नई दिल्ली। तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने चुनाव आयोग से अपील की है कि वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को वर्तमान स्वरूप में आयोजित न करे। टीडीपी ऐसा करने वाली पहली एनडीए सहयोगी पार्टी बन गई है, जिसने बिहार में चल रही इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है।
टीडीपी के आंध्र प्रदेश अध्यक्ष पल्ला श्रीनिवास राव के नेतृत्व में छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात की और एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह भी मांग की गई कि “यह प्रक्रिया नागरिकता सत्यापन से संबंधित नहीं है।”
चुनाव आयोग का कहना है कि उसे संविधानिक रूप से यह अधिकार प्राप्त है कि केवल भारतीय नागरिकों का ही मतदाता के रूप में नामांकन हो। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए आयोग ने एक पुनरीक्षण प्रक्रिया तैयार की है, जो स्व-घोषणा के बजाय दस्तावेज़ी प्रमाण के सत्यापन के माध्यम से इसे सुनिश्चित करती है।
विपक्षी दलों ने यह संकेत दिया है कि अधिकांश मतदाताओं के पास चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए आवश्यक दस्तावेज़ मौजूद नहीं हैं।
टीडीपी ने भी इस चिंता को व्यक्त किया है। टीडीपी ने कहा, “एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित होना चाहिए और इसे केवल मतदाता सूची में सुधार और नाम जोड़ने तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।”
पार्टी ने आगे कहा, “यह भी स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि यह प्रक्रिया नागरिकता सत्यापन से संबंधित नहीं है और इस आशय के सभी फील्ड निर्देशों में यह अंतर परिलक्षित होना चाहिए।”
अपनी मांगों को रखते हुए टीडीपी ने कहा, “चूंकि आंध्र प्रदेश में 2029 तक विधानसभा चुनाव नहीं होने हैं, इसलिए तेलुगु देशम पार्टी मानती है कि भविष्य में कोई भी एसआईआर मतदाता सूची को निष्पक्ष, समावेशी और पारदर्शी तरीके से अपडेट करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगा। इस संदर्भ में हम निम्नलिखित सुझाव सम्मानपूर्वक प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन किया जा सके और आपसे निवेदन है कि राज्य में यह प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू की जाए।”
पार्टी ने इस कवायद के पीछे के तर्क पर भी सवाल उठाया। टीडीपी ने कहा, “ऐसे मतदाताओं से जो पहले से ही हाल ही में प्रमाणित मतदाता सूची में शामिल हैं, उनसे अपनी पात्रता फिर से साबित करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, जब तक कि कोई ठोस और सत्यापनीय कारण दर्ज न हो। जब नाम आधिकारिक सूची में दर्ज है, तो प्रमाण का भार मतदाता पर नहीं बल्कि ईआरओ (मतदाता पंजीकरण अधिकारी) या आपत्ति दर्ज करने वाले पर होना चाहिए।”
पार्टी ने कहा कि किसी भी बड़े चुनाव से छह महीने के भीतर एसआईआर ideally आयोजित नहीं किया जाना चाहिए, ताकि मतदाताओं का विश्वास और प्रशासनिक तैयारी सुनिश्चित की जा सके।
टीडीपी ने प्रस्ताव रखा, “एसआईआर के दौरान मोबाइल बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) यूनिट तैनात की जानी चाहिए और प्रवासी मजदूरों तथा विस्थापित परिवारों को मतदाता सूची से बाहर होने से रोकने के लिए अस्थायी पते के घोषणापत्र स्वीकार किए जाने चाहिए।”
चुनाव आयोग ने प्रवासियों पर यह जिम्मेदारी डाल दी है कि वे 25 जुलाई से पहले बिहार की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाएँ, अन्यथा उनका नाम सूची से हटाया जा सकता है।
टीडीपी प्रतिनिधिमंडल से हुई बैठक पर आयोग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में पार्टी द्वारा उठाई गई इन मांगों का कोई ज़िक्र नहीं किया गया।
(ज्यादातर कंटेंट द टेलीग्राफ से लिए गए हैं।)