Wednesday, July 6, 2022

शहीदों के स्मारक के लिए दी जमीन लेकिन आज भूखों मरने की नौबत

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जालियांवाला बाग (13 अप्रैल, 1919) से पहले का जालियांवाला बाग, यानी अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता का पहला गवाह बना था, झारखंड के खूंटी जिला अंतर्गत मुरहू प्रखंड का डोंबारी बुरू। जहां आज से ठीक 121 साल पहले 9 जनवरी, 1900 को ब्रिटिश सेना-पुलिस और बिरसा मुंडा के आंदोलनकारियों के बीच जंग छिड़ी थी। सईल रकब से लेकर डोंबारी बुरू तक घाटियां सुलग उठी थीं। 25 दिसंबर, 1899 से लेकर नौ जनवरी 1900 तक खूंटी के कई इलाकों सहित रांची से लेकर खूंटी-चाईबासा तक अशांत था। मुंडा आंदोलनकारियों के साथ 9 जनवरी की लड़ाई अंतिम लड़ाई साबित हुई।

इसमें सैकड़ों निहत्थे आदिवासियों की बड़ी क्रूरता से अंग्रेजी फौज द्वारा हत्या कर दी गई। आदिवासियों की इस शहादत को हर साल 9 जनवरी को अंतिम उलगुलान के रूप में याद किया जाता है। उन्हीं की याद में 110 फीट ऊंचा विशाल स्तंभ का निर्माण किया गया। जो अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता व सैकड़ों आदिवासियों की शहादत की यादगार बना हुआ है। उस ऐतिहासिक युद्ध की स्मृति में डोंबारी पहाड़ पर एक विशाल स्तंभ का निर्माण मुंडारी भाषा के विद्वान जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से किया गया। इस ऐतिहासिक लड़ाई की स्मृति में एक स्मारक निर्माण के लिए ‘बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति’ का गठन किया गया जिसके डॉ रामदयाल मुंडा सचिव बनाए गए। पहाड़ पर 110 फीट ऊंचा डोंबारी बुरू का स्मारक पत्थरों से बनाया गया वहीं पहाड़ की तलहटी में एक मंच भी बनाया गया और उसके पास ही 30 फीट की बिरसा मुंडा की कांस्य प्रतिमा भी स्थापित की गई। इसी स्मारक निर्माण के लिए बिशु मुण्डा द्वारा 1990 में 80 डिस्मिल जमीन दान स्वरूप दी गई।

इसके बाद 1990 में ही जिला अभियंता, जिला परिषद कार्यालय, रांची द्वारा ज्ञापांक — 223, दिनांक – 24—8—1990 के तहत बताया गया कि कुपु मुण्डा पिता भोज मुण्डा ग्राम जोजोहातू एवं बिशु मुण्डा पिता सुगना मुण्डा ग्राम गुटुहातू को डोम्बारी स्थित बिरसा भगवान की मूर्ति प्रतिस्थापन के बाद दिनांक – 1—8—1990 से दैनिक मजदूरी पर रात्रि प्रहरी सह चौकीदार सह पहरेदार के पद पर अस्थायी तौर पर नियुक्त किया जाता है। यह नियुक्ति अस्थायी है एवं बिना किसी कारण बताए किसी भी समय में नियुक्ति रद्द की जा सकती है। लेकिन 1996 में उनकी नियुक्ति रद्द करने की उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई और अचानक उनका वेतन बंद कर दिया गया।

इस मामले को लेकर बिशु मुण्डा संबंधित अधिकारियों के दर्जनों चक्कर लगाए। मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात रहा, आज तक बिशु मुंडा को इंसाफ नहीं मिला।

बिशु मुण्डा बताते हैं कि स्मारक स्थल की 1 अगस्त, 1990 से चौकीदारी, सह रात्रि पहरेदारी के लिए प्रतिमाह 800/- मिलता था, परन्तु 27 जुलाई 1996 के बाद यह बन्द कर दिया गया। बिशु मुण्डा बताते हैं कि इसके लिए 1997 के बाद हमेशा स्थानीय विधायक, सांसद, स्थानीय नेताओं आदि से प्रायः बंद वेतन के लिए गुहार लगाता रहा परन्तु आज तक मेरी समस्या को किसी ने नहीं सुना, हमेशा आश्वासन ही मिला। यह पूछे जाने पर कि वे इस पर क्या चाहते हैं?

