कंथापुरम अबू बकर मुसलियार की राह इस्लाम के उजाले की एक लौ

जब धर्म के नाम पर अंधविश्वास, कट्टरता और हिंसा दुनिया को जकड़ रही हो, ऐसे समय में किसी धार्मिक नेता का विवेकपूर्ण, मानवीय और न्यायनिष्ठ स्वर किसी चिराग की तरह प्रतीत होता है, जो न केवल धर्म की गरिमा बचाता है, बल्कि समाज को दिशा भी देता है। भारत के प्रतिष्ठित मुस्लिम धार्मिक नेता कंथापुरम एपी अबू बकर मुसलियार ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनकी इस्लामी व्याख्या समकालीन मुस्लिम समाज में एक विवेकशील इस्लाम की पहचान बन चुकी है।

इस्लाम का अतीत: ज्ञान, करुणा और न्याय का धर्म

इस्लाम का आरंभ 7वीं शताब्दी में एक क्रांतिकारी सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में हुआ था, जो अज्ञान, जातिगत भेद, महिला उत्पीड़न और आर्थिक शोषण के विरुद्ध खड़ा हुआ। पैगंबर मुहम्मद की शिक्षा का मूल था – “अल्लाह इंसाफ करने वालों को पसंद करता है” (कुरआन 5:42)।

लेकिन जैसे-जैसे इस्लाम सत्ता और साम्राज्यवाद से जुड़ता गया, धार्मिक शिक्षाएं राजनीतिक उपकरणों में बदलती गईं। इस्लाम की मूल आत्मा — रहमतुल लील आलमीन (संपूर्ण संसार के लिए दया) — कुछ गुटों के बीच कट्टरता और तकफीरी मानसिकता में दब गई।

कंथापुरम मुसलियार: इस्लाम की आधुनिक आत्मा के प्रतिनिधि

कंथापुरम अबू बकर मुसलियार एक सुन्नी इस्लामी विद्वान और जमीयतुल उलेमा के प्रमुख हैं, जिनका कार्य इस्लाम की शांति-संपन्न और मानवतावादी व्याख्या को आगे बढ़ाने में अग्रणी रहा है। उनकी तीन पहलें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:

ISIS के खिलाफ फतवा:

जब पूरी दुनिया में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के नाम पर मुस्लिम युवाओं को गुमराह किया जा रहा था, तब भारत में कंथापुरम जैसे धर्मगुरु ने खुलकर कहा — “ISIS इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करता।”

उन्होंने अपने अनुयायियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि हिंसा, सिर काटना, आत्मघाती हमले – ये सब इस्लाम के मूल्यों के खिलाफ हैं।

यह उस समय का एक साहसी कदम इसलिए था, क्योंकि बहुत से धार्मिक नेता साफ-साफ ISIS की निंदा करने से बच रहे थे। उनके इस फतवे ने कट्टरपंथी इस्लाम की धारा के विरुद्ध एक बड़ा नैतिक प्रतिरोध खड़ा कर दिया।

निमिषा प्रिया की फांसी टालने का मानवीय प्रयास

निमिषा प्रिया एक भारतीय नर्स हैं, जिसे यमन में हत्या के आरोप में मृत्युदंड मिला था। उसके मामले में जब भारत सरकार और न्यायिक प्रक्रिया हाथ खड़े कर चुकी थी, तब कंथापुरम मुसलियार ने व्यक्तिगत रूप से यमन के कबीलाई नेताओं से संवाद साधा। उन्होंने इस्लामिक परंपरा के अनुसार क्षमा और दया की अपील की, जिससे फांसी टल गई।

यह घटना बताती है कि इस्लामी न्याय व्यवस्था केवल सज़ा पर नहीं, बल्कि प्रायश्चित्त, क्षमा और पुनरुत्थान के सिद्धांतों पर भी टिकी है, बशर्ते कोई धार्मिक नेता उसे सही संदर्भ में प्रस्तुत करे।

धार्मिक उन्माद के विरुद्ध अभियान

कंथापुरम मुसलियार ने सार्वजनिक मंचों से बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि धर्म का कार्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। उन्होंने भारत में मुस्लिम युवाओं को कट्टरता से दूर रहने, शिक्षा पर ध्यान देने और भारतीय संविधान में विश्वास रखने की अपील की है।

उन्होंने इस्लामी मदरसों में आधुनिक शिक्षा को शामिल करने की वक़ालत की है ताकि इस्लाम के अनुयायी दुनिया और दीनी दोनों ज्ञान के साथ आगे बढ़ सकें।

एक मौलिक प्रश्न: इस्लाम क्या है? और कौन उसे तय करता है?

यह प्रश्न केवल मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि सभी धर्मावलंबियों के लिए प्रासंगिक है ।

क्या धर्म का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना है या इससे कुछ अलग?

कंथापुरम मुसलियार के नेतृत्व में जिस इस्लाम की व्याख्या उभरती है, वह कहता है:

इस्लाम सिर्फ पहचान नहीं, कर्तव्य है।

इस्लाम सिर्फ विश्वास नहीं, व्यवहार है।

और सबसे बढ़कर, इस्लाम किसी समूह का अधिकार नहीं, पूरे मानवता का सन्देश है।

आज जब इस्लाम का नाम सुनते ही दुनिया के कुछ हिस्सों में हिंसा, कट्टरता और आतंकवाद की छवि उभरती है, तब कंथापुरम जैसे धार्मिक नेता इस छवि को चुनौती देते हैं। वे यह याद दिलाते हैं कि पैगंबर मुहम्मद का इस्लाम तलवार का नहीं, शब्द का; डर का नहीं, करुणा का; और प्रतिक्रिया का नहीं, विवेक का इस्लाम था।

ऐसे नेता केवल मुस्लिम समाज के नहीं, पूरे सभ्य समाज के प्रतिनिधि हैं। उन्हें समर्थन और सम्मान इसलिए नहीं मिलना चाहिए कि वे मुसलमान हैं, बल्कि इसलिए कि वे मानवता के प्रतिनिधि हैं।

कंथापुरम अबू बकर मुसलियार की भूमिका हमें यह सोचने को विवश करती है कि शायद अब समय आ गया है कि धर्म को भीड़ नहीं, विवेक तय करे, ताकि वह नफ़रत का शस्त्र नहीं, शांति का शास्त्र बन सके।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply