Tuesday, August 9, 2022

पुण्यतिथि पर विशेष: भारतीय राजनीति के दधीचि थे सुरेन्द्र मोहन

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समाजवादी चिंतक पूर्व सांसद सुरेंद्र मोहन जी से 1984 में दिल्ली पहुंचने के बाद लगातार मुलाकात होती थी। जनता दल में जनता पार्टी की तरह ही वे ही मुख्य भूमिका में थे। पार्टी की बैठक और सम्मेलनों में प्रस्ताव बनाने की जिम्मेदारी भी वे ही निभाते थे। मेरा भी पढ़ने लिखने का शौक था इस कारण सुरेंद्र मोहन जी से नजदीकी बन गई। नियमित तौर पर उनसे मुलाकात होती थी, कार्यालय में भी और घर पर भी। सुरेंद्र मोहन जी की पत्नी मंजू जी के साथ भी आत्मीय रिश्ता था। जो भी घर जाता वे सभी का ख्याल रखतीं। सभी कार्यकर्ताओं के प्रति मंजू जी का सदा स्नेहपूर्ण भाव और व्यवहार देखा। अंतिम वर्षों में मंजू जी सदा सुरेंद्र मोहन जी के साथ रहती थीं। समय से दवाई लें, विश्राम करें, इसका विशेष ध्यान रखती थीं। 

समाजवादी आंदोलन में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी तथा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के आधार पर विभाजन जमीनी स्तर तक रहा। सुरेंद्र मोहन जी पीएसपी से थे। मुझे जॉर्ज फर्नांडिस जी और मधु लिमये जी के साथ जुड़ा होने के कारण एसएसपी खेमे का माना जाता था। हालांकि कभी भी मैंने इस तरह का पूर्वाग्रह अपने पूरे राजनीतिक जीवन में नहीं रखा। लेकिन मैंने देखा, जहां कहीं भी पार्टी के पदाधिकारी बनाए जाते स्पष्ट तौर पर राज्यवार सुरेंद्र मोहन जी की सूची में सभी समाजवादी कार्यकर्ता प्राथमिकता पाते थे। यूपी में वे विशेष रुचि लिया करते थे। सोशलिस्ट इंटरनेशनल से उनका खास रिश्ता था। हम कई बार आईयूएसवाई और एसआई की बैठकों में साथ गए। वे लगातार अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को फॉलो किया करते थे। युवा जनता में भी काम करते हुए उन्होंने एक बार कहा था आप युवा जनता वाले महिलाओं को बढ़ावा नहीं देते। कहीं भी आपकी कमेटी में लड़कियां नहीं होतीं। तभी हमने राष्ट्र सेवा दल से एक महिला साथी को युवा जनता की ओर से सहयोग किया।सुरेंद्र मोहन जी के कहने पर  उन्हें अपनी तरह इंटरनेशनल यूनियन ऑफ सोशलिस्ट में उपाध्यक्ष बनवाने में भी सहयोग किया।

सुरेंद्र मोहन जी का नजदीकी संबंध मधु दंडवते जी और बापू कालदाते जी से था। मैं भी दोनों से उनके साथ मिलता रहता था। बापू जी से मुलाकात इसलिए ज्यादा होती थी क्योंकि वे जनता पार्टी बाद में जनता दल कार्यालय में नियमित तौर पर बैठते थे। हम भी नियमित तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध कार्य के बाद वहीं बैठते थे। यादव रेड्डी, विमल धर, अरूण श्रीवास्तव, विजय दुबे, कैप्टन विक्रम सिंह और अन्य साथी नियमित बैठते थे। सुरेंद्र मोहन जी के करीबी तत्कालीन सांसद जयपाल रेड्डी जी के यहां बाकी समय अड्डेबाजी होती थी। वीपी सिंह जी (पूर्व प्रधानमंत्री) से भी मेरा गहरा रिश्ता था। वे भी भारतीय राजनीति में सुरेंद्र मोहन जी और मधु दंडवते जी को सर्वोच्च स्थान देते थे।उन्हें भारतीय राजनीति के दधीचि कहते थे।

सुरेंद्र मोहन जी के साथ मेरा नजदीकी संबंध मुलताई गोली चालन की 12 जनवरी 1998 की घटना के बाद हुआ। हालांकि उसके पहले हम एक ही स्थान वीपी हाउस में रहते थे। हर दिन कई बार मिलते थे लेकिन गोलीकांड ने हमें बहुत नजदीक ला दिया। मैं यह कह सकता हूं कि सुरेंद्र मोहन जी ने गोली चालन के बाद जितना समय किसान संघर्ष समिति मुलताई के साथियों तथा मेरे परिवार को दिया, उतना साथ उनके अलावा उनके कद के किसी भी नेता ने नहीं दिया। जबकि इस घटना के पहले तक मैं जॉर्ज फ़र्नान्डिस एवम अन्य नेताओं के अधिक करीब था।

