गाजा में इजरायल के नरसंहार, विशेष रूप से राहत सामग्री लेते समय फिलिस्तीनी नागरिकों-खासकर बच्चों और महिलाओं-की निरंतर हत्याओं ने विश्व समुदाय की संवेदनाओं को झकझोर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, यूरोप सहित दुनिया भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और जनमत का दबाव इस नरसंहार को रोकने की दिशा में है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने के फैसले के पीछे यही जनमत का दबाव है। उन्होंने घोषणा की कि “फ्रांस सितंबर 2025 में फिलिस्तीन को आधिकारिक रूप से मान्यता देगा।”
इसी तरह, ब्रिटेन ने चेतावनी दी है कि यदि इजरायल ने गाजा में युद्धविराम नहीं किया, तो वह भी सितंबर में फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे देगा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने युद्धविराम, वेस्ट बैंक से कब्जा हटाने और दो-राष्ट्र समाधान को शर्त के रूप में रखा है।
फ्रांस और ब्रिटेन की इन घोषणाओं से इजरायल और अमेरिका अलग-थलग पड़ते नजर आ रहे हैं। मैक्रों और स्टार्मर के फैसलों का जहां फिलिस्तीनी प्राधिकरण ने स्वागत किया है, वहीं इजरायल और अमेरिका ने इसका कड़ा विरोध किया है। इन फैसलों ने पश्चिमी देशों पर फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का दबाव बढ़ा दिया है।
गुरुवार, 24 जुलाई 2025 को, सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट में मैक्रों ने लिखा, “मध्य पूर्व में न्यायपूर्ण और स्थायी शांति के प्रति फ्रांस की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता के तहत मैंने निर्णय लिया है कि फ्रांस फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देगा।” उन्होंने कहा, “हमें हमास का विसैन्यीकरण सुनिश्चित करना होगा, साथ ही गाजा को सुरक्षित बनाना और उसका पुनर्निर्माण करना होगा। आज की सबसे बड़ी जरूरत गाजा में युद्ध समाप्त करना और नागरिकों की रक्षा करना है। तत्काल युद्धविराम संभव है। सभी बंधकों की रिहाई और गाजा के लोगों के लिए बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता आवश्यक है।”
फ्रांस ऐसा कदम उठाने वाला यूरोपीय संघ का सबसे प्रभावशाली देश है। यूरोपीय संघ के स्वीडन, स्पेन, आयरलैंड और स्लोवेनिया जैसे देश पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। पोलैंड और हंगरी ने 1980 के दशक में कम्युनिस्ट शासन के दौरान ही फिलिस्तीन को मान्यता दी थी। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 140 से अधिक देश फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं, जिनमें स्पेन और आयरलैंड जैसे यूरोपीय संघ के कुछ देश भी शामिल हैं। हालांकि, मैक्रों के इस फैसले का इजरायल और अमेरिका ने विरोध किया है।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा, “यह आतंकवाद को पुरस्कृत करने जैसा है।” अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ‘एक्स’ पर लिखा, “संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन को राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की इमैनुएल मैक्रों की योजना को अमेरिका सख्ती से खारिज करता है। यह गैर-जिम्मेदाराना फैसला हमास के प्रचार को बढ़ावा देता है और अशांति को बढ़ाएगा। यह 7 अक्टूबर के हमले के पीड़ितों के लिए अपमानजनक है।”
इसी तरह, फ्रांस में अमेरिकी राजदूत चार्ल्स कुशनर ने ‘एक्स’ पर लिखा, “फ्रांस का फिलिस्तीन को मान्यता देने का फैसला हमास को तोहफा और शांति प्रक्रिया को झटका है। मैं हाल ही में यहां पहुंचा हूं और बहुत निराश हूं। राष्ट्रपति मैक्रों, मुझे उम्मीद है कि सितंबर से पहले मैं आपका विचार बदल सकूं। बंधकों को रिहा करें, युद्धविराम पर ध्यान दें-यही स्थायी शांति का रास्ता है।”
उल्लेखनीय है कि आगामी सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक होगी, जिसमें फ्रांस इस संबंध में औपचारिक कदम उठाएगा। फ्रांस को उम्मीद है कि अन्य प्रमुख शक्तियां भी इसका अनुसरण करेंगी।
