नीति आयोग द्वारा जारी हेल्थ इंडेक्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश और बिहार स्वास्थ्य सेवाओं की दृष्टि से देश में सबसे निचले पायदान पर हैं, क्रमशः 21वें और 20वें स्थान पर। इसके विपरीत, केरल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र शीर्ष तीन राज्यों में शामिल हैं।
वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आलोक मुखर्जी के अनुसार, पिछले 40 वर्षों से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत खराब है। हालाँकि थोड़ा-बहुत सुधार हुआ है, लेकिन यह आवश्यकता की तुलना में नगण्य है। इन राज्यों में 30% से 40% जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करती है। बाल विवाह आम हैं, महिला शिक्षा की स्थिति दयनीय है, और प्रशासनिक कमजोरी के कारण कोई भी योजना प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाती।
इसके अतिरिक्त, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में निवेश बहुत कम हुआ है। प्रशासनिक लापरवाही चरम पर है। दूसरी ओर, केरल जैसे राज्यों में आर्थिक स्थिति बेहतर है, शिक्षा का स्तर ऊँचा है, राजनीतिक सुधार हुए हैं, और महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है।
स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का एक प्रमुख कारण बजट की कमी है। केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य का हिस्सा मात्र 1.7% था, जिसे 2025 तक 2.5% करने का लक्ष्य रखा गया था। भारत का रक्षा बजट स्वास्थ्य बजट से पाँच गुना अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत श्रीलंका और बांग्लादेश से भी पीछे है। उनका सुझाव है कि 6-7 वर्ष में एक डॉक्टर तैयार करने की बजाय 3-4 वर्ष में डॉक्टर तैयार करने की व्यवस्था होनी चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) की हालत इतनी खराब है कि लोग छोटी-मोटी बीमारियों के लिए नीम-हकीमों को प्राथमिकता देते हैं। इस कारण AIIMS जैसे रेफरल अस्पतालों में भीड़ बढ़ती है।
निजीकरण के परिणामस्वरूप जगह-जगह प्राइवेट अस्पताल तो खुल गए हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता अनिश्चित है और वे मनमानी वसूली करते हैं। चैरिटेबल संस्थाओं को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और जहाँ अस्पताल नहीं हैं, वहाँ अस्पताल खोलने चाहिए। सरकार को स्वास्थ्य बजट को खर्च के बजाय निवेश के रूप में देखना चाहिए और इसे कम से कम 3.5% तक बढ़ाना चाहिए।
कोविड महामारी ने हमारी जर्जर स्वास्थ्य प्रणाली को पूरी तरह उजागर कर दिया था। अस्पतालों में हालात भीड़भरे रेलवे प्लेटफार्मों से भी बदतर हो गए थे। सामाजिक दूरी जैसे नियम पूरी तरह नजरअंदाज हो गए थे। जिला अस्पताल संघर्ष कर रहे थे, ब्लॉक और गाँवों में अस्पताल या तो थे ही नहीं या बहुत खराब स्थिति में थे। आमतौर पर डॉक्टर अनुपस्थित रहते थे, PHC बंद पड़े थे, और CHC में पर्याप्त स्टाफ नहीं था। एक स्थान पर डॉक्टर अपने घर पर मरीजों को देख रहे थे। हल्के लक्षण वाले मरीजों को घर पर अलग रहने की सलाह देकर भेज दिया जाता था, जबकि गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल रेफर किया जाता था।
अस्पतालों में स्टाफ की कमी का एक उदाहरण यह है कि जहाँ 16 कर्मचारियों की स्वीकृति थी, वहाँ केवल 5 कर्मचारी कार्यरत थे। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तंज कसा कि उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएँ पटरी से उतर चुकी हैं, क्योंकि संबंधित मंत्री मुख्यमंत्री बनने की कवायद में व्यस्त हैं। उन्होंने कहा कि कुछ अस्पतालों ने बिना खून निकाले ही रिपोर्ट तैयार करने की कला सीख ली है। एक अस्पताल में दो CMO एक ही कुर्सी के लिए आपस में भिड़ गए। एक अन्य अस्पताल में मरीजों को चादर तक नहीं मिल रही, और परिजनों को घर से चादर और कम्बल लाने पड़ रहे हैं।
उन्होंने झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज का उदाहरण दिया, जहाँ एक मरीज को जमीन पर ड्रिप चढ़ाने का वीडियो वायरल हुआ था। कई जगह स्ट्रेचर पर इलाज हो रहा है, और वेंटिलेटर बेड उपलब्ध होने के बावजूद लोग जान गँवा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में मशीनें जंग खा रही हैं, जिसके कारण लोग निजी अस्पतालों की ओर मजबूर हैं।
