Wednesday, August 10, 2022

महाराष्ट्र के बाद अब मोदी–शाह का का मिशन तेलंगाना

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी यानि भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में शुरू हो रही बैठक के मौके पर पूरे नगर को भगवा रंग में पोत दिया गया है। दो दिन की बैठक में भाग लेने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बीती शाम ही यहाँ पहुँच गए। उनके स्वागत में शमशाबाद एयरपोर्ट से रोड शो किया गया। उन्होंने इसमें कहा कि राज्य की जनता मौजूदा सरकार से ऊब चुकी है और परिवर्तन चाहती है।


बैठक में भाग लेने मोदी जी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत अनेक केन्द्रीय मंत्रियों के अलावा भाजपा शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्रीगण समेत राष्ट्रीय स्तर के करीब 400 नेताओं का हैदराबाद पहुंचने का क्रम जारी है। बैठक के समापन पर रविवार 3 जुलाई को हैदराबाद से जुड़े शहर सिकंदराबाद के परेड ग्राउंड में रैली होगी जिसमें मोदी जी का भाषण होगा। वह यहीं रात्रि विश्राम करने के बाद 4 जुलाई की सुबह बेगमपेट हवाई अड्डा से भारतीय वायु सेना के उस विशेष विमान से नई दिल्ली लौट जाएंगे जो सिर्फ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की देश –विदेश की उड़ान लिए सुरक्षित रखा जाता है।

भाजपा ने हैदराबाद शहर में जगह-जगह मोदी, अमित शाह जैसे बड़े नेताओं के हार्डबोर्ड कटआउट और होर्डिंग, बैनर आदि लगाए हैं। तेलंगाना के भाजपा अध्यक्ष और करीमनगर सांसद बी. संजय कुमार के मुताबिक प्रधानमंत्री और पार्टी प्रतिनिधियों के लिए खाने-पीने का विशेष प्रबंध किया है। मोदी जी की व्यक्त इच्छा पर उनके लिए तेलंगाना के व्यंजन ‘ यदम्मा ‘ की व्यवस्था की गई है।

भाजपा कार्यकारिणी की बैठक हैदराबाद में ही आयोजित करने का बड़ा कारण यह है कि तेलंगाना विधानसभा के चुनाव अगले बरस दिसंबर में तय हैं। भाजपा इस चुनाव में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति यानि टीआरएस के मुख्यमंत्री केसीआर की पार्टी को परास्त करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। हालांकि बैठक के ऐन पहले भाजपा को धीमे से ही सही, जोर का झटका लग गया। वृहत्तर हैदराबाद नगर निगम यानी जीएचएमसी में भाजपा के चार पार्षद दलबदल कर टीआरएस में चले गए। उन्होंने टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष के टी रामाराव की मौजूदगी में उनकी पार्टी साथ थाम लिया।
 

भाजपा के मिशन तेलंगाना के तहर कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने वाले उसके विभिन्न नेता राज्य विधानसभा के 119 निर्वाचन क्षेत्रों में जाएंगे। उनकी अगवानी के लिए पार्टी के सभी प्रांतीय नेताओं को उनके विधानसभा क्षेत्रों में मौजूद रहने के लिए कहा गया है।
मोदी जी ,अमित शाह और नड्डा ने पिछले मई माह में तेलंगाना का दौरा किया था। भाजपा की तेलंगाना इकाई पूर्व अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य डॉ. के. लक्ष्मण का कहना है कि महाराष्ट्र में वंशवादी राजनीति के ख़िलाफ़ आवाज़ सफलता से उठने के बाद अब तेलंगाना की बारी है। उनकी पार्टी मोदी जी के नेतृत्व में वंशवादी सियासत के विनाश और सबका साथ सबका विकास के मुद्दों पर तेलंगाना में चुनाव लड़ेगी। उन्होंने इस चुनाव में उसी की जीत होने की आशा व्यक्त कर कहा, हमारा नारा है अबकी बार भाजपा सरकार।

टीआरएस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने इस स्तंभकार से कहा कि पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव यानि केसीआर ने पिछली बार सात माह पहले चुनाव करा लिया था। वह इस बार भी समय से पहले ही विधानसभा चुनाव करवा सकते हैं। राव ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कंपनी, आईपीएसी यानि आईपैक पार्टी के चुनाव अभियान की कमान सौंपी है।

पिछला चुनाव

तेलंगाना स्वतंत्र भारत का नवीनतम 29 वां राज्य है जहां की दूसरी विधानसभा के चुनाव के लिए वोटिंग सात दिसम्बर को हुई थी और परिणाम 11 दिसंबर को निकले थे। ये चुनाव पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम राज्य और उत्तर भारत के तीन राज्यों – राजस्थान , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के साथ ही कराये गए थे। तेलंगाना की 2014 में चुनी गई प्रथम विधानसभा का कार्यकाल जुलाई 2019 में समाप्त होना था। नए चुनाव 17 वीं लोकसभा के मई 2019 से पहले निर्धारित चुनाव के साथ कराने की संभावना थी। लेकिन राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री केसीआर के मंत्रिमंडल की सिफारिश पर 6 सितम्बर को भंग कर दी गई और नया चुनाव कराने का निर्णय किया गया। इस निर्णय के पीछे कुछ राजनीतिक निहितार्थ थे। केसीआर को तेलंगाना के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराने में जोखिम नज़र आया। क्योंकि लोकसभा के चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश के भी चुनाव कराने थे। तेलंगाना राज्य का गठन आंध्र प्रदेश को ही विभाजित कर किया गया है।

