प्रेम, मनुष्य की सबसे स्वाभाविक और मूलभूत अनुभूतियों में से एक है। यह किसी निर्देश या आदेश से जन्म नहीं लेता। यह स्वतः होता है। यह जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, क्षेत्र, भाषा और रंग की सीमाओं को लांघने की शक्ति रखता है। लेकिन जब कोई भावना इस कदर स्वतः और मुक्त होती है, तो वह हर उस सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा बन जाती है जो नियंत्रण, अनुशासन और वर्चस्व के आधार पर बनी है।
इज़्ज़त के नाम पर हत्या, जिसे हम प्रचलित भाषा में ‘ऑनर किलिंग’ कहते हैं, दरअसल प्रेम पर सामूहिक हमला है। यह महज़ व्यक्तिगत द्वेष या आवेग की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक-आर्थिक ढांचे की सुनियोजित प्रतिक्रिया है, जो स्वतंत्र प्रेम को अपने लिए चुनौती मानता है।
जब एक युवक या युवती अपने परिवार, जाति, वर्ग या समुदाय की सीमाओं से बाहर जाकर प्रेम संबंध बनाता है, खासतौर पर अगर वह विवाह की ओर बढ़ता है, तो यह कार्य केवल दो लोगों के बीच संबंध नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था की नींव पर चोट बन जाता है जो रक्त, वंश और पूंजी के नियंत्रण पर आधारित है। यही कारण है कि ऑनर किलिंग की सबसे अधिक घटनाएं उन्हीं तबकों में होती हैं जहाँ निजी संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और जातीय शुद्धता को लेकर सबसे अधिक चिंता होती है।
यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि ‘इज़्ज़त’ वास्तव में क्या है? यह कोई भावनात्मक या नैतिक अवधारणा नहीं, बल्कि सत्ता, पूंजी और उत्तराधिकार का रूपांतरण है। परिवार में इज़्ज़त का मतलब होता है परंपरा की रक्षा, निर्णयों पर नियंत्रण, और सामाजिक छवि का प्रबंधन। जब कोई युवा अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह करता है, खासतौर पर किसी निचली जाति या ग़रीब वर्ग के व्यक्ति से, तो यह परिवार की सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा को हिला देता है।
इस इज़्ज़त के पीछे जो सबसे बड़ा डर छिपा होता है, वह है ‘विरासत’ का बिखराव। जिस समाज में उत्तराधिकार पितृसत्तात्मक है, वहाँ विवाह का अर्थ होता है-संपत्ति, भूमि, रिश्ते और अधिकारों का नियंत्रित और स्वीकृत हस्तांतरण। स्त्रियों को यहाँ महज़ माध्यम या वाहक के रूप में देखा जाता है, जिनके माध्यम से वंश और संपत्ति आगे बढ़ते हैं।
अगर कोई महिला अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति से प्रेम कर बैठती है, तो यह पूरा ढांचा संकट में आ जाता है। इसलिए प्रेम करने वाली स्त्री को सबसे पहले मारने का निर्णय लिया जाता है क्योंकि वह ‘परिवार की संपत्ति’ है, जिसे किसी और के हाथ जाने से पहले नष्ट कर देना बेहतर समझा जाता है।
प्रेम केवल भाव नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध गहरा व्यक्तिगत विद्रोह है; खासतौर पर तब, जब यह व्यक्ति की इच्छा और चुनाव पर आधारित होता है। ऐसे समाज में, जो हर चीज़ को अनुशासन और नियंत्रण से संचालित करता है, प्रेम की स्वतः स्फूर्तता असहनीय हो जाती है। प्रेम, व्यवस्था के बनाए हुए नियमों को तोड़ता है; वह जातियों के बीच की दीवार गिरा देता है; वह कहता है कि मनुष्य मनुष्य है, न कि किसी जाति, वर्ग या कुल का प्रतिनिधि।
इसलिए प्रेम को कुचलने के लिए हिंसा की जरूरत पड़ती है। यह हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि मानसिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर भी होती है। प्रेम करने वाले युवा घरों से निकाल दिए जाते हैं, पंचायतों में उन्हें अपमानित किया जाता है, पुलिस-प्रशासन उनके विरुद्ध कार्यवाही करता है, और सबसे चरम स्थिति में उनकी हत्या कर दी जाती है।
