जिम्मेदार होना, जवाबदेह होने की पहली सीढ़ी है। व्यापक जनता को तो अब जाकर साफ होना शुरू हुआ है, साहब की सरकार लगभग 2014 से ही जानती है कि आप जिम्मेदार सरकार तो कतई नहीं होंगे, सो जवाबदेही होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जब घोषणा की थी कि ‘हमारी सरकार में मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होंगे’, तब उनका निस्संदेह आशय यही था।
राजनाथ सिंह ने ग्यारह साल पहले यह बात कही थी, 24 जून 2015 को। इंडियन प्रीमियर लीग क्रिकेट के कुख्यात संस्थापक और प्रथम अध्यक्ष ललित मोदी के विवाद पर तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के इस्तीफे की कांग्रेस की मांग पर तब के गृहमंत्री ने कहा था कि ‘हमारी सरकार में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होंगे।’
भ्रष्टाचार के आरोपों में फरार ललित मोदी का पासपोर्ट रद्द करने की केंद्र सरकार की कार्रवाई के बाद आव्रजन और यात्रा—दस्तावेज हासिल करने में मदद के लिए सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे सिंधिया के इस्तीफे की मांग खारिज करने के केंद्रीय मंत्रि परिषद के फैसले की घोषणा करते हुए राजनाथ सिंह ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यह घोषणा की थी और उनके तत्कालीन मंत्रिमंडलीय सहयोगी रविशंकर प्रसाद ने जोड़ा था कि ‘हमारे मंत्री वह नहीं करेंगे जो यूपीए सरकार के मंत्री कर दिया करते थे।’
बहरहाल, राजनाथ सिंह और रविशंकर प्रसाद की वाचालता स्पष्ट कह रही थी कि उनकी सरकार जवाबदेह कतई नहीं होगी। मंत्रियों के त्यागपत्र और उनके अगुआ पी.एम. का इस्तीफा, सरकार और उसके मुखिया के जवाबदेह होने का चरम लक्षण है, लेकिन मौजूदा सरकार के दोनों मंत्रियों की बहु—उद्धृत साफ उद्घोषणा थी कि पिछली सरकार में जिम्मेदारी और जवाबदेही की जो धारणा थी, मोदी सरकार में वह कतई नहीं होगी। और पिछले कम—से—कम पिछले 12 साल में यह बात सही भी साबित हुई है। इस्तीफे तो छोड़िये, आप याद कीजिए कि कितनी बार मोदी सरकार ने अपने फैसलों पर खेद जताया है, कितनी बार उन्हें वापस लिया है। अपने निर्णयों पर खेद जताना, उन्हें वापस लेना जवाबदेह होने के संकेत हैं। जैसे, कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की इजाजत देना भी।
दीपके पिछले 6 जून को जब अमरीका से दिल्ली पहुंचे तो एयरपोर्ट पर प्रदर्शन की अनुमति के साथ उनका स्वागत किया गया था और यह तो जवाबदेह होना ही है। इसलिए मानना चाहिए कि ‘नीट’ पेपर लीक और ऐसी तमाम लीकों, परीक्षाओं की ’री—शिड्यूलिंग’ और अभ्यर्थियों की आत्महत्याओं के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा लेकर केन्द्र सरकार देर-सबेर अपने जवाबदेह होने का ‘एक और प्रदर्शन’ कर दे।
‘जवाबदेह होने के इस प्रदर्शन’ और अब छह—सात दिन से जंतर मंतर पर डटे दीपके और हजारों जेन—जियों के सरकार को सचमुच ही जवाबदेह बनाने के प्रयास में एक डायकॉटोमी है। साहब, उनके चाणक्य और उनके दलों, सहयोगियों ने तो बस दिल्ली, हैदराबाद, बेंगलुरु और जयपुर में इसी सवाल पर भाजपा के कार्यालयों और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस के अलग-अलग संगठनों को लेकर हुए प्रदर्शनों को अस्वीकार करने के लिए ‘जवाबदेही का प्रदर्शन’ भर करने की पहल की होगी।
कांग्रेस—मुक्त भारत का उनका सपना भी यही है। महीना भर पहले 16 और 19 मई को भारतीय युवा कांग्रेस ने नई दिल्ली और हैदराबाद में प्रदर्शन किया था। 16 मई को तीन मूर्ति गोल चक्कर से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर मार्च और 19 मई को हैदराबाद मेट्रो रेल में पेपर—लीक्स को लेकर एक अनूठा प्रदर्शन, जबकि अभी 21 जून को बेंगलुरु और जयपुर में प्रदेश कांग्रेस सदस्यों ने भारी जुलूस निकाला था। फिर सप्ताह भर पहले विपक्ष के नेता राहुल गांधी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के संसदीय क्षेत्र कोटा से इस मुद्दे पर राष्ट्रीय अभियान शुरू कर चुके हैं और इस अभियान में उन्हें इलाहाबाद, पटना होते हुए दिल्ली के छात्र समूहों तक को संबोधित करना है।