परेड ग्राउंड

गठबंधन

तेलंगाना विधानसभा के पहले चुनाव में टीआरएस ने भाजपा से गठबंधन किया था। लेकिन पिछली बार तेलंगाना में टीआरएस और भाजपा का औपचारिक गठबंधन नहीं था। दोनों चुनावी लड़ाई अपने बूते पर लड़ने को बाध्य हो गए। उन्हें अन्य कोई साथी नहीं मिल सका। तेलंगाना में पिछले चुनाव में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्र बाबू नायडू ने तेलुगु देशम पार्टी यानि टीडीपी के इतिहास में पहली बार कांग्रेस से हाथ मिलाकर महा-कुटुमी मोर्चा बनाया जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानि भाकपा और तेलंगाना जन समिति यानि टीजेएस भी शामिल थे। कांग्रेस ने खुद के लिए 95 सीटें रख 14 सीटें टीडीपी के लिए और शेष सीटें इस मोर्चा के अन्य दलों के वास्ते छोड़ दी। तेलंगाना में नई मोर्चाबंदी यहीं ख़तम नहीं हुई। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानि सीपीएम ने कांग्रेस और टीडीपी ही नहीं भाकपा से भी अलग चुनावी लड़ाई छेड़ दी। माकपा ने 28 छोटी पार्टियों के संग मिलकर बहुजन लेफ्ट फ्रंट यानि बीएलएफ का नया चुनावी मोर्चा बनाया।

तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष में भाग लेने वाली महिलाएं

किसी ज़माने में तेलंगाना में कम्युनिस्ट पार्टी बड़ी ताकत होती थी। कम्युनिस्टों ने किसानों को संगठित कर हैदराबाद के तत्कालीन निज़ाम और सामंती सत्ता के खिलाफ 1946 से 1951 तक तेलंगाना के क्षेत्रों में सशत्र संघर्ष किया था। इसका विवरण स्वीडन के नोबेल पुरस्कार विजेता गुणार मृदाल और अल्वा मृदाल के पुत्र जान मृदाल की पुस्तक इंडिया वेट्स में है। इस पुस्तक में जान मृदाल की कलाकर्मी पत्नी गन केसल की क्लिक अनेक दुर्लभ तस्वीरें भी हैं।  

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी यानि आप भी इस घमासान चुनावी लड़ाई में कूद पड़ी। असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाले मुस्लिम संगठन, एआईएमआईएम ने भी 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। आंध्र विधानसभा में तत्कालीन मुख्य विपक्षी दल, युवजन श्रमिक रायथू यानि वायएसआर कांग्रेस के नेता वाय एस जगनमोहन रेड्डी ने अपनी पार्टी को तेलंगाना के चुनाव से अलग रखा। आंध्र में फिल्म अभिनेता से राजनीतिज्ञ बने पवन कल्याण की जन सेना पार्टी भी तेलंगाना का चुनाव नहीं लड़ी थी।

टीआरएस

कांग्रेस कहती रही है कि टीआरएस ने भाजपा के साथ गुप्त चुनावी समझौता कर लिया है। टीसीआर ने इसका खंडन कर कहा कि वह आगामी आम चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही खिलाफ क्षेत्रीय दलों का फेडरल फ्रंट बनाने के अपने इरादे पर अटल है। उनका कहना है कि वह कोई हड़बड़ी में नहीं हैं। उन्होंने टीआरएस कार्यकारणी की बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी तेलांगाना में लोकसभा चुनाव भी अपने बूते पर लड़ेगी। उनका नारा है स्वर्णिम तेलंगाना। स्पष्ट है कि केसीआर चुनावी कदम फूँक -फूँक कर उठा रहे हैं। उन्हें बखूबी पता है कि तेलंगाना में अल्पसंख्यक मतदाता किसी भी पार्टी की संभावित जीत को हार और निश्चित हार को जीत में तब्दील कर सकते हैं। खुद टीआरएस ने कहा है उनकी पार्टी सेकुलर बनी रहेगी और उसके भाजपा से अब चुनावी गठबंधन करने की कोई संभावना नहीं है। हालांकि केसीआर यह भी कहते रहे हैं कि उनकी पार्टी का एनडीए के प्रति समर्थन मुद्दों पर आधारित है।

