निर्माण अधर में रहा है। पूछे जाने पर बीएसए अनिल कुमार वर्मा वही रटा-रटाया जवाब देते रहे हैं – “शीघ्र ही शुरू करा दिया जाएगा। लेकिन जैसे ही दिव्या मित्तल कि सोशल मीडिया पर इसी स्कूल को लेकर वीडियो वायरल होता है, निर्माण कार्य शुरू कराने का ढोंग शुरु कर दिया जाता है।”

दिव्या मित्तल के वीडियो जारी करने के बाद उच्च प्राथमिक विद्यालय का निर्माण शुरू होना और वन विभाग कि पेंच 

29 सितंबर 2026 को मिर्जापुर की पूर्व जिलाधिकारी दिव्या मित्तल द्वारा वीडियो जारी कर लहुरियादह गांव में तीन वर्ष बाद भी स्वीकृत उच्च प्राथमिक विद्यालय का निर्माण कार्य नहीं शुरू कराया जाने का जिम्मेदारों पर आरोप लगाया गया। जिसके ठीक दूसरे दिन पहाड़ पर बसे लहुरियादह गांव में बुधवार दोपहर बारह बजे के करीब बीइओ हलिया प्रकाश चंद्र यादव ग्राम प्रशासक कौशलेंद्र कुमार गुप्ता विद्यालय निर्माण हेतु टीम के साथ चयनित किए गए स्थल पर पहुंचे। बीइओ की उपस्थिति में विद्यालय के लिए आवंटित की गई भूमि की मापी व चिन्हांकन करवाया गया। 

लहुरियादह में बहुप्रतीक्षित उच्च प्राथमिक विद्यालय के निर्माण कार्य शुरू होने पर ग्रामीणों में खुशी व्याप्त हो गई थी मगर चंद दिनों तक ही। वर्ष 2023 में लहुरियादह गांव में निरीक्षण के दौरान ग्रामीण देवकली ने बच्चों की शिक्षा के लिए गांव में उच्च प्राथमिक विद्यालय खोले जाने की पूर्व जिलाधिकारी दिव्या मित्तल से मांग की थी। दिव्या मित्तल के प्रयासों से लहुरियादह गांव में वर्ष 2024 में उच्च प्राथमिक विद्यालय स्वीकृत हो गया था। वहीं विद्यालय निर्माण हेतु अगस्त 2025 में शासन से धनराशि भी जारी कर दी गई थी।लेकिन जिम्मेदारों की लापरवाही के चलते विद्यालय निर्माण कार्य शुरू नही हो सका।

उच्च प्राथमिक विद्यालय का निर्माण कार्य शुरू होने पर लहुरियादह गांव के ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी। ग्रामीणों ने खुशी जताते हुए बताया कि गांव के बच्चों को कक्षा आठ तक की पढ़ाई के लिए अब गांव से दूर नही जाना पड़ेगा। गरीब व श्रमिकों के बच्चों को गांव में ही आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त हो सकेगी। वहीं जिस जगह विद्यालय के लिए भूमि का आवंटन किया गया है वहां नाला स्थित है। जिसमें बारिश के मौसम में पानी बहता रहता है। विद्यालय निर्माण के समय पानी निकासी की समुचित व्यवस्था करवाए जाने की आवश्यकता पर भी ग्रामीणों ने जोर दिया था।

ग्राम प्रधान कौशलेंद्र गुप्ता ने जिला प्रशासन के इस पहल पर खुशी जताते हुए कहा था कि, “लहुरियादह गांव में उच्च प्राथमिक विद्यालय का निर्माण हो जाने से खासकर बालिकाओं की शिक्षा को गांव में बढ़ावा मिलेगा।”

चंद दिनों में ही खुशी काफूर, वन विभाग ने डाला पेंच या दबाव की राजनीति 

गौरतलब हो कि प्राथमिक विद्यालय लहुरियादह के उच्चीकरण हेतु वर्ष 2024-25 में प्रस्ताव भेजा गया था, जिसकी स्वीकृति वर्ष 2025-26 में राज्य परियोजना निदेशक द्वारा प्रदान करते हुए रू. 25.58 लाख का धन आवंटन किया गया। उपजिलाधिकारी लालगंज द्वारा पूर्व माध्यमिक विद्यालय के निर्माण हेतु आराजी नं. 1116 ग रकबा 0.169 हे. भूमि उपलब्ध करायी गई तथा विद्यालय प्रबंध समिति के खाते में रू. 25.58 लाख हस्तांतरित किया जा चुका है तथा विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा निर्माण कार्य प्रारम्भ कराया गया है।

लेकिन दो दिन बाद ही वन विभाग ने वन भूमि का हवाला देकर उच्च प्राथमिक विद्यालय के निर्माण कार्य को रुकवा दिया है। ऐसे में ग्रामीणों में इस बात को लेकर चर्चा जोरों पर है कि यह कोई निजी काम तो रहा नहीं स्कूल भी सरकार का वन भूमि भी सरकार का वह भी खाली पड़ा पथरीली भूमि तो भला स्कूल निर्माण पर वन विभाग को आपत्ति किस बात की?

