शिक्षा के जगत में ऐसे अनेक मसले हैं, जो देखने में भले ही सरल लगते हों, लेकिन वे अपने में संस्कृति, आर्थिकी, और राजनीति की एक बड़ी दुनिया को समेटे हुए होते हैं। उन मसलों में समाई हुई बड़ी दुनिया उस समय खुलकर सामने आने लगती है, जब कहीं से प्रतिरोध या विरोध या विरोधी आवाज सुनाई देती हैI उस विरोध की आवाज को दबाते देखकर कुछ लोग पूछने लगते हैं कि उस विरोध से ऐसी कौन सी बात उभरकर सामने आने का खतरा है, जिसके कारण विरोध को दबाया जा रहा है।
ऐसा अक्सर तब होता है जब किसी संस्कृति, परंपरा या राजनैतिक गतिविधि को सर्वजन हिताय मान लिया जाता है। यह मान लिया जाता है कि जो कुछ हो रहा है। वह सबके फायदे के लिए है I कांवड़ जैसी धर्मिक यात्रा को भी मान लिया जाता है कि यह भले की यात्रा है। लेकिन इस यात्रा में शामिल होने वाले, शामिल ना होने वाले, और शामिल ना होकर भी इससे राजनीतिक लाभ उठाने वालों के लिए इस यात्रा के हानि और लाभ अलग-अलग हैं।
कांवड़ यात्रा में नाबालिग बच्चों के शामिल होने को लेकर उत्तर प्रदेश में बहस तब तेज हो गयी, जब उत्तर प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में हिंदी के एक टीचर, रजनीश गंगवार, ने मॉर्निंग असेंबली में अपने विद्यार्थियों के सामने अपनी लिखी हुई एक कविता पढ़ दी। अपनी कविता में वे अपने विद्यार्थीयों को संदेश दे रहे हैं कि वे पढ़ाई पर ध्यान दें और कांवड़ लेने ना जाएँ। उनकी कविता विद्यार्थियों को मानवता के हित में काम करने और पढ़-लिखकर बड़ा व्यक्ति बनने के लिए प्रेरित कर रही है।
अगर हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 A को सामने रखें तो ऐसा लगता है कि रजनीश गंगवार ने अपनी कविता के माध्यम से कुछ आलोचनात्मक बिन्दु उठाकर, अपने विद्यार्थियों में तर्क और वैज्ञानिक चेतना का विकास करने का प्रयास किया है। भारत का संविधान कहता है कि यह प्रत्येक नागरिक की ड्यूटी है कि वह वैज्ञानिक चेतना का विकास करेI रजनीश गंगवार की कविता भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 A पर खरी उतरती हुई दिखती है। स्कूल के नाबालिक बच्चों के संदर्भ में तो यह कविता और भी मूल्यवान हो जाती है।
रजनीश गंगवार ने वह कविता अपने बच्चों के लिए लिखी थीI वे समझाना चाह रहे थे कि बच्चों के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण हैI लेकिन साम्प्रदायिक और दकियानूसी शक्तियों ने उनकी कविता को वायरल करवा दियाI और रजनीश गंगवार के खिलाफ़, उत्तर प्रदेश पुलिस की FIR ने उस कविता को और भी वायरल करवा दिया।
अब आप उत्तर प्रदेश के प्रशासन का दोगलापन देखिएI अभी इसी महीने की बात है। उत्तर प्रदेश प्रशासन ने एक आदेश जारी कियाI उस आदेश में कहा गया कि मुहर्रम के जुलूस में नाबालिग बच्चे ताजिया नहीं उठा सकते। यानी प्रशासन ने नाबालिग बच्चों के ताजिया उठाने पर रोक लगा दी। अगर ताजिया उठाने पर रोक लगाई गयी है, तो कांवड़ उठाने पर क्यों नहीं लगाई गयी। बच्चे की सुरक्षा को ध्यान में रखकर, उनके द्वारा ताजिया उठाने पर रोक लगाई गयी। यह एक अच्छी बात है I लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से नाबालिग बच्चों के द्वारा कांवड़ उठाने पर रोक क्यों नहीं लगाई गयी?
