पटना। भाकपा-माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने आज पटना में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि दिल्ली में चुनाव आयोग ने दावा किया था कि कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि उनके पास पर्याप्त संख्या में बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) और वॉलंटियर हैं। हमने दो मांगें की थीं: बीएलओ हर घर पर तीन-तीन बार जाएंगे और प्रत्येक मतदाता को दो फॉर्म दिए जाएंगे। एक फॉर्म भरकर जमा करना होगा, दूसरा मतदाता के पास रहेगा।
हालांकि, तिहाई समय बीत चुका है, और जो रिपोर्ट्स मिल रही हैं, उनसे साफ है कि कई घरों तक बीएलओ पहुंचे ही नहीं। दो फॉर्म तो शायद ही किसी को मिले हैं। यह जो प्रक्रिया चल रही है, वह आंकड़ों का खेल और भयानक अराजकता है।

बीएलओ परेशान हैं। दबाव में एक बीएलओ की मृत्यु हो गई। कई बीएलओ कह रहे हैं कि उनके पास स्वयं आवश्यक कागजात नहीं हैं। एक बीडीओ ने प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया। यदि कोई बीएलओ कुछ बोलता है, तो उस पर कार्रवाई की जाती है। उदाहरण के लिए, अंजीत अंजुम पर कार्रवाई हुई।
लोगों को आतंकित करके यह अभियान चलाया जा रहा है। यह आतंक का माहौल क्यों बनाया जा रहा है?
सूत्रों के हवाले से अचानक दावा किया जा रहा है कि बिहार में बांग्लादेशी, म्यांमार और नेपाल के लोग भरे पड़े हैं। यह सरासर झूठ है। 2024 में हुए चुनाव में क्या ऐसी कोई शिकायत थी? क्या किसी राजनीतिक दल ने ऐसी शिकायत दर्ज की थी?
2019 में चुनाव आयोग ने संसद को लिखित में बताया था कि 2016-2019 के बीच विदेशी मतदाताओं की कोई शिकायत नहीं थी। केवल 2018 में तीन ऐसी शिकायतें थीं। ऐसे में 2025 में बिहार में अचानक विदेशी मतदाता कहां से आ गए?
बिहार के गांव-गांव में मुसहर समुदाय के लोग मिलेंगे। क्या उन्हें म्यांमार का नागरिक बना दिया जा रहा है? बिहार के प्रवासी मजदूरों और मुसलमानों को बांग्लादेशी कहा जा रहा है। यह समस्या बंगाल के प्रवासी मजदूरों के साथ भी है, जिन्हें देश के अन्य हिस्सों में बांग्ला भाषा बोलने के कारण बांग्लादेशी कहा जाता है।
अब हिंदी बोलने वाले मजदूरों को भी बांग्लादेशी कैसे कहा जा सकता है? यह लोगों की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश है। नेपाल के साथ तो बिहार का बेटी-रोटी का रिश्ता है। हमारी हर आशंका एक-एक कर सही साबित हो रही है। यह संविधान के साथ खिलवाड़ है।
हमारे साथी भी घर-घर जा रहे हैं। चुनाव आयोग बार-बार कहता है कि दस्तावेज देना अनिवार्य है। अभी नहीं तो अगस्त में देना होगा। लेकिन बिहार के गरीबों के पास कौन से दस्तावेज हैं? यहां के लोगों के पास जो दस्तावेज हो सकते हैं, जैसे आवासीय या जाति प्रमाण पत्र, वे भी उपलब्ध नहीं हैं।
चुनाव आयोग जो दस्तावेज मांग रहा है, वे लोगों के पास नहीं हैं। जो लोग दस्तावेज मांग रहे हैं, वे स्वयं इन्हें उपलब्ध नहीं करा रहे। आधार, राशन कार्ड और वोटर कार्ड को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद आयोग मान्यता नहीं दे रहा। इसका मतलब है कि बिहार के लाखों लोगों का नाम मतदाता सूची से कटना तय है।
ईआरओ (चुनाव रजिस्ट्रीकरण अधिकारी) को जो अधिकार दिया गया है, स्थानीय जांच के आधार पर फैसला लेने का, उसमें कोई पारदर्शिता नहीं है। यह चुनाव चुराने की पूरी कोशिश है। इसलिए बिहार के लोग नारा लगा रहे हैं – “चुनाव चोर गद्दी छोड़।”
बिहार में अच्छी बात यह है कि लोग शुरू से ही इस साजिश को समझ रहे हैं। हमारी अपील है कि अपने मताधिकार की रक्षा करें और चुनाव चुराने की इस साजिश को नाकाम करें।
हर रोज हत्या, बलात्कार; कहीं कोई न्याय नहीं। जहां अपराधियों और भ्रष्टाचारियों का राज कायम हो गया है, वहां महिलाएं कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर रही हैं। यह चुनाव सरकार बदलने वाला है। ऐसे में यह अराजकता का माहौल बनाया गया है। इसे ठीक करना होगा।
गांधी जी के परपोते तुषार गांधी को चंपारण में अपमानित किया गया, उन्हें बाहरी कहा गया। क्या उन्हें भी बांग्लादेशी कह दिया जाएगा? सच्चाई से इतना डर क्यों? बिहार में भाजपा द्वारा खराब राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश हो रही है।
प्रत्येक मतदाता के मताधिकार की गारंटी होनी चाहिए। चुनाव आयोग ने हमें पत्र भेजा है और अलग-अलग मिलना चाहता है। हम यही कहेंगे कि एसआईआर (विशेष सत्यापन अभियान) वापस लिया जाए। 2024 की मतदाता सूची के आधार पर 2025 का चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो।
उन्होंने एनडीए के 2025 से 2030 तक एक करोड़ रोजगार देने के वादे पर तंज कसते हुए कहा कि पहले मोदी सरकार यह बताए कि हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा क्या हुआ?
ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि बिहार में महिलाओं की स्थिति लगातार बदतर हो रही है। गरीबी के कारण महिलाएं कर्ज के बोझ तले ददी हैं। सरकार जीविका समूहों से तो बात करती है, लेकिन उनकी वसूली खत्म नहीं हुई। माइक्रोफाइनेंसเลือक्शन कंपनियों की बाढ़ आई हुई है। एक कर्ज चुकाने के लिए महिलाएं दूसरा-तीसरा कर्ज ले रही हैं। किश्त वसूली का दबाव इतना है कि लोग आत्महत्या या पलायन कर रहे हैं। 31 जुलाई को पटना में कर्ज मुक्ति सम्मेलन आयोजित होगा।
एमएलसी शशि यादव ने कहा कि बेटियों के साथ लगातार उत्पीड़न हो रहा है। वोटर लिस्ट सत्यापन में महिलाओं को खासकर 2003 के बाद अविवाहित रहने वाली बेटियों को बहुत समस्या हो रही है। सरकार स्कीम वर्करों की बात करती है, लेकिन कुछ करती नहीं। रसोइया मात्र 1650 रुपये में काम कर रही हैं। जीविका, आशा, आंगनबाड़ी सभी की हालत खराब है। सरकार ने जीविका का कंट्रीब्यूटरी सिस्टम अभी तक खत्म नहीं किया। 30 जून को गरीबों को उजाड़ने के खिलाफ विधान परिषद में आश्रय अभियान होगा। इस चुनाव में ये सभी तबके एकजुट होकर लड़ेंगे।
(प्रेस विज्ञप्ति)