Friday, August 12, 2022

चुनावी समर में यूपी-1: हर बीतते दिन के साथ भाजपा और गहरे भंवर में घिरती जा रही है

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उत्तर प्रदेश चुनाव-अधिसूचना अगले महीने जारी होगी। उसके पहले, इसी अवसर के लिए रोक रखी गयी  अनगिनत योजनाओं के शिलान्यास-उद्घाटन-लोकार्पण के बहाने विकास का व्यामोह रचा जा रहा है। इनमें से अनेक अधूरी हैं, कागज़ पर हैं, कई पिछली सरकार के समय की हैं, लेकिन मोदी जी ने विकास को भी सरकारों के सुव्यवस्थित गम्भीर दायित्व की जगह चुनावी इवेंट बना दिया है। सरकारी खजाने से पानी की तरह पैसा बहाकर, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर जुटाई गई ‘लाभार्थियों’ की भीड़ का इस्तेमाल मूलतः साम्प्रदायिक जहर फैलाने के लिए किया जा रहा है।

मोदी ने पूरी तरह कमान अपने हाथ में ले ली है। यहां वे बंगाल की गलती दुहराने जा रहे हैं। पर एक crucial फर्क है। बंगाल में यह शायद इस गलत assessment पर आधारित था कि BJP चुनाव जीतने जा रही है, इसलिए मोदी ने अपने को दांव पर लगा दिया। पर यहां उत्तर प्रदेश में शायद कोई choice नहीं है, मजबूरी है। मोदी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि UP में हार का मतलब है दिल्ली से विदाई। अनायास नहीं है कि अमित शाह ने खुलेआम लखनऊ रैली में लोगों से कह दिया कि 24 में मोदी जी को जिताना है तो अभी योगी को जिताइये। जाहिर है, UP का चुनाव मोदी-शाह जोड़ी के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के नाम पर ‘भव्य-दिव्य’ माहौल बनाकर जो छद्म-धार्मिकता और आध्यात्म का कुहासा रचा गया, सारे भाजपाई मुख्यमंत्रियों को काशी-अयोध्या दर्शन करा कर इसे hype दिया गया, उसका उद्देश्य हिंदुओं का बोलबाला कायम होने और हिन्दू राष्ट्र के आगमन का मिथ्या गौरवबोध जगाकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना और उस नशे में असल मुद्दों से ध्यान हटाना है।

इसका इससे बड़ा सुबूत क्या हो सकता है कि ऐसे कथित आध्यात्मिक वातावरण में भी औरंगज़ेब-शिवाजी, सालार मसूद गाज़ी और सुहेलदेव की सच्ची-झूठी कहानी लोगों को सचेत ढंग से याद दिलायी जा रही है।

क्या यह कोशिश उत्तरप्रदेश में इस बार सफल होगी?

मोदी जी वैसे तो इस खेल के पुराने सिद्धहस्त खिलाड़ी रहे हैं, गुजरात विधानसभा से लेकर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव तक और UP के 2017 के चुनाव में और अन्य राज्यों में भी उन्होंने इसे सफलतापूर्वक आजमाया। पर तब वे प्रायः यह सब चुनाव के अंतिम क्षण में करते थे। दरअसल तब अनेक अनुकूल फैक्टर साथ रहते थे, जिससे जीत की जमीन तैयार रहती थी, यह लास्ट moment का कम्युनल push भाजपा के finishing line क्रॉस करने की गारंटी कर देता था।

पर इस बार चुनाव के 3 महीने पहले से ध्रुवीकरण का यह नंगा खेल दरअसल उनका desperation दिखा रहा है और इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है।

दरअसल आज स्थिति यह है कि जनता के सामने जो अनेक मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं, उनमें से कोई एक भी सरकार को पलट देने के लिए पर्याप्त है। डबल इंजन सरकार के राज में जानलेवा महंगाई, रेकॉर्ड बेरोजगारी, आवारा पशुओं द्वारा भयानक तबाही, कोविड की अभूतपूर्व विनाशलीला…आज रेकॉर्ड  स्तर पर पहुंच चुकी महँगायी का जो आलम है, वही सरकार को सत्ता से बाहर कर देने के लिए काफी है। इसी तरह किसानों ने अपनी फसलों की जो बर्बादी झेली है, आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए उन्हें जिस तरह रतजगा करना पड़ा है उसे लेकर किसानों में जबर्दस्त गुस्सा है। सरकारी नौकरियों में भर्ती और रोजगार के लिए छात्र-युवा अनवरत लड़ रहे हैं तो पेंशन-बहाली के लिए लाखों कर्मचारी-शिक्षक।

