प्रभाष जोशी: पत्रकारिता के लौह पुरुष 

प्रभाष जोशी के बारे में लिखने से पहले मैं वह वाक़या सुनाना चाहूंगी जब मैं उनसे पहली बार मिली थी। वे1996 में जब ‘आसा’ के एक कार्यक्रम में पटना आये थे तब शाम को मेरे घर भी आये थे। मैं उनके कृतित्व की तो पहले से ही क़ायल थी परंतु उनका व्यक्तित्व भी कुछ कम नहीं था। लंबी चौड़ी छरहरी काया, सफ़ेद कुर्ता धोती और चेहरे पर चपल मुस्कान। उनकी बातों में गूढ़ता के साथ-साथ एक ख़ास तरह का व्यंग्यात्मक विनोद झलकता था जो सुनने वालों को बांधे रखता था।

वे गंभीर बातों को भी अपनी सहज सरल शैली में इस तरह समझा देते थे कि अगले के पास पूछने के लिये कोई प्रश्न ही नहीं बचता था। वे मुझे बहू कह कर संबोधित कर रहे थे जो मुझे थोड़ा अटपटा भी लग रहा था। रात में डिनर के समय मुझे उनकी बातों में शरीक होने का मौक़ा मिला। वे बिहार की राजनीति पर गंभीर बातों को भी बड़े विनोदी अंदाज़ में बता रहे थे। इसके बाद उनसे कई बार मुलाक़ात हुई।उन्होंने ही जनसत्ता के तत्कालीन संपादक ओम थानवी जी से मेरा परिचय कराया था।      

प्रभाष जोशी का जन्म पन्द्रह जुलाई 1937 को मध्यप्रदेश के सिहोर जिले के एक गांव में हुआ था। उनकी शिक्षा दीक्षा इन्दौर में ही हुई। वे गणित और विज्ञान के छात्र थे परंतु हिंदी साहित्य, राजनीति, दर्शन इत्यादि विषयों में उनकी गहरी रुचि थी। पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि थी इसीलिए 1960 में उन्होंने इंदौर से निकलने वाली पत्रिका ‘नई दुनिया’ ज्वाइन कर लिया। उस समय राजेन्द्र माथुर उसके संपादक थे। प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी भी वहीं काम करते थे। प्रभाष जोशी जी ने वहीं से पत्रकारिता की बारीकियाँ सीखीं। जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर वे छात्र जीवन से ही काफ़ी कुछ लिखा करते थे।

1966 में विनोबा भावे भूदान आंदोलन के तहत गांव-गांव का दौरा कर रहे थे। प्रभाष जी उनसे बहुत प्रभावित थे। उन्होंने उनकी यात्रा कवर करते हुए नई दुनिया में रिपोर्टिंग की जो काफ़ी प्रसिद्ध हुई। यहाँ से उनकी विद्वता और सरल सहज बेबाक़ जनपक्षीय शैली को एक अलग पहचान मिली। वे गांधीवादी विचारधारा से छात्र जीवन से ही विशेष प्रभावित थे इसीलिए 1966में दिल्ली आकर गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़ गये।इस बीच वे लगातार समसामयिक विषयों पर लिखते रहे। एक राजनैतिक विश्लेषक के तौर पर अपनी लेखनी के माध्यम से वे अपने नैतिक मानदंडों का सदुपयोग करते हुए हर पार्टी की ग़लत नीतियों की आलोचना करने से कभी नहीं चूकते थे। उन्होंने 1972 में जयप्रकाश नारायण के साथ चंबल और बुंदेलखंड के डाकुओं के आत्मसमर्पण में भी ख़ासी भूमिका निभाई।

उस समय दिल्ली से निकलने वाला अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस अपनी स्वतंत्र, स्वच्छ एवं जनपक्षधर पहचान के लिये बहुत प्रसिद्ध था। 1974 में जोशी जी ने इंडियन एक्सप्रेस समूह में अपना योगदान दिया और चंडीगढ़ और दिल्ली में बतौर रेजीडेंट पत्रकार के रूप में काम करने लगे।1975में भारत में आपातकाल लागू होने के बाद प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गयी थी। उन्होंने बड़ी बेबाक़ी से इन्दिरा गांधी के इस फ़ैसले का विरोध किया। आपातकाल से जुड़े उनके लेख बाद में जनसत्ता के साप्ताहिक कालम ‘कागद कारे’ में कई बार छपे। वे मालवा की मिट्टी, संस्कृति, खानपान और भाषा से गहरे जुड़े थे। यही कारण था उन्हें हिंदी में लिखना ज़्यादा पसंद था। उनके लेखन में सहज सरल लोकोक्तियों मुहावरों से परिपूर्ण सबको पढ़ने और आसानी से समझने लायक़ देशज भाषा होती थी।