जब मैं जेल में था तब वे लगातार हर सप्ताह दिल्ली से मुलताई जाते थे। दिल्ली में वंदना से मिलते थे। सरकार पर दबाव डालने का काम करते थे। उन्होंने ही वी पी सिंह जी से गोली चालन के खिलाफ बयान चैनलों में प्रेस कांफ्रेंस कर दिलवाया था। उन्होंने ही दिल्ली के साथियों को जोड़कर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मुलाकात कर हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया था। वे किसान संघर्ष समिति के हर एक कार्यकर्ता को नाम से जानते थे। उन्होंने ही अनिरुद्ध मिश्रा को अनिरुद्ध गुरुजी का नाम दिया । 1998 के बाद सुरेंद्र मोहन जी की मृत्यु तक मैं समाजवादी नेताओं में उन्हीं के करीब रहा।

बाद में 10 साल विधायक रहते हुए भी जब भी दिल्ली जाता उनसे जरूर मिलता, सभी बातें बतलाता, मार्गदर्शन लेता। वे भारतीय समाजवादी आंदोलन के एनसायक्लोपिडिया थे। याददाश्त जबरदस्त थी। जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण  था।शायद ही कोई सुरेंद्र मोहन जी के स्तर का नेता देश में होगा जो डीटीसी  बस में चलता हो। दोनों पति-पत्नी आम लोगों की तरह धक्का खाते हुए बस में चला करते थे। बाद में उनके मित्रों ने उन्हें मिलकर एक कार भेंट की थी। बाद में वह कार भी चोरी हो गई। सुरेंद्र मोहन जी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 17 लाख रूपये इकट्ठे करके दिए तो उन्होंने जनता वीकली पत्रिका( यूसुफ मेहर अली सेंटर) को सौंप दिए।

जनता सप्ताहिक पत्रिका 1946 से चलती थी, उसके लिए वे नियमित तौर पर लिखा करते थे, उसके संपादक भी थे। अखबारों में भी कालम लिखा करते थे। यही उनकी रोजी-रोटी का साधन था। सुरेंद्र मोहन जी के लेखों के माध्यम से देशभर के कार्यकर्ताओं को राजनीतिक समाजवादी लाइन पता चलती थी। धैर्य तो अद्वितीय था। सुनने की क्षमता बहुत अधिक थी। सबको समय देते थे, चिट्ठी देते थे, जरूरत हो तो मंत्री के पास भी जाने का काम करते थे। मैं वीपी हाउस में देखता था कि एक वैद्य जी बाल्मीकि समाज के नेता दूसरे सूरदास जी वे लगभग रोज सुरेन्द्र मोहन जी के कार्यालय में आते थे। मैंने उन्हें कई सालों तक धैर्य पूर्वक सुनते हुए देखा।

 सुरेंद्र मोहन जी का सभी पार्टियों और राजनीतिक दलों और नेताओं के साथ संबंध था। वे सभी पार्टी के नेताओं से सेंट्रल हॉल में लगातार मिलते थे। देशभर के जन संगठनों को सुरेंद्र मोहन जी लगातार समर्थन करते थे। वे न केवल संगठनों के आंदोलनों, प्रदर्शनों में शामिल होते थे साथ ही मंत्रियों से मुलाकात कराते थे सिफारिशी पत्र भी लिखते थे और उनके इलाकों में जाते भी थे। लगातार दौरा करने का काम किया करते थे। एक व्यक्ति कैसे सबकुछ एक साथ कर सकता है यह आश्चर्य का विषय होता था। विशेष तौर पर साधनहीनता तथा अस्वस्थ होने के बावजूद भी वे लगभग सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहते थे। कश्मीर के पृथकतावादी नेता हों या देश के मुस्लिम नेता,उत्तराखंड ,पंजाब ,हिमाचल या पूर्वोत्तर के असम के नेता हो या मणिपुर के नागालैंड के नेता हों सभी से संपर्क में रहना सभी मुद्दों पर सक्रिय रहना किसी के लिए भी संभव नहीं था, लेकिन यह असंभव कार्य वे करते थे । यह काम उन्होंने कई दशकों तक किया। सुरेंद्र मोहन जी कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश भी लगातार कार्यक्रमों में भाग लेने जाते थे।अंबाला के थे इस कारण पंजाब के लोगों से उनका विशेष रिश्ता था।