स्कूल टीचर रजनीश गंगवार ने रोक नहीं लगाई। उन्होंने अपना मत व्यक्त किया। उन्होंने बच्चों को सलाह दी। उन्होंने किसी का हाथ नहीं पकड़ा। ना ही किसी बच्चे के माता-पिता पर दबाव बनाया। उन्होंने कविता के माध्यम से कुछ तर्क रखे। ताकि विद्यार्थी इनफॉर्मइड डिसीजन लेने की तरफ़ बढ़ सकें।
इस लेख में हम स्कूल में प्रार्थना और धर्म से जुड़ी बातों की जगह को समझने की कोशिश करेंगे I प्रोफेसर कृष्ण कुमार शिक्षा जगत की एक जानी-मानी हस्ती हैं। उनकी किताब का नाम है राज, समाज, और शिक्षा। इस किताब में उनका एक लेख है I उस लेख का शीर्षक है प्रार्थना: एक शैली। अपने इस लेख में कृष्ण कुमार पूछते हैं कि राज्य द्वारा संचालित स्कूलों में प्रार्थना की क्या जगह होनी चाहिए ? एक धर्मनिरपेक्ष राज्य द्वारा संचालित स्कूलों की प्रार्थना का, धर्मनिरपेक्ष स्वरूप कैसा होना चाहिए? स्कूल की प्रार्थनाओं में जिसकी आराधना की जा रही है, उस आराध्य का स्वरूप क्या है और वह आराध्य, लोकतंत्र एवं धर्मनिरपेक्षता के किन गुणों का प्रतीक है।
जब हम स्कूल में होने वाली प्रार्थनाओं और प्रार्थना सभा में की जाने वाली बातों को इन सवालों के परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश करते हैं तो हमें लगने लगता है कि यह मामला जितना सीधा और सरल दिखाई देता है, दरअसल यह उतना सीधा और सरल है नहीं।
कौन विवादित, क्यों विवादित ?
कहा जा रहा है की रजनीश गंगवार की कविता एक विवादित कविता है। रजनीश गंगवार ने कहा कि कांवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान का दीप जलाना I यहाँ मैं ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि अनेक स्कूलों की प्रार्थना सभा में वर दे वीणा वादिनी, वर दे प्रार्थना गायी जाती है।
यह प्रार्थना भी दो आधारों पर विवादित है। विवाद का एक आधार तो यह है कि स्कूल में विद्यार्थी, शिक्षित होने के लिए आते हैं, कोई वरदान मांगने के लिए नहीं I अगर वरदान के विचार को मान रहे हो तो फिर वरदान देने वाले के विचार को भी मानना होगा I लेकिन आधुनिक शिक्षा की संकल्पना में वरदान जैसी संकल्पना के लिए कोई जगह नहीं है। शिक्षा को किसी के वरदान से हसिल नहीं किया जा सकता, और वह भी औपचारिक- शिक्षा को I उसे तो केंद्र सरकार, राज्य सरकार, लोकल एडमिनिस्ट्रेशन, स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन, शिक्षकों और विद्यार्थियों के समेकित प्रयासों से ही हसिल किया जा सकता है I लेकिन वर दे वीणा वादिनी, वर दे जैसी प्रार्थना में विद्यार्थियों को वरदान मांगने के लिए लाइन में खड़ा कर दिया जाता है। वरदान की संकल्पना भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 A के खिलाफ़ है I क्योंकि इससे वैज्ञानिक चेतना का विकास नहीं हो सकता I अतार्किक और अवैज्ञानिक चेतना का विकास जरुर हो सकता है I
वर दे वीणा वादिनी, वर दे में विवाद का एक विषय यह है कि आधुनिक स्कूल, लोकतंत्रिक जगह हैं, जहां विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच का विकास और विस्तार होना है, ना कि उन्हें मिथकीय पात्रों से वरदान मांगने के काम में लगाया जाए।
वर दे वीणा वादिनी, वर दे प्रार्थना पर विवाद की संभावना इसलिए भी है, क्योंकि यह प्रार्थना एक खास समूह के मिथकों और प्रतीकों के आधार पर बनी है I इसलिए इसे ऐसे स्कूल में तो बिलकुल ही नहीं गाना चाहिए, जिस स्कूल में जनता का पैसा खर्च होता है।
वर दे वीणा वादिनी, वर दे कोई इंक्लूसिव प्रार्थना नहीं है I यह प्रार्थना एक्सक्लूसिव है। इस प्रार्थना के एक्सक्लूसिव होने के कारण, यह प्रार्थना विवादास्पद हो जाती है I लेकिन इस प्रार्थना को विवादित नहीं कहा जाता। जबकि रजनीश गंगवार की कविता तू कांवड लेने मत जाना, तू ज्ञान का दीप जलाना को विवादित बना दिया गया है। यह तथ्य इस बात को बताता है कि भारत में बहुसंख्यक का आतंक मौजूद है, उनकी मनमानी मौजूद है।
अनुच्छेद 28