ऑनर किलिंग की घटनाओं में सबसे अधिक निशाना स्त्रियाँ बनती हैं, और यह संयोग नहीं है। दरअसल, इस पूरी व्यवस्था में स्त्री की स्वतंत्रता से अधिक ख़तरनाक कोई चीज़ नहीं होती। स्वतंत्र स्त्री वह खतरा है जो वंश, संपत्ति, जाति और सत्ता को बहा ले जा सकता है। वह अपने निर्णय स्वयं लेती है, अपने लिए जीवनसाथी चुनती है, और अपनी देह और भावना पर स्वयं अधिकार जताती है। ऐसे में उसे मार देना, या उसकी स्वतंत्रता को कुचल देना, उस समाज के लिए आवश्यक कार्य बन जाता है जो स्त्री को केवल माँ, पत्नी, बेटी या बहन के रूप में देखना चाहता है, स्वतंत्र मनुष्य के रूप में नहीं।
आधुनिक समाज, जो पूंजी पर आधारित है, रिश्तों को भी बाजार की दृष्टि से देखने लगा है। विवाह केवल सामाजिक या भावनात्मक संबंध नहीं रह गया है; वह पूंजी, हैसियत और वर्ग स्थिति का प्रतिबिंब बन गया है। लड़की की शादी ‘अच्छे परिवार’ में करने की होड़, दहेज जैसी कुप्रथाओं की प्रासंगिकता, और ‘समाज में क्या मुँह दिखाएँगे’ वाली मानसिकता, दरअसल उस पूंजीवादी चेतना का हिस्सा है जो हर चीज़ को ‘सौदे’ की तरह देखती है।
इस ढांचे में प्रेम ‘अनधिकृत लेन-देन’ बन जाता है। वह ऐसा सौदा है जो बिना समाज की अनुमति के हुआ है, और इसलिए अवैध माना जाता है। जब प्रेम इस बाजारू सोच को चुनौती देता है, तब समाज बदले में हत्या के रूप में अपनी सबसे हिंसक प्रतिक्रिया देता है।
लेकिन यह स्थिति अपरिवर्तनीय नहीं है। समाज के भीतर ऐसे क्षेत्र और तबके भी हैं जहाँ प्रेम पर इतनी हिंसा नहीं होती। यह वे जगहें हैं जहाँ पूंजी की पकड़ कमजोर है, जातीय सत्ताएँ ढीली हैं, और संबंधों को अस्तित्व की प्राथमिकताओं के नीचे रखा गया है। उदाहरण के लिए, श्रमिक वर्ग या विस्थापित समुदायों में, जहाँ रोज़ की रोटी का संघर्ष ज्यादा बड़ा होता है, वहाँ प्रेम संबंधों को उतनी कठोरता से नहीं देखा जाता। इसका कारण यह है कि वहाँ ‘इज़्ज़त’ और ‘संपत्ति’ की अवधारणाएँ उतनी मजबूत नहीं होतीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं केवल सांस्कृतिक या नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि वर्गीय और भौतिक प्रश्न भी हैं। जहाँ पूंजी का नियंत्रण अधिक है, वहाँ प्रेम पर नियंत्रण भी अधिक है। जहाँ समाज ज़्यादा असमान है, वहाँ प्रेम की स्वायत्तता भी ज़्यादा अस्वीकार्य है।
ऑनर किलिंग के प्रश्न पर अक्सर कहा जाता है कि सख्त कानून बनाकर इस पर रोक लगाई जा सकती है। लेकिन सच्चाई यह है कि कानून सामाजिक इच्छा के बिना प्रभावी नहीं होता। अगर समाज की सोच नहीं बदलेगी, तो कानून केवल हत्या के बाद कागज़ पर बयान दर्ज करेगा। असली ज़रूरत उस संरचना को बदलने की है जो इस हिंसा को जन्म देती है। जब तक परिवार, जाति और वर्ग के गठबंधन प्रेम से अधिक मजबूत रहेंगे, तब तक कोई भी कानून इसे नहीं रोक पाएगा।
प्रेम कोई व्यक्तिगत भावना भर नहीं है; वह क्रांति है, मौन और गहरी क्रांति, जो मनुष्य को उसके वास्तविक अस्तित्व की ओर ले जाती है। यह क्रांति तब पूरी होगी जब समाज उस ढांचे को त्याग देगा जो व्यक्ति की इच्छा को वर्ग, जाति, और उत्तराधिकार के दायरों में कैद करता है। जब तक समाज यह समझ नहीं पाएगा कि प्रेम सम्मान को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे नया अर्थ देता है, तब तक हम इज़्ज़त के नाम पर लाशें उठाते रहेंगे।
जिस दिन समाज यह स्वीकार करेगा कि व्यक्ति का चयन ही उसकी सबसे बड़ी गरिमा है, उस दिन प्रेम अपराध नहीं, आज़ादी की पहली निशानी बनेगा। तब ‘इज़्ज़त’ हत्या में नहीं, प्रेम में दिखाई देगी। और तब हम कह पाएंगे कि हमने ऐसा समाज रच लिया है, जहाँ प्रेम करने के लिए जान गंवानी नहीं पड़ती, बल्कि प्रेम ही वह आधार है, जिस पर मानवीय समाज की नींव रखी गई है। एक दिन आएगा जब प्रेम किसी सरहद का नाम नहीं होगा, जब दो दिलों के मिलन को किसी कुल की हार नहीं समझा जाएगा। वह दिन, जब घर की चौखटें साँकल नहीं, स्वागत बनेंगी। तब न खून बहेगा, न नाम मिटेंगे, न प्रेमी छिपकर जिएँगे। चाँदनी रात में खुले मैदानों में लोग खुलकर एक-दूसरे का हाथ थामेंगे, और समाज की परिभाषा में पहली बार लिखा जाएगा-इज़्ज़त वह है, जहाँ प्रेम जीवित रहता है।
(मनोज अभिज्ञान स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)