Wednesday, December 7, 2022

तबलीगी मरकज़ में शामिल होने के आरोप में जेल भेजे गए प्रो. शाहिद आयोजन के दिन थे इलाहाबाद में मौजूद

Follow us:

ज़रूर पढ़े

इलाहाबाद। प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर हैं। मूलतः उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के निवासी हैं, उनको 20 अप्रैल को गिरफ्तार कर 21 अप्रैल को जेल भेज दिया गया। उन पर आरोप है कि वह मार्च में तबलीगी जमात के मरकज में शामिल हुए थे जिसकी सूचना उन्होंने स्थानीय प्रशासन को नहीं दी। इसके अलावा उन पर यह भी आरोप है कि कुछ इंडोनेशियाई नागरिक को जिनका संबंध भी तबलीगी जमात से था, इलाहाबाद शहर में ठहराने में उन्होंने मदद की। उन इंडोनेशियाई नागरिकों पर फॉरेनर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। उन पर आरोप यह भी रहा कि उन्होंने ठहरने की सूचना स्थानीय पुलिस प्रशासन व विदेशी पंजीकरण विभाग को नहीं दी तथा महामारी फैलने से रोकने में उन्होंने प्रशासन की मदद नहीं की।

इन सभी आरोपों पर कार्रवाई करते हुए स्थानीय प्रशासन ने प्रोफेसर शाहिद को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है जिसके बाद 24 अप्रैल को विश्वविद्यालय प्रशासन उनके जेल भेजे जाने की सूचना प्राप्त कर उनका निलंबन 21 अप्रैल से प्रभावी कर देता है।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हम देखते हैं कि प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद 10 मार्च को दिल्ली से इलाहाबाद आ गए थे तथा 18 मार्च तक विश्वविद्यालय में कक्षाएं लेते रहे और परीक्षा कराने में भी शामिल होते रहे। 

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जनता कर्फ़्यू 22 मार्च से शुरू हुआ। उसके बाद सारे परिवहन के साधनों को बंद कर दिया गया था जिसका मतलब है कि सभी जमात में शामिल लोग 22 मार्च के पहले ही इलाहाबाद में आ गए थे। 

Screenshot 2020 04 26 at 5.32.55 PM

जमात प्रकरण की सूचना मिलनी शुरू होती है सम्भवतः 29-30 मार्च से। 29 मार्च के पहले तक जमाती शब्द से पूरा देश लगभग अपरिचित था। जैसा कि मालूम चल रहा है, 31 मार्च को स्थानीय पुलिस प्रशासन प्रोफेसर मोहम्मद शाहिद से संपर्क करता है और उन्हें क्वारंटाइन कर इसकी जांच की जाती है। जांच रिपोर्ट में कोरोना टेस्ट निगेटिव आता है उसके बावजूद उनको व उनके पूरे परिवार को क्वारंटाइन किया जाता है। 

1 अप्रैल को एफआईआर दर्ज की जाती है जिसमें इंडोनेशियाई नागरिकों के खिलाफ फॉरेनर्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है । जिसमें बाद में पुलिस प्रोफ़ेसर मोहम्मद शाहिद का नाम भी जोड़ देती है। उन सभी को क्वारंटाइन कर दिया जाता है।

प्रोफ़ेसर मोहम्मद शाहिद पर 9 अप्रैल को एक और मुकदमा दर्ज किया जाता है, उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपनी यात्रा के संदर्भ में सूचना नहीं दी है तथा महामारी को रोकने के लिए स्थानीय प्रशासन की सहायता नहीं की है,

20 अप्रैल की गिरफ्तारी उस समय हुई जब प्रोफेसर शाहिद होम क्वारंटाइन थे तथा उनके व उनके पूरे परिवार की कोरोना वायरस रिपोर्ट निगेटिव आ गई थी, इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए प्रोफेसर शाहिद के रिसर्च स्कॉलर का अग्रलिखित पत्र बेहद कारगर साबित हो सकता है-

“मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में PhD कर रहा हूं। मेरे सुपर वाइजर प्रो. मोहम्मद शाहिद दिल्ली में 8 मार्च से 10 मार्च (दोपहर 12 बजे) तक वहां पर थे और शाम को 4 बजे गरीब रथ से 11 बजे रात इलाहाबाद वापस आ गए। 11 मार्च को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में होली के उपलक्ष्य में छुट्टी थी। 12 मार्च को उन्होंने सेंटर हेड के रूप में राजनीति विज्ञान विभाग में परीक्षा कराई। उसके बाद उनका विभाग में आना जाना लगा रहा और फिर 17 मार्च को उन्होंने विभाग में पुनः परीक्षा कराई। तब तक केन्द्र सरकार या प्रदेश सरकार की कोई गाइड लाइन जारी नहीं हुई थी। 18 मार्च को इलाहाबाद विश्वविद्यालय बन्द हो गया और परीक्षा भी स्थगित हो गई। 13 मार्च से 15 मार्च तक की तबलीगी (बैठक) से इनका कोई लेना देना नहीं है।

30 मार्च को तबलीगी ज़मात की बात मीडिया में आई। 31 मार्च को इलाहाबाद पुलिस ने इंडोनेशिया के 7 नागरिकों को अब्दुल्ला मस्जिद के मुसाफ़िर-खाने से पकड़ लिया। 1 अप्रैल को इलाहाबाद पुलिस प्रो. मोहम्मद शाहिद से फोन पर वार्ता करती है और उसके बाद वहाँ के प्रशासनिक अधिकारियों के निर्देशन में उनकी मेडिकल जांच की गई और जाँच रिपोर्ट निगेटिव आई फ़िर भी शासन- प्रशासन द्वारा 8 अप्रैल को उन्हें परिवार सहित क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया गया और फिर वहाँ भी रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद उन्हें 14 अप्रैल को वहां से 28 अप्रैल तक होम क्वारंटाइन के लिए कहा गया परन्तु कल शाम यानि 20 अप्रैल को पुलिस जाँच के नाम पुलिस स्टेशन ले गई और फिर सुबह के न्यूज पेपर में उन्हें गिरफ्तार दिखाया गया।