वर दे वीणा वादिनी, वर दे प्रार्थना में रिलीजियस इंस्ट्रक्शन दी जा रही है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 28 के अनुसार सरकारी स्कूलों में और उन स्कूलों में जहां जनता का जरा भी पैसा खर्च होता है, उनमें रिलीजियस इंस्ट्रक्शन नहीं दी सकती I इस संबंध में सर्वोच न्यायालय का सन 2002 में आया एक फैसला भी है I उस फैसले में साफ़-साफ़ कहा गया है कि जिन स्कूलों में सरकारी पैसा खर्च होता है, उन स्कूलों में किसी भी प्रकार की रिलीजियस इंस्ट्रक्शन नहीं दी जा सकती है I वर दे वीणा वादिनी, वर दे जैसी प्रार्थनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को वरदान मांगने के लिए कहा जा रहा है I और वो भी एक धर्म को मानने वाले लोगों की देवी से I जैसे कि अन्य धर्मों में मांगने का चलन नहीं है या उन धर्मों में किसी देने वाले की रचना नहीं की गयी है I
लेकिन स्कूली विद्यार्थियों को मांगने की आदत डलवाने वाली प्रार्थना को विवादित नहीं कहा। जबकी यह प्रार्थना दो आधारों पर विवादित है I एक अपने एक्सक्लूसिव नेचर की वजह से और दूसरी रिलीजियस इंस्ट्रक्शन की परिभाषा में आने के कारण I
आमतौर पर जो प्रार्थना या कविता बहुसंख्यकों को खुश करने वाली नहीं होती, उसको विवादित कह दिया जाता है।
सरकारी स्कूलों में किसी ईश्वर, अल्लाह, गोड आदि की प्रार्थना का होना ही गैर-संवैधानिक है। अगर विवाद होना ही है तो पहले वर दे वीणा वादिनी, वर दे जैसी प्रार्थनाओं पर होना चाहिए I यहां पर कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि इस प्रार्थना में ईश्वर से ज्ञान का वरदान मांगा जा रहा है, इसलिए इससे किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए I उस व्यक्ति की बात पर यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या ज्ञान का वरदान देने वाले ईश्वर केवल हिंदू धर्म में पाए जाते हैं?
प्रार्थनाओं के जरिए ईश्वर से अपनी इच्छाएं पूरी करवाने का विचार तो दुनिया के लगभग सभी धर्मों में पाया जाता है I फिर स्कूलों में केवल एक धर्म के ईश्वर को ही स्थान क्यों दिया जा रहा हैI इसका अर्थ यह है कि बात केवल प्रार्थना की नहीं हैI बात सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करने की हैI
कुछ लोगों को ऐसा लग सकता है की हिन्दू सांस्कृतिक वर्चस्व वाली बात वह बुनियाद है। स्कूलों में हिंदू संस्कृति के वर्चस्व को बनाए रखने वाली बात सही है, इसे तथ्य को आप दो उदाहरण से समझिए।
पहला उदाहरण उत्तर प्रदेश से हैI दिसंबर 2022 में उत्तर प्रदेश में बरेली ज़िले के एक सरकारी स्कूल में प्रार्थना के दौरान प्रख्यात कवि इक़बाल की कविता ‘लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी’, ज़िंदगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी! का पाठ कराने को लेकर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने प्रिंसिपल और शिक्षामित्र के ख़िलाफ़ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में केस दर्ज कराया था। उस मामले में प्रिसिंपल सहित दो टीचर्स को निलंबित कर दिया गया था I
उस प्रार्थना को करवाने मात्र से शिक्षा अधिकारियों ने मान लिया कि निलंबित किये गये प्रिंसिपल और टीचर, धर्म परिवर्तन करवा रहे थे I अगर प्रार्थना में खुदा शब्द आ जाने से किसी धर्म का प्रचार मान लिया गया तो फिर भगवान शब्द आने से यह क्यों न माना जाए कि स्कूलों में हिन्दू धर्म का प्रचार हो रहा है I ये उदाहरण भी बताता है कि भारत में अनेक प्रशासनिक मामलों में लोकतंत्र नहीं, बहुसंख्यकवाद की चल रही है I
एक उदाहरण और देखिएI यह उदाहरण भी उत्तर प्रदेश से ही है I अक्टूबर 2019 की बात है I उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में विश्व हिंदू परिषद ने सरकारी स्कूल के एक शिक्षक पर यह आरोप लगाया कि उसने स्कूल में एक धार्मिक प्रार्थना करवाई है I विश्व हिंदू परिषद के विरोध के बाद, उस शिक्षक को सस्पेंड कर दिया गया I जिस प्रार्थना को गवाने के आरोप में उस शिक्षक को सस्पेंड किया गया, वह प्रार्थना इकबाल की मशहूर कविता सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा थी I
