एक बाप के हाथों बेटी का क़त्ल… और नफरती समाज की गंदगी !

यह बात अब साफ होती जा रही है कि संघ और उसके बनाए हुए आनुषांगिक गिरोहों ने उत्तर भारतीय समाज को नफरती माहौल से पूरी तरह सड़ा दिया है। और यह समाज लगातार रसाताल में गिरता ही जा रहा है।

इस बात के सैकड़ों उदाहरण हैं हर हफ्ते हर दिन ऐसी वारदातें उत्तर भारतीय राज्यों में देखने को मिल रही हैं। समाज में सदियों से चल रहे दलित उत्पीड़न से अगर शुरू किया जाए तो महिलाओं के साथ सांस्कृतिक शोषण और लव जिहाद जैसे फ़र्ज़ी नैरेटिव तक नफ़रत, कुण्ठा और समाज की अधोगति की घटनाएं आइने में साफ दिखाई दे रही हैं।

भारतीय समाज में पहले से ही चली आ रही जातीय श्रेष्ठता से पैदा हुई सामाजिक आर्थिक असमानता ने इसे और गहरा कर दिया है। इसी हफ्ते हरियाणा में एक लड़की की उसके बाप के हाथों क़त्ल होने की वारदात इसकी ताज़ा और जीती-जागती मिसाल है।

शुरू में जब ये खबर आई कि एक पिता ने अपनी ही बेटी को इसलिए मार डाला कि, लोग इस बात के ताने दे रहे थे कि वो अपनी बेटी की कमाई खा रहा है। पुरुषवादी मानसिकता के वर्चस्व और श्रेष्ठता की ऐसी घटनाएं देश में कोई नई नहीं हैं, लेकिन इसके फौरन बाद जो हुआ या हो रहा है वो बेटियों आगे बढ़ाने की कथित सदाशयता पर प्रश्न चिन्ह है।

नफ़रती समाज ने इस साफ साफ क़त्ल को इज़्ज़त और विश्व बंधुत्व की संस्कृति से जोड़ दिया। करीब पच्चीस साल की राधिका यादव गुरुग्राम हरियाणा में टेनिस की खिलाड़ी थी, जब हेल्थ प्रॉब्लम की वजह से खेल नहीं पा रही थी तो टेनिस सिखाने के लिए टेनिस अकादमी खोलकर बच्चों को टेनिस सिखाने लगी। इससे कितनी आमदनी हो रही थी यह तो पता नहीं लेकिन इससे बाप को अपनी बेइज्जती दिख रही थी।

शुरुआत में यही राधिका के क़त्ल की वजह बताई गई।

यह खबर पूरे समाज के लिए और ख़ासकर खुले के लोगों के लिए सदमे और गुस्से वाली थी। सोशल मीडिया में इस वारदात की निंदा करने के साथ साथ कानून के मुताबिक इंसाफ की मांग की जा रही थी।

इसी बीच इस वारदात में नफरती संगठनों ने एक मुस्लिम एंगल खोज लिया। आरती की जान-पहचान या दोस्ती एक मुस्लिम यूट्यूबर से रही होगी जैसी पिछले कई दशकों से पूरे मुल्क में ऐसी जान पहचान और दोस्ती आम है।

राधिका ने दो साल पहले उस मुस्लिम यूट्यूबर के साथ मिलकर एक चैनल के लिए गाना शूट करवाया था, ………..बस इसी यूट्यूब के गाने ने दो साल बाद राधिका के क़त्ल की वारदात को मुस्लिम नफ़रत में बदल दिया।

अब आनर किलिंग के केस का नैरेटिव मुस्लिम समुदाय से नफ़रत करने में बदल गया। अब जिस बाप ने अपनी जवान बेटी की चार पांच गोलियां चलाकर जान ली, वो क़ातिल अब नफ़रती गिरोह द्वारा समाज का हीरो बनाया जा रहा है।

सोचने की बात है कि एक बाप ने अपनी बेटी का क़त्ल कर दिया और यह नफरती लोग उस क़ातिल की जय जयकार कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि वहां पर एक मुस्लिम लड़के का संबंध एक पुराने वीडियो शूट के माध्यम से निकाल लिया है। और चूंकि मुस्लिम/मुस्लिम धर्म को नफरती गिरोह ने अपनी को प्रेरण का स्रोत बना लिया है।