वे चाहते थे हिंदी में कोई ऐसा समाचारपत्र निकले जिसमें पत्रकारों को लिखने की पूरी स्वतंत्रता हो, जो नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरे,जिसमें समाचारों की विश्वसनीयता हो, जो लोकतंत्र में विश्वास करते हुए जनपक्षीय पत्रकारिता को अहमियत दे और जो जनहित के पक्ष में आवाज उठाये। इन्हीं मानकों को आधार मानकर उन्होंने 1983 में इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता ‘की नींव रखी। उन्होंने अपनी बेबाक़ कलम और उच्च नैतिक मानदंडों के लिये पत्रकारिता को नया आयाम दिया। वे आज की पत्रकारिता पर कटाक्ष करते हुए कहते थे कि 

‘पत्रकारिता पहले मिशन था फिर प्रोफेशन बना और अब यह कमीशन बन चुका है।’ वे पत्रकारों को अपने विवेक और ईमानदारी से लिखने के लिए प्रेरित करते थे।उनका मानना था कि पत्रकार को स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपनी कलम चलानी चाहिये न कि सरकार या मालिक के दबाव से कोई ख़बर बनाना चाहिये। वे जनसत्ता में संपादकीय के अलावा एक साप्ताहिक कालम कागद कारे में लिखा करते थे। बाद में उसमें लिखे गये उनके लेखों को संकलित कर पुस्तक के रूप में छापा गया।

जनसत्ता में उन्होंने 1983 से 1995 तक बतौर संपादक कार्य किया। जनसत्ता अपने निष्पक्ष एवम् शोध परक गंभीर जनपक्षधर लेखों के लिये सुविख्यात था।उसके संपादकीय पन्ने पर बहुत अच्छे लेख निकला करते थे। वह अख़बार ज़रूरत पड़ने पर सरकार की आलोचना करने से भी नहीं चूकता था। प्रभाष जोशी जी ने अपने कार्यकाल में ही उसकी ख्याति को शिखर पर पहुँचा दिया था। बाद में ओम थानवी सहित कई प्रसिद्ध पत्रकार इसके संपादक बने। जोशी जी सेवानिवृत्ति के बाद भी बहुत दिनों तक उसके मुख्य संपादकीय सलाहकार बने रहे। उन्हें खेलों ख़ासकर क्रिकेट में विशेष रुचि थी। वे समाचारपत्रों में खेल जगत को भरपूर कवरेज दिये जाने के हिमायती थे। वे गावस्कर और बाद में सचिन तेंदुलकर के बहुत बड़े फैन थे। उनकी मृत्यु भी 2009 में हैदराबाद में क्रिकेट के मैदान में सचिन तेंदुलकर के आउट होते ही हृदय गति रुकने के कारण हुई।

प्रभाष जोशी ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद राजनीति में धर्म और सांप्रदायिकता के बढ़ते वर्चस्व पर करारा प्रहार करते हुए कागद कारे में कई लेख लिखे।वे कहते थे कि राजनीति जब धर्म के चश्मे से समाज को देखने लगती है तो वह समाज को जोड़ने का नहीं बल्कि तोड़ने का काम करती है। वे राम मंदिर आंदोलन के समर्थकों को भी समाज को तोड़ने वालों की श्रेणी में देखते थे। वो कहते थे कि अगर अख़बारों ने सांप्रदायिक हिंसा को सिर्फ़ दंगा कहकर छापा तो वे धर्मनिरपेक्षता के साथ ग़द्दारी करेंगे। उनका कहना था कि धर्मों के झगड़े अब ईश्वर के नाम पर नहीं, पहचान और सत्ता के नाम पर होते हैं। यह लड़ाई इंसानियत को मिटाने की लड़ाई है और पत्रकारिता अगर चुप रही तो वो भी इस पाप में शामिल है। उनका मानना था कि सांप्रदायिकता केवल हिंसा की जननी ही नहीं बल्कि यह लोकतंत्र की विचारधारा को खत्म करने वाला ज़हर भी है।

वे कहते थे कि ,’भारत एक बहुधर्मी ,बहुजातीय,बहुभाषी समाज है ।उसे एक रंग में रंगना उसका विनाश है।’