आज ये सारे मुद्दे मिलकर जन-असंतोष का ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जिसमें अब  ध्रुवीकरण की कोई कोशिश survival के लिए लड़ रहे आम लोगों के अंतर्मन को छू नहीं पा रही। ठोस जिंदगी के सवाल भावनात्मक मुद्दों पर भारी पड़ रहे हैं।

हाल ही में उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या के माध्यम से संघ-भाजपा ने मथुरा के सवाल को उठाकर, किसान-आन्दोल से प्रभावित पश्चिम उत्तरप्रदेश में जो साम्प्रदयिक माहौल बनाने का प्रयास किया वह non-starter रहा। उससे वहां के समाज में कोई जुम्बिश भी नहीं पैदा हुई। क्योंकि जिन्हें इसमें शामिल करके नंगा नाच किया जाता, वे तो किसान-आंदोलन के चलते भाजपा के खिलाफ खड़े हो चुके हैं।

दरअसल, इस नए माहौल के निर्माण में किसान-आंदोलन ने अनोखी भूमिका अदा की है। आंदोलन वैसे तो अब खत्म हो गया है, लेकिन चुनाव पर वह निर्णायक असर डाल चुका है। आंदोलन के सीधे प्रभाव की पश्चिम उत्तर प्रदेश और तराई की लगभग 160 सीटें जो प्रदेश की कुल सीटों का 40% हैं, वहाँ तो चुनाव पर इसका सीधा असर पड़ ही रहा है, उससे बड़ी बात यह कि इसने साल भर में देश-प्रदेश का नैरेटिव जिस तरह बदला, उसमें ध्रुवीकरण की कोशिशें परवान नहीं चढ़ पा रही।

मुजफ्फरनगर के दंगों से पैदा साम्प्रदयिक विभाजन ने स्वयं मोदी के राज्यारोहण में 2014, 19 के लोकसभा चुनाव में तथा 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को अप्रत्याशित सफलता दिलाई थी, (भाजपा 2012 की 47 सीटों और 15 % वोट से छलांग लगाकर 2017 में सवा तीन सौ सीट और 40% वोट से ऊपर पहुँच गयी थी)। पर, किसान आंदोलन के फलस्वरूप पूरा माहौल बिल्कुल बदल चुका है और मोदी-शाह-योगी तिकड़ी की लाख कोशिश के बावजूद प्रदेश में साम्प्रदायिक उन्माद  का माहौल नहीं बन पा रहा है।

किसान-आंदोलन ने मोदी की किसानों और गरीबों के बीच गढ़ी गयी गरीबनवाज वाली मसीहाई छवि को भी तार-तार कर दिया है और यह दिखा दिया कि अम्बानी-अडानी जैसे अपने चहेते कारपोरेट घरानों के हित में किसानों को कुचलने में वे किस सीमा तक जा सकते हैं। गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी और उनके हत्यारोपी बेटे को बचाने में सरकार जिस तरह लगी हुई है, उसने मोदी-भाजपा को पूरी तरह नंगा कर दिया है।

डबल इंजन की सरकार से व्यापक मोहभंग और निराशा ने पिछले चुनावों में सोशल इंजीनियरिंग से बने सोशल coalition को छिन्न-भिन्न कर दिया है और भाजपा-विरोधी reverse सोशल इंजीनियरिंग की जमीन तैयार कर दी है। आने वाले दिनों में भाजपा के अंदर से भी और उसके बचे खुचे सहयोगियों में भी भगदड़ के आसार हैं।

भाजपा के विरुद्ध मुख्य चुनावी ध्रुव के बतौर उभर रही समाजवादी पार्टी अगर बदलाव की विविधतापूर्ण लोकतान्त्रिक आकांक्षाओं को address कर सके और उनकी वाहक तमाम ताकतों के साथ एक बड़ा राजनैतिक संश्रय कायम कर ले तो भाजपा की विदायी तय है।

छात्र-युवाओं के लिये सरकारी नौकरियां और रोजगार, कैम्पस लोकतन्त्र व छात्रसंघ बहाली, किसानों के लिए MSP की गारंटी, सस्ती लागत सामग्री और आवारा जानवरों से मुक्ति, कर्मचारियों-अध्यापकों की पुरानी पेंशन बहाली और सर्वोपरि पूरे प्रदेश में लोकतान्त्रिक अधिकारों की बहाली, दबंगों-पुलिस राज से मुक्ति, काले कानूनों का खात्मा, फ़र्ज़ी मुकदमों में बंद लोगों की रिहाई का ठोस आश्वासन उत्तरप्रदेश से योगी-मोदी राज की विदाई सुनिश्चित कर सकता है।

क्या विपक्ष इस चुनौती पर खरा उतरेगा?

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

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