भारत-पाकिस्तान के बीच शांतिपूर्ण संबंध बने इसका प्रयास सक्रिय तौर पर वे लगातार किया करते रहे। दिल्ली में जस्टिस राजेंद्र सच्चर, कुलदीप नैयर, अर्थशास्त्री एसपी शुक्ला, प्रभाष जोशी जैसे दिग्गज बराबर सुरेन्द्र मोहन जी का साथ दिया करते थे। स्वामी अग्निवेश जी सदा तैयार रहते थे किसी की भी मदद करने के लिए जो सुरेंद्र मोहन जी का संदर्भ संपर्क लेकर पहुंच जाता था। दिन रात पढ़ना और लिखना सुरेंद्र मोहन जी का मुख्य कार्य था। जॉर्ज फर्नांडिस की तरह सुरेंद्र मोहन जी भी यह चाहते थे कि सोशलिस्ट पार्टी रिवाईव हो अर्थात फिर से बने। जब देवेगौड़ा जी ने भाजपा के साथ कर्नाटक में सरकार बना ली तो वे पार्टी से अलग हो गए।

उन्होंने वीरेंद्र कुमार, केरल के साथ मिलकर अलग पार्टी का गठन किया लेकिन उस पार्टी से अधिक समाजवादी नहीं जुड़े। इसका उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। देश के समाजवादी उनसे मिलने आते थे लेकिन वे किसी से भी पार्टी में शामिल होने को नहीं कहते थे। समाजवादियों की एकता बने इसका प्रयास वे लगातार करते  रहे। विशेष तौर पर जब डॉ. लोहिया की जन्म शताब्दी का कार्यक्रम बना तथा उन्हें सभी ने जिम्मेदारी दी, तब भी उन्होंने बहुत प्रयास किया। कैप्टन अब्बास अली जी की किताब का जब विमोचन हुआ उसमें मुलायम सिंह यादव जी, रामविलास पासवान जी, रघुवंश जी, शरद यादव जी भी आए । सभी ने कहा कि सुरेंद्र मोहन जी ही एकजुटता बनाने का कार्य कर सकते हैं।

उन्होंने बहुत प्रयास किया। सभी को एक साथ बैठाने की कोशिश की, सोचा की जन्म शताब्दी में कम से कम एक रैली एक साथ हो जाए लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ लेकिन जीवन के अंतिम समय तक उनका प्रयास जारी रहा। मैंने जब डॉक्टर लोहिया के जन्म शताब्दी वर्ष में देश भर की यात्रा का कार्यक्रम तय किया तो उन्होंने भरपूर सहयोग किया सही कहा जाए तो जी जी परीख जी के बाद सर्वाधिक। जब मैंने उन्हें कार्यक्रम का रूट दिखाया , उसे देखकर उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर को क्या भारत का हिस्सा नहीं मानते, क्यों छोड़ दिया? मैंने कहा कि साधन और समय का अभाव है। उन्होंने कहा कि यदि यह राष्ट्रीय यात्रा है तो फिर उसमें पूर्वोत्तर को जोड़ा ही जाना चाहिए। उसे छोड़कर यह यात्रा नहीं की जा सकती ।

उन्हीं के आग्रह के बाद मैंने पूर्वोत्तर की दो सप्ताह की यात्रा की थी। पूरी यात्रा में यूसुफ मेहेर अली सेंटर और राष्ट्र सेवा दल के 30 युवा साथी जुड़े थे। जब  हम नगालैंड पहुंचे तब वहां एक पुराने समाजवादी नेता अचूमी जी मिले। उन्होंने कहा कि वे सुरेंद्र मोहन जी के कमांडर हैं। उनके घर में उसी दिन किसी परिवारजन की मृत्यु हो गई उसके बावजूद भी उन्होंने कार्यक्रम में समय दिया। देश में यात्रा के दौरान 350 कार्यक्रम हुए। उद्घाटन, समापन से लेकर हर  कार्यक्रम में सुरेंद्र मोहन जी ने दिलचस्पी ली। उन्होंने काफी पैसा कार्यक्रम के लिए इकट्ठा कराया।