अगर लब पे आती है दुआ बन के तम्मना मेरी या सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा धार्मिक प्रार्थना है तो फिर वर दे वीणा वादिनी, वर दे भी धार्मिक प्रार्थना ही है।
लेकिन किस प्रार्थना को करवाने के कारण टीचर की नौकरी चली जाएगी और किस प्रार्थना पर नहीं जाएगी, यह किसी लोकतान्त्रिक तर्क से नहीं, बल्कि बहुसंख्यक को खुश करने की मंशा से तय हो रहा है I
परसों ही उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक जनसभा में कहा कि कांवड़ यात्रियों को बदनाम किया जा रहा है I वहीं उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कांवड़ यात्रियों के हॉकी-डंडे लेकर चलने पर पाबंदी लगा दी है I अगर कांवड़-यात्री शांति के पुजारी हैं तो फिर उत्तर प्रदेश प्रशासन को उन पर लाठी-डंडा और अन्य हथियार लेकर चलने पर पाबंदी क्यों लगाई?
11 जुलाई से कांवड़-यात्रा शुरू हुई I 19 जुलाई को TOI ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि 18 जुलाई तक कांवड़-यात्रियों की गुंडागर्दी के 170 मामले Mela Police Force Control Room के पास दर्ज हो गये थे I केवल 7 दिनों में कांवड़ियों की आतंकी घटनाओं के 170 मामले दर्ज हो गये थेI यानि इनके द्वारा, हर रोज 10 आतंकी वारदातों को अंजाम दिया जा रहा थाI ये Mela Police Force Control Room के आंकड़े हैं।
Akhil Bharatiya Akhada Parishad के अध्यक्ष Mahant Ravindra Puri को क्यों कहना पड़ा कि कांवड़-यात्रा क्रोध दिखाने और अव्यवस्था फ़ैलाने के लिए नहीं है?
इन रिपोर्ट्स और धार्मिक संगठनों की चिंता के बावजूद आदित्यनाथ कह रहे हैं कि कांवड़-यात्रियों को बदनाम किया जा रहा हैI
टीचर रजनीश गंगवार अपनी कविता के जरिये नाबालिग बच्चों को कांवड़ से दूर रहने के लिए ठीक ही कह रहे हैंI नाबालिग बच्चे पूरे रास्ते जिस तरह की भाषा सुनेंगे और जिस तरह के दृश्य देखेंगे, उनसे उनके बाल-मन पर बुरा असर पड़ना-ही-पड़ना हैI एक टीचर अपने विद्यार्थियों को बुरी आदतों से दूर करके पढ़ाई में मन लगाने के लिए प्रेरित कर रहा है और राज्य उसके खिलाफ FIR आदर्श कर रही है I पता है क्यों ? क्योंकि ऐसा करके राज्य को बहुसंख्यक समुदाय के लोगों का अपीजमेंट करना हैI
गीता के पक्ष में प्रचार बनाम कांवड़ के विरोध में प्रचार
14 जुलाई को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की कि वहाँ के स्कूलों में गीता और रामायण से जुड़े हुऎ पाठ पढ़ाए जाएंगे। उत्तराखंड के मध्यमिक शिक्षा निदेशक ने इस आशय का एक सर्कुलर भी जारी कर दिया है ।

हालाँकि उस सर्कुलर से या साफ नहीं है की यह निर्णय सरकारी स्कूलों पर लागू होगा या राज्य में चल रहे सभी स्कूलों पर I उस सर्कुलर के जरिये, उत्तराखंड की स्कूली-शिक्षा में गीता और रामायण को पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया है।
हमें याद रखना चाहिए कि उत्तराखंड में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। उत्तराखंड में 13वीं शताब्दी में बनी प्रसिद्ध Kaliyar Sharif Dargah है। यह दरगाह, उस समय के सूफी संत Alauddin Sabir Kaliyari की दरगाह है I उत्तराखंड में अनेक चर्च हैं I यहाँ सिखों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हेमकुंड साहब भी है।
इन तथ्यों के होते हुए भी उत्तराखंड के मध्यमिक शिक्षा निदेशक का सर्कुलर, सिर्फ हिंदुओं से जुड़ी किताब को सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य बना रहा है। क्या अन्य धार्मिक परंपराएं, अभी तक भी बिना ज्ञान के बनी हुई है? जब यह इस झूठ को मान लिया जाता है कि हमारी केवल एक संस्कृति है तो इसी राजनैतिक स्थिति को बहुसंख्यकों का आतंक कहते हैं I
ऐसी अनेक रिपोर्ट्स आ रही है जिसमें बताया जा रहा है कि जो कांवड़-यात्री गुंडागर्दी, लूटपाट, तोड़फोड़ जैसी गैर-क़ानूनी गतिविधियों में पाये गये हैं उन्हें उत्तर प्रदेश की पुलिस समझा बुझाकर छोड़ रही है। क्या ऐसी सुविधा अन्य धर्म मानने वाले लोगों को भी उपलब्ध होती है?