वास्तव में यह वन विभाग का दबाव है या किसी ऊपर से आये हुए दबाव का असर है जिसके आगे वन विभाग के अधिकारियों ने घुटने टेक दिए हैं। जो तीन साल तक खामोश थे उन्हें कानों कान स्कूल निर्माण की खबर नहीं थी, लेकिन जैसे ही नींव शुरु हुई वन विभाग के अधिकारियों की नींद टूट गई।

खैर, लहुरियादह गांव में उच्च प्राथमिक विद्यालय के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने पर इसका भी श्रेय दिव्या मित्तल को ही जाता दिखलाई दे रहा था, सो यह कहाँ से कुछ लोगों को हजम हो पाता? इस बात के भी चर्चें जोरों पर है।

स्थानांतरण के बाद सादगी रही बरकरार तो लोकप्रियता रही कायम 

जनचौक को जो जानकारी मिली, उसके अनुसार मिर्जापुर से स्थानांतरण के बाद दिव्या मित्तल कुछ महीने छुट्टी पर रहीं, बच्चों की शिक्षा का हवाला दिया गया। मिर्ज़ापुर के एक फ्लैट में किराए पर अपनी मां और दो बेटियों के साथ रहीं। उनका जुड़ाव से बना रहा है। 

जहां पूर्व डीएम दिव्या मित्तल रहा करती थीं वहीं कॉलोनी की एक महिला ने नाम न देने की शर्त पर कहा  “कभी महसूस ही नहीं हुआ कि हमारे बीच एक खास आईएएस रह रही हैं, वो खुले विचारों वाली गंभीर महिला रहीं हैं।” राजनीतिक जानकारों की मानें तो उन्होंने उसी दौरान ठान लिया था कि मिर्जापुर को कर्मभूमि बनाना है। विंध्यवासिनी देवी में आस्था, प्रकृति से लगाव और चाहने वाले लोगों द्वारा अंदर ही अंदर जमीन तैयार करना – सब इसी जुड़ाव की कड़ी हैं।

मिर्जापुर क्या कह रहा है? 

‘जनचौक’ ने आम जनमानस से बात की तो मिली-जुली प्रतिक्रिया आई:

एक वरिष्ठ नागरिक कहते हैं – “देश में चपरासी से लेकर बड़ी सेवा तक प्रतिभाएं हैं, पर बोझिल कार्यप्रणाली उन्हें तिल-तिल मरने को मजबूर करती है। दिव्या मित्तल भी इसकी अपवाद नहीं। चपरासी की नौकरी छोड़ने का साहस नहीं होता, उन्होंने आईएएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा से त्यागपत्र दे दिया।”

दूसरे कहते हैं, “आईआईटी में चयन, आईआईएम से एमबीए, लंदन में नौकरी, पहले प्रयास में आईपीएस और अगले में आईएएस – यह कहानी नहीं, जिद का प्रतिफल है।” 

सोशल मीडिया पर चर्चा है – “आप लाखों युवाओं की प्रेरणास्रोत हैं, यदि आईएएस में रहते हुए उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं तो इस्तीफे के बाद क्या योजना है?”

विरोध का स्वर भी

राष्ट्रवादी मंच के अध्यक्ष मनोज श्रीवास्तव कहते हैं – “महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है, स्वागत है, पर लहुरियादह में पानी पहुंचाने के अलावा उपलब्धि क्या? यह सरकार की योजना थी। सोशल मीडिया ने हवा दी, श्रेय लेने की होड़ में दिव्या मित्तल बनाम अनुप्रिया पटेल हुआ और उन्हें जाना पड़ा। जंगी रोड से ककरहवां मार्ग पर पालिका की जमीन पर भू-माफिया ने प्लाटिंग कर दी, कार्रवाई तो दूर कहा मेरे हाथ बंधे हैं। इतनी मुखर, निडर थीं तो कार्रवाई क्यों नहीं की?”

वहीं कलेक्ट्रेट के एक कर्मचारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा – “मैम कार्य के प्रति जितनी कड़क रहीं, उतनी ही संवेदनशील भी। भेदभाव वाला बर्ताव नहीं। चुनाव लड़ती हैं तो प्रबल जनसमर्थन मिलेगा।”

आगे क्या?

फिलहाल दल का खुलासा नहीं। कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, अब राजा भैया की जनसत्ता दल से सुगबुगाहट – राजा भैया के साथ एक तस्वीर ने बहस छेड़ दी है। ब्यूरोक्रेसी में उन्हें जानने वाले कहते हैं – मंगल का दिन, साड़ी का रंग और कमल के फूल की डिजाइन काफी कुछ बता रही है। चर्चा है कि शारदीय नवरात्र में विंध्यवासिनी धाम में दर्शन-पूजन के बाद वह इस पर कुछ बोल सकती हैं।

 (शालिनी जायसवाल और संतोष देव गिरि की रिपोर्ट)

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