बिशु मुण्डा कहते हैं कि मुझे न्यूनतम सरकारी दर से जब से वेतन देना बन्द किया गया है, तब से आज तक का वेतन मुझे मिलना चाहिए और आने वाले समय में भी निरंतर मिलते रहना चाहिए।

बिशु मुण्डा की पारिवारिक स्थिति के अनुसार पत्नी – नन्दी देवी – उम्र 62 वर्ष, बड़ा बेटा – सोमा मुण्डा, उम्र-41 वर्ष, शिक्षा – निरक्षर,

छोटा बेटा करम सिंह मुण्डा, उम्र- 30 वर्ष शिक्षा – 9 वीं पास, एक पोता जो 10 वर्ष का है और पहली कक्षा में पढ़ता है, एक पोती 7 साल की है।

कहना ना होगा कि झारखंड के खूंटी जिला अंतर्गत डोंबारी बुरू में मेला आयोजित करने के लिए अखाड़ा, भवन और भगवान बिरसा मुंडा की जहां प्रतिमा बनायी गयी है। उसके निर्माण के लिए कुल 80 डिसमिल जमीन देने वाले बिशु मुंडा की आज काफी दयनीय स्थिति है।

बता दें कि उक्त स्थल की देखरेख के लिए उन्हें ही नौकरी पर रखा गया था। शुरुआत में उन्हें जिला परिषद से वेतन दिया जा रहा था, लेकिन नवंबर 1996 से वेतन भी बंद हो गया। बिशु के मुताबिक, उन्हें दिया गया आश्वासन पूरा नहीं किया गया है। मतलब कि शहीदों पर झारखंड की सरकार आज तक औपचारिकता ही निभाती रही है।

बिशु मुंडा से बात करने पर उन्होंने जो बताया उससे यह तो स्पष्ट हो गया कि आदिवासी समाज भी गैर-आदिवासी वातावरण से प्रभावित हो चुका है। यहां जो भी आता है वह बिशु मुंडा को आश्वासन का झुनझुना थमा जाता है।

जितना बिशु मुंडा ने बताया उसके अनुसार उन्होंने बिरसा मुंडा एवं अन्य शहीदों के स्मारक के लिए अपनी 80 डिसमिल जमीन 1990 में अनुदान में दिया तथा स्मारक बनने के बाद उन्हें वहां बारी चौकीदार यानी उस क्षेत्र की देखभाल के लिए डिपुट किया गया। लेकिन अचानक 1996 के बाद से अभी तक उन्हें मानदेय या वेतन कुछ भी नहीं मिला है। उन्हें आज भी किसी ऐसे फ़रिश्ते का इन्तजार है जो उन्हें उनका हक दिलवा सके। लेकिन अभी तक ऐसा कोई नहीं मिला, जबकि वे हर वर्ष 9 जनवरी डोंबारी बुरू स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि देने आने वाले सांसद, विधायक, मंत्री, समाजसेवी एवं सरकारी अफसरों तक को अपनी डिमांड लिखित में देते रहे हैं।

वैसे लगभग 65 वर्षीय बिशु मुंडा की अजीविका का साधन एक मात्र खेतीबाड़ी है। उनके दो बेटे हैं जो पूरी तरह खेती पर ही आश्रित हैं।