Screenshot 2020 04 26 at 5.33.31 PM 1

अब न तो उन्हें किसी से मिलने दिया जा रहा है और न ही मीडिया उनका पक्ष बता रहा है। जो आरोप उन पर लगाया जा रहा है वो बेबुनियाद है। स्पष्ट करना चाहता हूं कि 21 मार्च को 7 विदेशी नागरिक दिल्ली से गया के लिए चले परंतु जनता कर्फ्यू होने के कारण इलाहाबाद उतर गये। इलाहाबाद की अब्दुल्ला मस्जिद के मुसाफिर खाना ने नियमानुसार 24 घंटे के अन्दर ऑनलाइन आवेदन किया जिसकी pdf कापी वे लोग फॉरेन ऑफिस कार्यालय में लॉकडाउन होने के कारण जमा नहीं कर सके जबकि online submit किया है।”

प्रोफेसर शाहिद के संदर्भ में मिशन ऑफ जस्टिस से जुड़े इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता राजवेन्द्र सिंह यह बताते हैं कि “विदेशी अधिनियम में जो एफआईआर हुई है उसमें कुल नामजद लोगों में कोई अज्ञात नही है। अतः उसमें प्रोफेसर का नाम जोड़ा जाना भी गलत है। और विदेशी अधिनियम की जो धाराएं लगाई गयी हैं वो पासपोर्ट और वीजा शर्तों के उल्लंघन की है जो विदेशियों के लिए हैं, जबकि प्रोफेसर भारत के नागरिक हैं, इसलिए उस एफआईआर में प्रोफेसर का नाम जोड़ना न्यायसंगत नहीं है।

उसके अलावा जो एफआईआर शिवकुटी थाने में प्रोफेसर शाहिद के खिलाफ हुई है, उसमें आईपीसी की धारा 269, 270,271 और महामारी अधिनियम की धारा 3 में की गई है, जिनमें सभी धाराओं में सात साल से कम की सजा का प्रावधान है और  सीआरपीसी की धारा 41 A और सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्णयों के अनुसार इन मामलों में पुलिस गिरफ्तारी नहीं कर सकती थी। प्रोफेसर शाहिद को गलत तरीके से, कानून को दरकिनार कर जेल भेजा गया, जो पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है।”

पूरे प्रदेश में सरकार सांप्रदायिक मंसूबों के तहत मुसलमानों के साथ व्यवहार कर रही है। उन पर कोरोना फैलाने की अफवाहें जारी हैं। और इस काम में मीडिया पूरा सहयोग कर रहा है। और सरकारें भी इन्हीं पूर्वाग्रहों से मुसलमानों के साथ व्यवहार कर रही है। इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य सचिव सुनील मौर्या का इस प्रकरण में कहना है कि “जब प्रोफेसर 10 मार्च को दिल्ली से इलाहाबाद वापस आ गए थे और 14 दिन के क्वॉरंटाइन पीरियड से ज्यादा समय बीत जाने तक स्वस्थ रहने के बावजूद भी उनकी जिम्मेदारी प्रशासन को सूचित करने की नहीं बनती है। क्योंकि उस समय प्रशासन की तरफ से इस तरह की कोई अनिवार्यता नहीं थी।

Screenshot 2020 04 26 at 5.33.58 PM

जबकि यातायात 21 मार्च तक पूरे देश में जारी रहा। यह बात दिखाती है कि पूरे देश में कोरोना वायरस के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है कोरोना से लड़ने में सरकार कमजोर साबित हुई है चाहे वह जांच का मसला हो या लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराने का, जिसके खिलाफ डॉक्टरों,सफाई कर्मचारियों व आम नागरिकों में काफी रोष व्याप्त है। इस रोष को सरकार डायवर्ट करना चाहती है, इस पूरे मसले को सांप्रदायिक रंग देने के लिए ही प्रोफेसर शाहिद को सरकार के दबाव में जेल भेजा गया, दिल्ली में UAPA के तहत CAA,NRC,NPR विरोधी आंदोलनों में शामिल लोगों  के साथ इसी तरह की कार्यवाही होती दिख रही है।”

प्रोफेसर शाहिद को जेल भेजने के दौरान वहां उपस्थित वकीलों के अनुसार मजिस्ट्रेट को यह कहते सुना गया कि प्रोफेसर शाहिद को देश हित में जेल भेजा गया है। बात तो यहां तक आ रही है कि इस पूरे प्रकरण को सीधे लखनऊ से मॉनिटर किया जा रहा है यानी प्रोफ़ेसर शाहिद के साथ जो कुछ हो रहा है सब सत्ता के इशारे पर हो रहा है।

(इंकलाबी नौजवान सभा के जिला सह संयोजक मनीष कुमार की रिपोर्ट।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

क्यों ज़रूरी है शाहीन बाग़ पर लिखी इस किताब को पढ़ना?

पत्रकार व लेखक भाषा सिंह की किताब ‘शाहीन बाग़: लोकतंत्र की नई करवट’, को पढ़ते हुए मेरे ज़हन में...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -