Friday, August 12, 2022

कासगंज: किसी मजाक से कम नहीं है अल्ताफ की खुदकुशी संबंधी पुलिस की थियरी

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उत्तर प्रदेश के कासगंज में अल्ताफ़ अहमद की हिरासत में मौत का मामला उलझता जा रहा है। 21 साल के अल्ताफ़ अहमद के पिता ने पुलिस पर सीधे उनके बेटे को मारने का आरोप लगाया है। अल्ताफ़ के पिता चांद मियां ने कहा है कि वो खुद अपने बेटे अल्ताफ़ को पुलिस चौकी में छोड़कर आए थे। तब पुलिस ने भरोसा दिया था कि वो पूछताछ करके छोड़ देंगे मगर अब उसकी हत्या कर दी है। इस मामले में 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। कासगंज एसपी का कहना है कि अल्ताफ़ ने पुलिस लॉकअप के टॉयलेट में फांसी लगाकर जान दी है। अल्ताफ़ के परिजन पुलिस के दावे को नकार रहे हैं। इस बीच एक वकील ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेश बिंदल को पत्र लिख कर अल्ताफ की मौत की जांच, हाईकोर्ट के जज की निगरानी में कराए जाने की अपील की है।

हिरासत में हुई इस मौत के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। उत्तर प्रदेश पुलिस पर विपक्षी पार्टियों के नेता लगातार एक समुदाय के उत्पीड़न का आरोप लगाते रहे हैं। हिरासत में मौत उत्तर प्रदेश में एक गंभीर मुद्दा है। मृतक युवक अल्ताफ़ नंगला सैय्यद का रहना वाला था और टाइल लगाने का काम करता था। पुलिस ने उसे 8 नवंबर की शाम हिरासत में लिया था, हालांकि उसके पिता का कहना है कि वो खुद उसे चौकी छोड़कर आये थे क्योंकि एक युवती के फरार होने के सिलसिले में पुलिस उनके घर दबिश दे रही थी।

अल्ताफ़ के पिता चांद मियां के मुताबिक 24 घंटे के अंदर ही अल्ताफ़ की हत्या कर दी गई। पुलिस कह रही है कि उसने फांसी लगा ली। चांद मियां का कहना है पुलिस झूठ बोल रही है उनका बेटा बुजदिल नहीं था और वो कभी खुदकुशी नहीं कर सकता। यह घटना 9 नवंबर शाम की बताई जा रही है। यह घटना कासगंज सदर कोतवाली में हुई है।

कासगंज एसपी रोहन प्रमोद के मुताबिक अल्ताफ़ के विरुद्ध कासगंज कोतवाली में लड़की को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज किया गया था। उसे पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया था। यहां उसने टॉयलेट जाने के लिए कहा तो उसे टॉयलेट भेजा गया। जहां उसने अपनी जेकेट के हुड की डोरी को नल में बांधकर फांसी लगा ली। उसे अस्पताल ले जाया गया मगर बचाया नहीं जा सका। पुलिस की इस दलील को लोग मानने से इनकार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं। लापरवाही बरतने के आरोप में कोतवाली प्रभारी वीरेंद्र सिंह ,चंद्रेश गौतम, विकास कुमार,घेणेंद्र सिंह और सौरभ सोलंकी को निलंबित कर दिया गया है। मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं।

मृतक युवक के पिता ने पुलिस की कहानी को झूठा बताते हुए कहा है कि अल्ताफ़ 60 किलो के आसपास का एक खूबसूरत और स्वस्थ लड़का था, वो सिर्फ एक नाड़े से फांसी लगाकर नहीं मर सकता। जिस नल से फांसी लगाने की बात हो रही है वो 6 फ़ीट ऊंचाई पर कोई नहीं लगाता है। अल्ताफ़ की मौत की सूचना हमें कई घण्टे बाद दी गई। अब मेडिकल में वो खेल करा देंगे। हमारा कलेजा रो रहा है। यह हम पर खुला जुल्म है।

पुलिस अल्ताफ को सोमवार आठ नवंबर को पुलिस स्टेशन ले कर गई थी।अगले दिन पुलिस उसे अस्पताल लेकर गई जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।अल्ताफ के पिता चांद मियां ने पत्रकारों को बताया कि जब किसी महिला को अगवा करने के आरोप में पुलिस उनके बेटे को ढूंढते हुए उनके घर पहुंची तो उन्होंने अल्ताफ को पुलिस को सौंप दिया।लेकिन जब वो मामले के बारे में और जानने के लिए पुलिस स्टेशन गए तो उन्हें वहां से भगा दिया गया। उसके बाद अगले दिन उन्हें उनके बेटे की मौत की खबर मिली। चांद मियां ने पुलिस पर ही उनके बेटे की मौत की जिम्मेदारी का आरोप लगाया है। लेकिन पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है।

इस बीच एक वकील ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेश बिंदल को पत्र लिखाहै जिसमें कहा गया है कि मैं, बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करता हूं। अभी अमृतसर से नांदेड़ के सफर में हूं। जहां मैंने यूपी के कासगंज में 21 साल के अल्ताफ की पुलिस हिरासत में मौत की खबर पढ़ी। चांद मियां ने 8 नवंबर की शाम, करीब 8 बजे खुद ही अपने बेटे अल्ताफ को पुलिस के हवाले किया था। 9 नवंबर की शाम 5 बजे यानी 24 घंटे के अंदर अल्ताफ की मौत हो गई। पुलिस अधिकारियों ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। इस खबर से मैं अंदर तक हिल गया हूं।

पत्र में उन्होंने कहा है कि, जब चांद मियां बेटे के बारे में पूछने के लिए पुलिस के पास गए, तो उन्हें भगा दिया गया। अब मौत पर पुलिस ने तर्क दिया कि, अल्ताफ ने अपनी ही जैकेट के नाड़े से बाथरूम की टोंटी के सहारे फांसी लगा ली। उन्होंने कहा कि ये बिल्कुल साफ है कि इतना पतला नाड़ा 21 साल के नौजवान का वजन नहीं उठा सकता है, जिससे वह लटककर मर जाए।वकील ने जयराज बेनिक्स की हिरासत में मौत का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीमकोर्ट ने उन आरोपी पुलिसकर्मियों की जमानत खारिज कर दी थी, जिन्होंने जयराज को हिरासत में प्रताड़ित किया था।

वकील ने अपने पत्र में इस बात का भी जिक्र किया है कि चूंकि मैं ट्रेन में हूं। इसलिए हार्ड कॉपी भेजने में असमर्थ हूं। ई-मेल, वाट्स-एप और दूसरे डिजिटल माध्यम से इसकी कॉपी भेज रहा हूं।

गौरतलब है किभारत में पिछले एक दशक के दरमियान न्यायिक और पुलिस हिरासतों में रोजाना पांच लोग मारे गए। मानवाधिकार आयोग के मुताबिक इसी साल जनवरी से जुलाई की अवधि में 914 मौतें दर्ज की गयीं जिनमें पुलिस हिरासत की 53 मौतें भी हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग लंबे समय से इस पर अपनी चिंता और क्षोभ जाहिर करता रहा है। उसके सुझाव, सिफारिशें और नाराजगियां जस की तस हैं और हिरासत में मौतों का ग्राफ गिरता चढ़ता रहता है।

आंकड़ों के मुताबिक अगर एक दशक का हिसाब लगाएं तो मार्च 2020 तक कम से कम 17146 लोग न्यायिक और पुलिस हिरासतों में मारे गए। ये औसत हर रोज पांच मौतों का आता है। इनमें से 92 प्रतिशत मौतें 60 से 90 दिनों की अवधि वाली न्यायिक हिरासतों में हुई थीं। शेष मौतें पुलिस हिरासत में हुईं जो 24 घंटे की अवधि की होती है या मजिस्ट्रेट के आदेश पर 15 दिन तक बढ़ायी जा सकती हैं।