दीपके, 6 जून को यहां, दिल्ली में जंतर मंतर के बाद पुणे में सावित्री बाई फुले यूनिवर्सिटी, जयपुर में शहीद स्मारक, बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क, अमृतसर और हैदराबाद में रैलियों के बाद वापस जंतर मंतर पहुंच चुके हैं और इस बार उनका इरादा शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा लेकर ही दिल्ली से कूच करने का है।
विपक्ष के नेता राहुल गांधी का अभी कोटा में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की तैयारी के क्रम में आह्वानों—अपीलों के पोस्टर्स फाड़े जाने, कोचिंग सेंटरों को अपने छात्रों को राहुल के ‘संवाद—कार्यक्रम’ में नहीं जाने देने के ‘आदेशों’ को छोड़ भी दें तो जाने माने पत्रकार निरंजन टकले का यह सवाल तो मौजूं है ही कि ‘आखिर दिल्ली पुलिस में ऐसा कौन—सा आफिसर है, जो गृह मंत्री अमित शाह को नाराज करने की हिम्मत कर सकता है?’ टकले ने शायद हिम्मत का ही इस्तेमाल किया था या शायद ‘साहस’ का या ‘औकात’ का, पर कॉकरोच जनता पार्टी अव्वल तो पार्टी नहीं है, न संगठन। अलबत्ता ‘कॉकरोच’ ने कम—से—कम तीन प्रवक्ताओं की नियुक्ति के साथ ही एक संगठन होने की कोशिशें जरुर शुरू की हैं।
सब लोग जानते हैं कि दिल्ली की सीमाओं पर हजारों किसानों के करीब डेढ़ साल जमे रहने पर प्रधानमंत्री ने ‘राष्ट्र के नाम’ एक संबोधन में 19 नवंबर 2021 अपने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा करते हुए वह बहु उद्धृत वाक्य कहा था कि ‘शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रही होगी, जिसके कारण दीये के प्रकाश जैसा सत्य हम कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए।’ आप चाहें तो साहब के इस संबोधन को उनकी सरकार के जवाबदेह होने का लक्षण मान सकते हैं, पर यह सच है कि किसानों को दिल्ली की घेराबंदी कर, राजधानी से बाहर बैठने को मजबूर किया गया था, डेढ़ साल में उन्हें प्रत्यक्ष—परोक्ष तरीके से राष्ट्र—विरोधी, पाकिस्तानी, आतंकवादी तक कहा गया था, सात सौ से अधिक किसान मारे गए थे, स्वयं तत्कालीन गृह राज्यमंत्री के बेटे ने अपनी कुख्यात ‘थार’ कार से कुचलकर कई किसानों की हत्या कर दी थी।
साहब ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा के साथ ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ की कानूनी गारंटी करने का वादा भी किया था, जिसे चारेक महीने बाद संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद छोड़ दिया गया। और दिलचस्प यह कि चारेक महीने बाद जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे, उनमें पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड भी थे, डेढ साल की घेराबंदी में जहां के किसानों की बहुतायत थी।
वरना अपने दबंग सांसद और कुश्ती महासंघ के खिलाफ यौन शोषण के मामलों पर राष्ट्रीय—अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पहलवानों के आंदोलन पर सरकार की कान पर जूं तक न रेंगा था और दिल्ली की सड़क से लेकर हरिद्वार में गंगा तक में पदक बहाने की राष्ट्रीय—अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पहलवानों के कदमों का कोई असर नहीं हुआ था। आप ऐसी तमाम घटनाएं याद कर सकते हैं, तमाम विरोधियों और आंदोलनों को राष्ट्र—विरोधी, पाकिस्तान—परस्त, आतंकवादी घोषित करने की साहब, उनके चाणक्य और समर्थकों—आईटी.सेल—अंधभक्तों की आदतें भी, जैसे अभी कॉकरोचों के आंदोलन के चौथे—पांचवें दिन स्वयं प्रधान ने आंदोलन को ‘आतंकवादियों की बी टीम’ कह दिया है।
मसला यह है कि ‘जवाबदेही के प्रदर्शन’ की प्रदर्शन—प्रेमी सरकार की कोशिश और ऐसी सरकार को वास्तव में जवाबदेह बना देने के दीपके के आसपास जुट आए कॉकरोचों के प्रयासों में ठन गई है। सवाल यह है कि जीत किसकी होती है। इस बीच शिक्षाविद और पर्यावरणवादी सोनम वांगचुक जंतर मंतर पर कल अनशन भी शुरू कर रहे हैं।
(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)