सन् 2002 में हुए गुजरात दंगों से वे बहुत आहत हुए। उनका कहना था कि हिंदू धर्म ने जिसका मूल स्वभाव अहिंसा, करुणा और सहिष्णुता है, कभी इतना अपमान नहीं झेला जितना गुजरात में झेला है। वे दंगों में नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए राज्य सरकार की सीधी संलिप्तता की बात बिना डरे बोलते थे और अपने लेखों में लिखते भी थे तथा दंगा कराने वालों को हिंदू नहीं बल्कि मुखौटा पहनकर हिंदू धर्म को बदनाम करने वालों की साज़िश बताते थे। उन्होंने उस समय की मुख्यधारा मीडिया की ,जो मूकदर्शक एवम् पक्षपातपूर्ण बनी हुई थी , खूब आलोचना की।

उनके सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता पर लिखे लेखों के दो संकलन अब तक प्रकाशित हो चुके हैं जिनके माध्यम से उनके विचारों और चिन्ताओं से रूबरू हुआ जा सकता है। ये संकलन ‘हल्लाबोल ‘और ‘धर्मनिरपेक्षता :एक भ्रम या विश्वास ‘नाम से प्रकाशित हैं। कागद कारे का संकलन भी तीन खंडों में निकल चुका है जिसमें समाज, राजनीति, धर्म, दर्शन, साहित्य, क्रिकेट इत्यादि लगभग हर विषय पर उनके लेख हैं जो उनके पूरे व्यक्तित्व को समझने के लिये काफ़ी हैं। उन्होंने ‘चंबल की बंदूक़ें-गाँधी के चरणों में ‘मसि कागद’, हिंदू होने का धर्म’ इत्यादि कई पुस्तकें लिखीं तथा कई पत्रिकाएं भी निकालीं।

जनसत्ता के अलावा हिंदी तहलका में औघट घाट नामक कालम में भी वे बराबर लिखा करते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी लेखकों की कृतियों का अनुवाद भी किया।

जनसत्ता से रिटायरमेंट के बाद वे पत्रकारिता के साथ-साथ सार्वजनिक जीवन में भी काफ़ी सक्रिय हो गये। उन्हें देश के कोने-कोने से लोकतान्त्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर प्रमुख वक्ता के रूप में विभिन्न आयोजनों, सेमिनारों और आन्दोलनों में बुलाया जाता था।

आज लोकतंत्र का चौथा स्तंभ चरमराकर सत्ता और सत्ता के दलालों के सामने लंबलेट हो गया है। कुछ गिने चुने पत्रकारों को छोड़ दें तो अधिकांश प्रभाष जोशी के शब्दों में कमीशन की श्रेणी में आ गये हैं। निष्पक्ष पत्रकारिता तो गुज़रे जमाने की बात रह गयी है। समाचारों की विश्वसनीयता के सामने प्रश्न चिह्न लग चुका है। थोड़े बहुत जो जनपक्षीय पत्रकार अपना धर्म ईमानदारी से निभा रहे हैं उन्हें अनेक तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जनता की आवाज की जगह अब कार्पोरेट्स की आवाज़ ज़्यादा मुखर है। मीडिया के इस डिजिटल युग में आयाम तो कई दिखायी दे रहे हैं परंतु ख़बरों की सच्चाई अब संदेह के घेरे में है।

पहले लोकतन्त्र का चौथा स्तंभ अन्य तीनों स्तंभों के लिये सजग प्रहरी का काम करता था परंतु आज वह चारण बनकर एक प्रचारक का काम कर रहा है।ऐसे में प्रभाष जोशी बहुत याद आते हैं। आज अगर वे ज़िंदा होते तो क्या मीडिया को इस तरह गर्त में गिरते हुए देख पाते। जनता की सत्ता को ध्यान में रखकर उन्होंने जिस तरह के निष्पक्ष पत्रकारिता की नींव रखी क्या आज के पत्रकारों में उस तरह का जोखिम उठा सकने का माद्दा है? इसमें कोई शक नहीं कि आज भी अधिकांश लोग सच्ची स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को पसंद करते हैं इसलिये गोदी मीडिया और गोदी अख़बारों को दरकिनार कर कुछ गिने चुके ईमानदार पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर विश्वास करते हैं परंतु देश की अधिकांश जनता तो उसी बिकी हुई मीडिया द्वारा परोसी गयी झूठी सच्ची ख़बरों पर निर्भर है।

ऐसी परिस्थिति में प्रभाष जोशी और भी याद आते हैं।आज समाज धर्म और सांप्रदायिकता के चंगुल में फँसकर खंड-खंड हो रहा है। क्या प्रभाष जोशी होते तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर समाज को जोड़ने का काम नहीं करते? सच पूछिए तो आज उन्हें याद करने और उनके बताये रास्तों पर चलने की मीडिया जगत के साथ-साथ पूरे हिंदुस्तान को ज्यादा ज़रूरत है।

(डॉ. मीरा मिश्रा का लेख।) 

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