पिछले दिनों तमिलनाडु की एक जेल में पुलिस बर्बरता का शिकार बने दलित पिता पुत्र की मौत ने सहसा सबका ध्यान इस ओर खींच लिया और देश विदेश में इस मामले की गूंज सुनाई दी। इससे पुलिस जवाबदेही की मांग ने जोर पकड़ा।मद्रास हाईकोर्ट ने जांच का आदेश दिया और राज्य सरकार ने मामला सीबीआई को सौंप दिया।

मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के मुताबिक ऐसी मौतों की सूचना 24 घंटे में मुहैया करानी होती हैं लेकिन ऐसा होता नहीं है। दोहरी मार इन निर्देशों पर ये है कि रिपोर्ट पेश न कर पाने की सूरत में दंड का भी कोई प्रावधान नहीं है। इस बारे में जानकारों का कहना है कि पुलिस के पास अपने बचाव की बहुत सी दलीलें रहती हैं। आयोग के निर्देश ये भी कहते हैं कि हिरासत में हुई मौत की मजिस्ट्रेटी जांच दो महीने में पूरी करा ली जानी चाहिए और इसमें मृत्यु के हालात, तरीके और घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्यौरा और मौत की वजह दर्ज होना चाहिए। कैदियों के भी मानवाधिकार हैं, ये बात जेल प्रशासन और सरकारें न जाने कैसे भुला बैठती हैं।

टॉर्चर और अन्य क्रूर, अमानवीय या नीचतापूर्ण व्यवहार या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में हुए समझौते पर भारत अक्टूबर 1997 में दस्तखत तो कर चुका है लेकिन विधि आयोग की सिफारिश के बावजूद इसकी अभिपुष्टि उसने नहीं की है। हिरासत में मौतों को लेकर एक मजूबत कानून का न बन पाना भी इस मामले की एक बड़ी पेचीदगी है। राजनीतिक और पुलिस व्यवस्था और ब्यूरोक्रेसी के दबाव अपना काम करते रहते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक पुलिस जांच और पूछताछ की प्रक्रिया इतनी दोषपूर्ण न होती अगर जांच के वैज्ञानिक तरीके उपलब्ध होते और पुलिस को विशेष रूप से इस कार्य के लिए प्रशिक्षित किया जाता। एक कारगर फोरेन्सिक तकनीक का अभाव भी समस्या है। हिरासत में मौत की घटनाओं के बीच पुलिस के अंदरूनी तंत्र में भी सुधार की जरूरत है,जिसका संबंध भर्तियों से लेकर वेतन विसंगतियों, पदोन्नति, और अन्य सुविधाओं से जुड़ा है। पुलिस बल में कमी का असर पुलिसकर्मियों के कामकाज पर भी पड़ता है, इन सबका अर्थ ये नहीं है कि वे अपनी खीझ या हताशा गरीब, कमजोर और बेसहारा कैदियों पर निकालें। जेल सुधारों के लिए नियम कायदे बनाने के अलावा उच्च अधिकारियों और उनके मातहतों में मानवाधिकारों के प्रति संवेदना और सजगता भी जरूरी है। मानवाधिकार आयोगों को भी और अधिकार संपन्न और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

औपनिवेशिक दौर के पुलिस एक्ट को बदल कर पुलिस अफसरशाही के ढांचे में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। इस ढांचे को पुलिस की अंदरूनी जरूरतों के हिसाब से ढालना होगा न कि सरकारों और राजनीतिक दलों के हितों के हिसाब से।आखिरकार पुलिसकर्मी नागरिकों के रखवाले हैं, उन पर जुल्म ढाने वाले एजेंट नहीं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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