बता दें कि खूंटी में आदिवासियों की जनसंख्या 70% से अधिक है और खूंटी में  खूंटकट्टी और भूईंहरी वाले विशेष क्षेत्र के लगभग 2500 ग्राम हैं जिन पर कोई भूमि सुधार /अधिग्रहण के कानून नहीं लागू हो सकते हैं न ही इस क्षेत्र की जमीन की खरीद बिक्री हो सकती है। डोंबारी बुरू भी इसी क्षेत्र के तहत आता है अतः ऐसे में किसी को भी जमीन केवल अनुदान के तहत ही दिया जाता है। जिसका न तो मुआवज़ा होता है न ही कोई कीमत होती है। सो बिशु मुंडा द्वारा दी गई 80 डिसमिल जमीन की कोई कीमत भी नहीं दी गई।

बिशु मुण्डा द्वारा लगातार अपनी समस्या को रखने के बाद 2012 में उप विकास आयुक्त-सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद, खूँटी द्वारा पत्रांक 156/ जि.प. दिनांक 08.05.12 के आलोक में उप विकास आयुक्त-सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, जिला परिषद, रांची को एक पत्र भेजकर कहा गया कि उपर्युक्त विषय प्रासंगिक के संबंध में कहना है कि आपके आदेश ज्ञापांक 117 दिनांक 26.05.1993 द्वारा श्री बिशु मुण्डा, पिता स्व० सुगना मुण्डा, ग्राम-गुटुहातु टोला सेकरे, थाना-मुरडू, जिला-खूँटी को डोम्बारी पहाड़ पर स्थापित बिरसा भगवान की मूर्ति की देख-भाल हेतु चौकीदार के पद पर दैनिक मजदूरी पर नियुक्त किया गया। श्री मुण्डा, द्वारा उपलब्ध कराये गये आवेदन में दिनांक 01.08.1990 से दिनांक 01.10.1996 तक नियमित रूप से मजदूरी का भुगतान करने की बात कही गयी है एवं दिनांक 01.11.1996 से मजदूरी का भुगतान बंद रहने के फलस्वरूप लंबित मानदेय राशि का भुगतान करने का अनुरोध किया गया है। आवेदन पत्र पर माननीय मंत्री श्री नीलकण्ठ सिंह मुण्डा, ग्रामीण विकास विभाग, झारखण्ड, रांची के द्वारा नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई हेतु अग्रसारित किया गया है। उक्त मामला राँची जिला से संबंधित है। अतः श्री मुण्डा का आवेदन मूल रूप में संलग्न करते हुए अनुरोध है कि उनके आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए नियमानुसार अग्रेतर कारवाई किया जाय।

 बावजूद आजतक इस पत्र पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई।

सबसे दुखद व आश्चर्यजनक बात यह है कि बिशु मुण्डा के आधार कार्ड में उनकी जन्मतिथि 1974 लिखा हुई है जो उन्हें मिलने वाली तमाम सरकारी सुविधाओं से वंचित करती है। उन्हें वृद्धा पेंशन की भी कोई संभावना नहीं है। शायद यह बात खुद बिशु मुण्डा को या उनके बेटों को भी नहीं पता है।

घर का स्थिति बहुत दयनीय है। खेतीबाड़ी के अलावा कोई अन्य साधन नहीं है। 

लोक कलाकार व संस्कृति कर्मी सुखराम पाहन कहते हैं कि बिशु मुण्डा के हिस्से में तकरीबन मात्र 6 एकड़ जमीन है। उसमें भी खेती योग्य जमीन बहुत कम है। फिर भी इन्होंने अमर शहीदों के लिए जमीन दान की, यह राज्य के लिए जितना गर्व बात है उतना ही उनकी उपेक्षा राज्य के लिए शर्म की बात है। वे आगे कहते हैं कि सरकारी तंत्र द्वारा बिशु मुण्डा की उपेक्षा केवल उनकी उपेक्षा या अपमान नहीं है बल्कि यह बिशु मुण्डा के साथ-साथ शहीदों का भी अपमान है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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