केसीआर

केसीआर का पूरा नाम कल्वाकुन्तला चंद्रशेखर राव है। वह 2 जून 2014 को राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने। उन्होंने टीआरएस का गठन 27 अप्रैल 2001 को किया था। टीआरएस ने 2004 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस से गठबंधन कर लड़ा था। यह पार्टी  केंद्र में कांग्रेस के यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस यानि यूपीए में शामिल थी। केसीआर, मनमोहन सिंह सरकार में काबिना मंत्री भी रहे थे। बाद में टीआरएस, यूपीए से अलग हो गई। केसीआर ने अपना राजनीतिक करियर दिवंगत संजय गांधी के संसर्ग में युवक कांग्रेस से शुरु किया था। वह आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के संस्थापक एन.टी. रामाराव की सरकार में और एन.चंद्रबाबू नायडू की भी पहले की सरकार में मंत्री रहे थे। मोदी जी के साथ उनके सम्बन्ध कुछ मित्रवत रहे हैं।

टीआरएस, एनडीए में शामिल नहीं है पर उसने कई मौकों पर मोदी सरकार का साथ दिया है। टीआरएस ने राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में एनडीए में शामिल , बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के जनता दल – यूनाइटेड प्रत्याशी एवं हिंदी दैनिक प्रभात खबर के पूर्व सम्पादक हरिवंश सिंह का समर्थन किया था। टीआरएस ने पिछले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी भाजपा के प्रत्याशियों क्रमशः रामनाथ कोविद और एम. वेंकैया नायडू का समर्थन किया था। इस बार के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव टीआरएस का रूख अभी तक स्पष्ट नहीं है। स्थानीय सियासी और मीडिया हल्कों में माना जाता है कि केसीआर घाट-घाट की राजनीति का पानी पिये हुए है।

केसीआर के पुत्र के टी.रामाराव , राजन्ना जिला की सिरसिला सीट से विधायक हैं। उनकी पुत्री के .कविथा राज्य की निज़ामाबाद सीट से लोकसभा सदस्य हैं।  उनके भतीजे हरीश राव भी राज्य में मंत्री हैं। केसीआर खुद सिद्दीपेट जिला के अपने परम्परागत गजवेल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं।

राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तेलंगाना में पिछले चुनाव में अपनी जनसभाओं में मुख्यमंत्री केसीआर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोपों की झड़ी लगा कर कहा था कि राज्य पर दो लाख करोड़ रूपये और प्रत्येक तेलंगानावासी पर 60 हज़ार रूपये का कर्ज है। उन्होंने दावा किया था कि राज्य में टीआरएस शासन में 4500 किसानों को आत्महत्या करने पर विवश होना पड़ा। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस के राज्य की सत्ता में आने पर किसानों के दो लाख रूपये तक के कर्ज माफ कर दिए जाएंगे, साल भर में एक लाख सरकारी नौकरियों की रिक्ति भरी जाएगी और आदिवासियों के हितों की रक्षा की जाएगी।

पृथक तेलंगाना

तेलुगु , उर्दू भाषी पृथक तेलंगाना राज्य का गठन कुछ हड़बड़ी में 2013 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन की मनमोहन सिंह सरकार के द्वितीय शासन-काल में किया गया था। कांग्रेस और भाजपा को छोड़ आंध्र प्रदेश के लगभग सभी दल इसके विरोध में थे। आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एन किरण कुमार रेड्डी ने मनमोहन सिंह सरकार के तैयार आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के विरोध में फरवरी 2014 में मुख्यमंत्री पद और कांग्रेस से भी इस्तीफा देकर अलग पार्टी बना ली थी। वह हाल में कांग्रेस में लौट आये हैं।

किरण रेड्डी सरकार के इस्तीफा देने के बाद आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था । राष्ट्रपति शासन के दौरान ही आंध्र प्रदेश का विभाजन किया गया। उसके तीन क्षेत्रों तेलंगाना , तटीय आंध्र और रायलसीमा में से तेलंगाना को भारत संघ-राज्य का 29 वाँ राज्य बना दिया गया। तेलंगाना में आंध्र प्रदेश के 10 उत्तर पश्चिमी जिलों को शामिल किया गया। प्रदेश की राजधानी हैदराबाद को दस साल के लिए तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की संयुक्त राजधानी बनाया गया।

तेलंगाना विधान सभा की कुल 119 सीटें हैं। पहली विधान सभा में टीआरएस के 90, कांग्रेस के 13, भाजपा के 5, टीडीपी के 3 और माकपा के एक सदस्य थे। पिछले चुनाव में टीआरएस ने 63 सीटें ही जीती थी। उसमें अन्य विधायक, टीडीपी समेत अन्य पार्टियों से दल -बदल कर आये। टीडीपी ने पिछले चुनाव में 15 सीटें जीती थी, जिनमें से अधिकतर बाद में टीआरएस में चले गए।  

बहरहाल, देखना यह है कि मोदी जी अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा को जिताने के लिए क्या उपाय करते हैं। उन उपायों की बानगी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और उसके समापन पर आयोजित रैली में उनके भाषण से मिल सकती है।

(सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता और पुस्तक लेखन करते हैं। इन दिनों वह भारत के विभिन्न राज्यों की यात्रा कर रहे हैं।)

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