सुरेंद्र मोहन जी के साथ मिलकर मैंने एचएमकेपी और एचएमएस के विलय का प्रयास किया था। मैं हिंद मजदूर किसान पंचायत का राष्ट्रीय उप महामंत्री था। शरद राव,  उमराव मल पुरोहित जी के बीच में बार-बार बात करवाना, गिरीश पांडे जी, नागपाल जी से लगातार बात करते रहना , यह प्रयास लगातार सुरेंद्र मोहन जी ने किया। उसी का परिणाम था कि कई बार विभाजित हो चुके समाजवादियों के मजदूर आंदोलन में एक बार फिर से एकजुटता स्थापित हो गई थी। सुरेंद्र मोहन जी ने कई दशकों तक एचएमएस को खड़ा करने और ताकत देने की कोशिश की थी। जब जमुना प्रसाद शास्त्री एचएमएस के नेता थे, समरेंद्र कुंडू, कमला सिन्हा, मधु दंडवते जी के माध्यम से उनका यह प्रयास रहा कि मैं डब्ल्यूसीएल (कोल माइंस) के इलाके में हिंद मजदूर सभा की जिम्मेदारी लूं, लेकिन अपने सतत प्रयासों के बावजूद वे मुझे हिंद मजदूर सभा में शामिल नहीं करवा सके।

लेकिन जाते-जाते वे मज़दूर आंदोलन को एकजुट करने का ऐसा काम गए जो भारतीय समाजवादी आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित होगा। 92 लाख की सदस्यता वाली यूनियन समाजवादी विचार के साथ जुड़ी हुई हो उसका भविष्य अंधकारमय हो ही नहीं सकता। इसी तरह सुरेंद्र मोहन जी ने राष्ट्र सेवा दल की भूमिका में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। लगातार उनका प्रयास रहता था कि नियमित राष्ट्र सेवा दल के कार्यक्रम में हिस्सेदारी करें। राष्ट्र सेवा दल में भी सुरेंद्र मोहन जी को परिवार के मुखिया के तौर पर सदा माना। यही भूमिका हिंद मजदूर सभा में सुरेंद्र मोहन जी की रही।

सोशलिस्ट फ्रंट में मैं लगातार सुरेंद्र मोहन जी का साथ देता था। हमारी यात्रा के बाद पूना में सोशलिस्ट फ्रंट की बैठक हुई। तब उन्होंने पार्टी के गठन की बात कही, मैंने कहा कि इस बात का विश्लेषण किया जाना चाहिए कि 10 वर्षों तक समाजवादी जन परिषद टेक ऑफ क्यों नहीं कर पाई ?फिर उन कमियों को दूर करके ही पार्टी खड़ी की जानी चाहिए। सुरेंद्र मोहन जी ने कहा कि हमें अवसर देना चाहिए। एक दिन आश्चर्यजनक तौर पर सुरेंद्र मोहन जी ने मुझसे कहा कि मैं आपसे बात करना चाहता हूं मेरे लिए यह अप्रत्याशित था। वीपी हाउस के रेस्टोरेंट में हम साथ बैठे। वहां उन्होंने कहा कि पार्टी बनानी है मैंने कहा कि बनाईए लेकिन मेरा शामिल होना संभव नहीं होगा। असल में सुरेंद्र मोहन जी ने मुझे नई पार्टी का गठन करने वाली कमेटी में जब पुणे में रखा था, तभी मैंने कहा था कि मैं समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय सचिव रहते हुए यह काम नहीं कर सकता।

नई पार्टी का गठन करने की कमेटी में रहना अनैतिक होगा। मैंने कहा कि एचएमएस और राष्ट्र सेवा दल यदि सिद्धांततः का यह स्वीकार कर ले कि अनौपचारिक तौर पर वे नवगठित पार्टी का सहयोग करेंगे तब मैं पार्टी के गठन में बढ़ चढ़ कर सहयोग कर सकता हूं। हम एचएमएस कार्यालय भी गए। एचएमएस तथा राष्ट्र सेवा दल का रुख एकदम स्पष्ट था। हम किसी भी पार्टी के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकते। हमने 75 वर्षों तक अपने संगठन को पार्टियों से अलग और ऊपर रखा है, इस नीति में तब्दीली नहीं हो सकती है। हालांकि हमारा रिश्ता दोस्ताना जैसे अब तक रहा समाजवादियों के साथ में, वही रहेगा, पार्टी के साथ भी रहेगा। कुल मिलाकर बात आगे नहीं बढ़ी।