हमीरपुर के एक दर्दनाक हादसे का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि एक मरीज को बोतल चढ़ाने के बाद पैदल वार्ड में भेजा गया, जहाँ पहुँचते ही उसकी साँसें थम गईं। आपातकालीन सेवाएँ केवल नाम की हैं, और प्राथमिक इलाज तक की व्यवस्था नहीं है।
उनका आरोप है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। दवाएँ समय पर नहीं मिलतीं, मशीनें या तो खराब हैं या उपलब्ध ही नहीं। सरकार ने हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का वादा किया था, लेकिन संसाधनों और स्टाफ की कमी के कारण जनता को इसका लाभ नहीं मिल रहा। मेडिकल कॉलेजों के नाम पर केवल इमारतें खड़ी हैं, जहाँ न तो इलाज हो रहा है और न ही पढ़ाई। डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्टाफ की भारी कमी है। पूरी व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्वरूपरानी नेहरू अस्पताल की स्थिति को लेकर सरकार को कड़ी फटकार लगाई, जिसके बाद मुख्य सचिव को वहाँ का दौरा करना पड़ा।
दूसरी ओर, सरकार के मंत्री अपनी पीठ थपथपाने से बाज नहीं आ रहे। स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने दावा किया कि 65 मेडिकल कॉलेज पूर्ण क्षमता से काम कर रहे हैं, 18 नए मेडिकल कॉलेज खोले गए हैं, और 27 नए पैरामेडिकल कॉलेज स्थापित किए गए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि 5 करोड़ से अधिक लोगों के आयुष्मान कार्ड बन चुके हैं, और 57 लाख से अधिक लोगों को निःशुल्क उपचार मिल चुका है।
हालाँकि, 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वे के आधार पर आयुष्मान कार्ड में कई अनियमितताएँ सामने आई हैं। अभी तक केवल 32% लोगों के कार्ड बने हैं। 3400 सरकारी, निजी और कॉर्पोरेट अस्पतालों में इलाज की सुविधा दी गई है, लेकिन कई अस्पताल सामान्य वार्ड में इलाज करके ICU का क्लेम माँगते पकड़े गए। ऐसे अस्पतालों को ब्लैकलिस्ट किया गया और उन पर दोगुना जुर्माना लगाया गया। 34 निजी अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
सरकार अगले 5 वर्षों के लिए नई स्वास्थ्य नीति बनाने का दावा कर रही है, जिसके तहत मरीजों को हाई-टेक सुविधाएँ, और गाँव से शहर तक उन्नत चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध होंगी। इसके नाम पर बड़े निवेशकों को आकर्षित करने की योजना है, जिन्हें रियायती दर पर जमीन और स्टांप ड्यूटी में 100% तक छूट दी जाएगी। बिजली कनेक्शन में भी प्राथमिकता दी जाएगी।
दावा किया जा रहा है कि इस योजना में ABC मॉडल के अस्पताल होंगे। ‘A’ श्रेणी में नोएडा, ग्रेटर नोएडा समेत 17 नगर निगम शामिल होंगे। गाँवों में 100 बेड वाले अस्पताल बनाए जाएँगे। इस योजना में युवाओं को प्राथमिकता देने की बात भी कही जा रही है।
हालाँकि, दावे चाहे जितने बड़े हों, सच्चाई यही है कि उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बहुत खराब है। आकांक्षी जिला सोनभद्र के दुद्धी की एक रिपोर्ट के अनुसार, मरीजों को रात भर अंधेरे में गुजारना पड़ता है। अस्पताल में 57 कर्मचारी हैं, जिनमें 23 सरकारी और 34 संविदा कर्मचारी हैं, लेकिन अव्यवस्था के कारण मरीज परेशान हैं। जनरेटर नहीं चलता, मशीनें होने के बावजूद जाँच नहीं होती, न सफाई की व्यवस्था है, न शुद्ध पेयजल उपलब्ध है। बेड पर चादर या तो होती ही नहीं या महीनों तक बदली नहीं जाती। आपातकाल में डॉक्टर बुलाए जाते हैं, लेकिन वे तुरंत चले जाते हैं।
वैसे तो पूरे देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे निचले पायदान पर है। यह स्पष्ट है कि जब तक सरकारें स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील नहीं होंगी, कोई सुधार संभव नहीं है। जरूरत है कि स्वास्थ्य बजट को बड़े पैमाने पर बढ़ाया जाए, इसे मानव संसाधन में निवेश माना जाए, निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य माफिया पर नकेल कसी जाए, और भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जाए।
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)