अब चाहे मुस्लिम युवा से राधिका की जान-पहचान हो या दोस्ती नफरतियों को अपना टारगेट मिल गया अभी यह कहीं से कंफर्म नहीं है कि उस मुस्लिम लड़के से मृतका का कोई प्रेम प्रसंग था।

सोशल मीडिया में बेटी के क़त्ल के घिनौने जुर्म को नफ़रती घिनौने कीड़े बाप और खानदान की ‘इज़्ज़त के नाम’ पर जायज़ ठहराने लगे हैं। ये वही लोग हैं जो नफरत के चश्मे से हर इंसानी रिश्ता देखना चाहते हैं। नफरती कीड़ों ने लड़की को भी बदनाम करना शुरू कर दिया है और लव जिहाद का एंगल डालकर उसके पिता की जय जयकार करना शुरू कर दिया है ।

राधिका और उस लड़के के बीच बस एक दोस्ती थी – जो बेहद आम सी चीज़ है, और अगर उससे आगे भी कुछ होता, तब भी कोई बाप बेटी की जान लेने का हक़दार नहीं हो जाता।

लेकिन राधिका की एक दोस्त ने सोशल मीडिया में आकर इस बात को ग़लत बताया कि राधिका का मुस्लिम युवक के साथ अफेयर था। दोस्त के मुताबिक राधिका को पारिवारिक बंदिशों की वजह से दबाव था।

ख़ुद वो लड़का सामने आकर कह रहा है कि उसका इस वारदात से कुछ लेना-देना नहीं है, और वो राधिका के टच में नहीं था। वो पुलिस की जांच में पूरा सहयोग कर रहा है। उसके बयान से से इत्तेफाक न भी रखा जाए तब भी दिन दहाड़े हुए इस क़त्ल के सभी पहलू साफ़ है। क़त्ल की रिपोर्ट जो उसके चाचा ने लिखवाई है उससे और पुलिस की शुरुआती तफतीश से क़ातिल की साफ़ निशानदेही है।

मगर जो लोग पहले इंसाफ़ की बात कर रहे थे, वो अब कातिल बाप को ‘इज़्ज़त बचाने वाला’ बताने लगे हैं।

सोशल मीडिया के इंफ्लूएंसर डॉ. सलमान अरशद का कहना है कि यह सोचने की बात है कि समाज कहाँ पहुँच गया है?

जब एक लड़की की दोस्ती उसकी मौत की वजह मानी जाने लगे, जब एक मज़हब से दोस्ती जुर्म बन जाए, और जब एक हत्यारा बाप ‘संस्कारों’ का प्रतीक बना दिया जाए-तब समझ लेना चाहिए कि बीमारी बहुत गहरी हो चुकी है।

इस केस ने फिर से दिखा दिया कि हमारा समाज कैसे नफ़रत की खाई में गिरता जा रहा है। इंसाफ़ से ज़्यादा अब मज़हब देखा जा रहा है। एक जवान लड़की की मर्ज़ी,उसकी ज़िंदगी, को कुचलने का ठेका कुछ नफरत के अलम्बरदार मर्दों ने कैसे ले रखा है।

मगर इसके पीछे असली सवाल ये भी है, कि क्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफरत को इतनी छूट दी जायेगी कि वो नैतिकता, कानून, संविधान और सेंस ऑफ जस्टिस को निगल जाएं?

एक सोशल एक्टिविस्ट भाविशा कपूर का कहना है कि यह सब देखना शर्मनाक है। ऐसे घिनौने लोगों को रात को नींद कैसे आती होगी?

इस केस में यह देखना है कि बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ का ढोल बजाने वाला और वसुधैव कुटुम्बकम का नारा लगाने वाला समाज इसको लेकर क्या सोचता है और क्या करता है?

मुल्क तो ऐसी ज़ेहनियत के साथ तो विश्वगुरु बनने से रहा।

(इस्लाम हुसैन गांधीवादी कार्यकर्ता हैं।)

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