Monday, October 3, 2022

बनारस के मल्लाह: भंवर में ज़िंदगी की पतवार

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बनारस। गंगा की लहरों पर नाव खेकर गुजर-बसर करने वाले मांझी समुदाय की जिंदगी की पतवार सरकारी नियमों के भंवर में फंसकर बेहाल है। प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनावों में उनकी जिंदगी से जुड़े रोजी-रोटी के मुद्दे पूरी तरह से गायब हैं, जबकि शहर दक्षिणी में इनके वोटों की संख्या 17 हजार के करीब है।

शिवाला घाट पर मिले प्रमोद मांझी, सरकार और उसकी मशीनरी से नाराज़ हैं। जनचौक से अपनी बातचीत में उनका कहना था, “सरकार हमें उजाड़ने में लगी हुई है। रोज नये-नये नियम बनाकर हमारे समाज के लोगों को परेशान किया जा रहा है। इनकी योजना हमें गंगा किनारे से बेदखल करना है, ऐसे में हम क्या करें?” इस नाराजगी का कारण गंगा किनारे रहने वाले निषाद समुदाय की पिछले कई वर्षों से मिल रही उपेक्षा है। प्रमोद मांझी कहते हैं कि कोरोना के दौरान हमारे लोगों को अपने गहने तक गिरवी रखने पड़े, लेकिन सरकार से हमें किसी तरह की मदद नहीं मिली।

मल्लाह, निषाद,केवट, मांझी समुदाय के लोग सदियों से गंगा किनारे रहते आ रहे हैं। इनका मुख्य काम नाव खेना है। इसके अलावा रेता पर फल और सब्जियां उगाकर भी कई अपना जीविकोपार्जन करते हैं।  प्रमोद  का कहना है कि हमारे रोजगार पर योजनाबद्ध तरीके से हमला कर उसे नष्ट किया जा रहा है। प्रमोद मांझी बताते हैं “इससे पहले भी हम यही काम करते थे। हमें किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन 2014 में सरकार बनने के बाद से हमें बेवजह परेशान किया जा रहा है। हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या नाव बंदी है।

प्रमोद मांझी, मल्लाह

गंगा में जरा सा पानी बढ़ता है तो नाव चलाने पर रोक लगा दी जाती है। साल भर में तीन-चार महीने ऐसे ही बीत जाते हैं। इस दौरान हमें किसी भी तरह से कोई मदद सरकार की तरफ से नहीं मिलती। हमारे लोग कैसे अपना दिन काटते हैं वो हमीं जानते हैं।” उनका कहना था “इतना ही नहीं हमारे समाज के जो लोग रेता पार फल, सब्जियां उगाते थे, उस पर भी रोक लगा दी गई है। हम गंगा में मछलियां नहीं मार सकते। तो अब हम करें तो क्या करें? जब भी किसी माननीय का आगमन होता है हमारी नावों को घाट किनारे से जबरन हटवा दिया जाता है। हमें अपनी नावों को इधर राजघाट और उधर रामनगर ले जाना पड़ता है।”

अब मां गंगा में क्रूज़ उतार कर हमारे लिए एक बड़ी समस्या खड़ी की जा रही है। ये सब योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। जल से निषादों का जीवन का रिश्ता रहा है। जहां जल है वहीं हम हैं ऐसे में गंगा तट से दूर हमारा अस्तित्व कैसे संभव है।

नगर निगम में जमा किए गए पैसों की पर्ची

संजय सिलसिलेवार बताते हैं कि चार साल पहले जब गंगा में क्रूज़ संचालन शुरू किया गया, तो हम सबने मिलकर इसका विरोध किया था। विरोध स्वरुप 13 दिनों तक गंगा में नावों का संचालन ठप्प रखा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्रूज़ के उद्घाटन के लिए आए, तो गंगा में ही उनके विरोध का फैसला किया गया। हमारे विरोध को देखते हुए प्रशासन ने हमारी उनसे मुलाकात करवाई। हमने अपनी समस्याएं और मुद्दों से उन्हें अवगत कराया। लेकिन उसका हल क्या निकला? इसी बीच घाटों पर जेटी लगाने का काम शुरू हो गया था, हमने उसका विरोध किया। हमारी  मांग है कि क्रूज़ का संचालन सामने घाट से हो बीच में किसी भी घाट पर इसका ठहराव न हो, ताकि हमारी रोजी-रोटी बची रहे। आप देख लीजिए आज चार क्रूज़ लाकर खड़ा कर दिया गया है। इसके पीछे की साज़िश क्या है?

अस्सी घाट पर बैठे लोग

हमने जब उनसे पूछा कि नावों में सीएनजी किट लगाने पर विवाद क्यों है? इस पर प्रमोद का कहना है “सीएनजी पर कोई विवाद नहीं है, बल्कि सवाल प्रशासन की नीयत पर है। सीएनजी किट लगाने के सवाल पर कई बैठकें प्रशासन के साथ हुईं। हमारा कहना था कि नावों में यामाहा या किर्लोस्कर का इंजन लगाया जाए। प्रशासन ने  हमारी बात पर गौर किया और हमारी मांग मान ली थी। तय हुआ था कि हर नाव पर हमें पांच हजार रुपए देना होगा, बाकी की शेष राशि सरकार की ओर से मुहैय्या कराई जानी थी। लेकिन प्रशासन ने हमसे झूठ बोला, और नावों में पहले से इस्तेमाल किए गए इंजन लगाने शुरू कर दिए, तो हमने इसका विरोध किया”।

प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनावों में आपके मुद्दे क्या हैं, इस पर प्रमोद मांझी कहते हैं, “हमारे प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले हमें अपनी बपौती समझते हैं।  ऊपर वाले सेंटिंग कर लेते हैं, और हमारे हाथों में कुछ नहीं मिलता है।”

गंगा में केवल चप्पू वाले  नावों के संचालन के प्रबल पक्षधर प्रमोद मांझी कहते हैं, “इसी को जीना है, इसी को पीना है और इसी में समा जाना है। मां गंगा हमारी जिंदगी है।” लेकिन हुकूमत इस बात को नहीं समझती।

(वाराणसी से पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट।)

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