सुरेंद्र मोहन जी हमारे युवा प्रशिक्षण शिविरों में नियमित आया करते थे। युवाओं को ग्रामोद्योग, समाजवादी आंदोलन के बारे में प्रशिक्षण दिया करते थे। युवाओं से इंटरेक्ट करने में लगातार रूचि लेते थे। सुरेंद्र मोहन जी के माध्यम से ही मैं जीजी परीख जी के संपर्क में आया तथा उनसे घनिष्ठता बढ़ी। सुरेंद्र मोहन जी हमारे परिवार के बुजुर्ग मार्गदर्शक के तौर पर रहे। वे वंदना से लगातार संपर्क में रहते थे। परिवार का सुख-दुख बांटा करते थे। बेटे शाश्वत के साथ तो उनका बहुत ही घनिष्ठ रिश्ता था। वह उन्हें दादाजी कहता था। वीपी हाउस में शाश्वत के साथ घंटों खेला करते थे। हम सबको आश्चर्य होता था कि शाश्वत के साथ उनकी ढिशुम ढिशुम चालू रहती थी। मैंने अपने जीवन में तमाम फैसले सुरेंद्र जी के साथ परामर्श करने के बाद किए। उसमें से वंदना जी के साथ शादी करना भी एक महत्वपूर्ण फैसला था।

वंदना की बहन विनय भारद्वाज जी महिला दक्षता समिति में सक्रिय थीं और सुरेंद्र मोहन जी के साथ संपर्क में थीं। विनय भारद्वाज जी ने सुरेंद्र मोहन जी के घर पर ही मुझे सबसे पहले वंदना जी के बारे में बताया था ,शास्त्री भवन में मुलाकात करवाई थी। मुझे याद है मैंने किसान मज़दूर आदिवासी क्रांति दल का गठन सुरेंद्र मोहन जी के परामर्श के बाद ही किया था। मुलताई में गोली चालन के बाद जब चुनाव हुआ, तब मैं चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं था लेकिन सुरेंद्र मोहन जी ने मुझे तैयार किया था। साधनों के इंतजाम का आश्वासन देकर किसान महापंचायत चिखली कला में मेधा पाटकर जी और बीडी शर्मा जी की उपस्थिति में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। मैंने कहा था कि मेरे पास ना तो जातिगत आधार है, ना पैसा है ना गुंडे हैं न शराब बांटने में मेरा विश्वास है, इस कारण मैं चुनाव नहीं लडूंगा। लेकिन किसानों के आग्रह पर यह फैसला हो गया। सुरेंद्र मोहन जी ने देवगौड़ा जी से मिलकर 4 लाख की आर्थिक मदद का इंतजाम किया।

मुझे नहीं लगता है कि मैं बिना सुरेंद्र मोहन जी के आर्थिक मदद से चुनाव लड़कर जीत सकता था। लेकिन कमाल की बात यह है कि उन्होंने कभी भी मुझसे इस बात का उल्लेख ही नहीं किया। दूसरी बार जब चुनाव लड़ने की बात आई, तब हमारे 25 साथी मध्य प्रदेश में अलग-अलग जगह चुनाव लड़ना चाहते थे। हमारे पास चुनाव लड़ने के लिए साधन नहीं था। पूर्व विधायक गौरी शंकर शुक्ला जी बार-बार आग्रह कर रहे थे कि हमें मुलायम सिंह यादव जी से बात करना चाहिए। तब मैंने सुरेंद्र मोहन जी से पूछा उन्होंने कहा कि जरूर बात करना चाहिए उन्होंने कहा मुलायम सिंह यादव के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। समाजवादी पार्टी में क्रांति दल का विलय कर देना चाहिए। हमने यही किया, भोपाल में कार्यक्रम आयोजित कर क्रांति दल का विलय समाजवादी पार्टी में कर दिया। उस कार्यक्रम में मुलायम सिंह जी के अलावा जनेश्वर मिश्र जी भी मौजूद थे। सुरेंद्र मोहन जी कमाल के व्यक्ति थे,  वी पी सिंह जी चाहते थे कि उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया जाए लेकिन सुरेंद्र मोहन जी ने कहा कि सामाजिक न्याय के आंदोलन को ताकत देने के लिए किसी पिछड़े वर्ग के साथी या अल्पसंख्यक वर्ग के साथी को राज्यसभा दी जानी चाहिए, ऐसा ही हुआ।

यह दुखद है कि जिस तरह जॉर्ज फर्नाडिस के विचारों को आगे बढ़ाने वाली कोई पार्टी नहीं है , उसी तरह सुरेंद्र मोहन जी की विरासत को आगे ले जाने वाली कोई ताकत दिखलाई नहीं देती, जैसी एक जमाने में सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी या जनता दल था। हां, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया का गठन करके वे गए हैं।

सुरेंद्र मोहन जी के विचारों और आचरण से में प्रेरणा लेता रहा हूँ ।

लेता रहूंगा ।

(डॉ सुनीलम द्वारा यह लेख 15 नवंबर 2012 को भोपाल सेंट्रल जेल में लिखा गया था।)

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