भारत उन पहले देशों में से एक था, जिन्होंने 1988 में फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी। 1996 में भारत ने गाजा में अपना प्रतिनिधि कार्यालय खोला, जिसे 2003 में रामल्ला स्थानांतरित कर दिया गया। भारत शुरू से ही फिलिस्तीन का समर्थक रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही भारत का फिलिस्तीन के प्रति समर्थन रहा है। 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के ऐतिहासिक विभाजन का विरोध किया था। 1974 में भारत ने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को फिलिस्तीनी लोगों का एकमात्र वैधानिक प्रतिनिधि माना था।
1988 में जब यासर अराफात ने फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया, तो भारत ने तत्काल मान्यता दी। उस समय राजीव गांधी की सरकार थी, और भारत गैर-अरब देशों में पहला राष्ट्र था, जिसने फिलिस्तीन को मान्यता दी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की पूर्ण सदस्यता का हमेशा समर्थन किया है, जिसमें 2012 में गैर-सदस्य पर्यवेक्षक राज्य का दर्जा और 2015 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) में फिलिस्तीन की मान्यता शामिल है।
हालांकि, हाल के वर्षों में भारत ने इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में तटस्थ रुख अपनाया है। मोदी सरकार ने फिलिस्तीन के पक्ष में या इजरायल के खिलाफ मुखर रूप से कोई रुख नहीं लिया। कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने इस मुद्दे से दूरी बनाए रखी और इजरायल के साथ मजबूत संबंध विकसित किए हैं। गौरतलब है कि इजरायल, अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई पश्चिमी देशों ने अभी तक फिलिस्तीन को मान्यता नहीं दी है। ऐसे में फ्रांस का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह जी-7 समूह का पहला देश होगा, जो फिलिस्तीन को मान्यता देगा। जी-7 में फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, कनाडा और जापान शामिल हैं।
स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, कतर, जॉर्डन और सऊदी अरब ने मैक्रों के इस फैसले का समर्थन किया है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने ‘एक्स’ पर लिखा, “मैं इसका स्वागत करता हूं कि फ्रांस ने स्पेन और अन्य यूरोपीय देशों के साथ मिलकर फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का फैसला किया है। हमें मिलकर दो-राष्ट्र समाधान की रक्षा करनी होगी, जिसे नेतन्याहू नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह शांति का एकमात्र रास्ता है।” पिछले साल मई में स्पेन, आयरलैंड और नॉर्वे ने भी फिलिस्तीन को मान्यता दी थी।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा, “फिलिस्तीनी राष्ट्र को मान्यता देना ही स्थायी शांति की गारंटी है।” उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, “फिलिस्तीन के लोगों की स्वतंत्र राष्ट्र की वैध आकांक्षाओं को मान्यता देना ऑस्ट्रेलिया में लंबे समय से सर्वदलीय रुख रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है, क्योंकि यह न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति का आधार है। ऑस्ट्रेलिया उस भविष्य के लिए प्रतिबद्ध है, जहां इजरायल और फिलिस्तीन दोनों सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति से रह सकें।”
यह घटना कोई साधारण घटना नहीं है। लंबे समय से नाटो देश, विशेष रूप से फ्रांस और ब्रिटेन, फिलिस्तीन के मुद्दे पर इजरायल और अमेरिका के साथ एकजुट थे। हालांकि, यह बदलाव इन देशों की घरेलू राजनीति की मजबूरियों का भी परिणाम है। फ्रांस और ब्रिटेन में बड़ी मुस्लिम आबादी है, और गाजा में हो रहे नरसंहार को लेकर उनमें भारी आक्रोश है। यह फैसला भले ही गाजा की स्थिति पर तत्काल प्रभाव न डाले, लेकिन यह घरेलू राजनीति के लिए फायदेमंद हो सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू टैरिफ युद्ध और वैश्विक आर्थिक बदलावों का है। ट्रंप प्रशासन की नीतियों से पश्चिमी दुनिया और यूरोप के बीच अंतर्विरोध बढ़ रहे हैं। आर्थिक मंदी और बेरोजगारी की आशंका यूरोप को अमेरिका के मुकाबले नई राह तलाशने के लिए मजबूर कर रही है। इस कारण वैश्विक राजनीति में नए सैन्य और आर्थिक गुट बन रहे हैं, जो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। गाजा और यूक्रेन की घटनाएं इन बदलावों को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। फ्रांस और ब्रिटेन के इस फैसले का मूल्यांकन इस दृष्टिकोण से भी किया जाना चाहिए।
(स्वदेश कुमार सिन्हा लेखक और टिप्पणीकार हैं)