उदारवादी राजनैतिक सिद्धांत पर जे. एस. मिल की एक किताब है I उस किताब का नाम है – On Liberty I मिल ने अपनी उस किताब में बहुसंख्यकों का आतंक यानि Tyranny of the majority नाम के एक कांसेप्ट को समझाया है । यह वो स्थिति होती है जब लोकतंत्र के नाम पर बहुसंख्यकवाद हावी हो जाता है। इस समय भारत में Tyranny of the majority बहुत काम कर रही है। वह उत्तराखंड में भी काम कर रही है। वह उत्तर प्रदेश में भी काम कर रही है I बहुसंख्यकों के आतंक के कारण कम ही लोग बोल पा रहे हैं कि सरकारी स्कूलों में गीता के श्लोक सुनाना एक विवादित आदेश है I PPID यानि People’s Party of India Democratic की उत्तराखंड इकाई ने स्कूलों में गीता पढ़ाने के आदेश के खिलाफ़ उत्तराखंड के राज्यपाल को ज्ञापन दिया हैI
तो रजनीश गंगवार की कविता विवादित बना दी गई, लेकिन उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश आदि के स्कूलों में गीता के श्लोक सुनाना विवादित नहीं बना क्यों? क्योंकि भारत में Tyranny of the majority अपना असर रखती है और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
सरकारी स्कूल में धर्म के पक्ष या विपक्ष में प्रचार गैर–क़ानूनी है
यहां तक तो बात हुई कि भारत में और खास तौर पर उत्तर भारत में हमको बहुसंख्यकों का आतंक और उनकी मनमानी अनेक रूपों में दिखाई देती है। लेकिन जहां तक रजनीश गंगवार की कविता का सवाल है, मेरे ख्याल से स्कूल के मंच से उस कविता को नहीं पढ़ा जाना चाहिए था। क्योंकि उस कविता में वो टीचर इंस्ट्रक्शन दे रहा है कि बच्चों को किसी खास धार्मिक उत्सव में शामिल नहीं होना चाहिए। मेरी समझ से स्कूल के मंच का उपयोग न तो किसी धर्म को प्रचारित करने के लिए और ना ही किसी धर्म की खिलाफत करने के लिए किया जाना चाहिए।
कावड़-यात्रा पर मत जाओ यह कहना उतना ही गैर-संवैधानिक है जितना कि “वर दे वीणा वादिनी वर दे” प्रार्थना या गीता के श्लोक गवाना। स्कूल की प्रार्थना सभा का उपयोग किसी भी धार्मिक समुदाय की मान्यताओं को फैलाने या उनका विरोध करने के लिए नहीं होना चाहिए।
लेकिन इस बात को कहने में मैंने देर इसलिए लगाई ताकि मैं आपको उन संवैधानिक प्रावधानों और राजनीतिक विचारों की कुछ यात्रा करवा सकूं जिनकी मदद से हम यह देख-समझ सकें कि भारत में बहुसंख्यकों की मनमानी अनेक जगहों और फैसलों में दिखाई देती है और जो इस रजनीश गंगवार के केस में भी दिखाई दे रही है I हमें दिखाई दे रहा है कि किसी धर्म की खिलाफत करने के कारण रजनीश गंगवार के खिलाफ तो FIR दर्ज हो गई है, लेकिन उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य स्कूलों को हिन्दू धर्म के प्रचार का मंच बनाने में लगे हुए हैं।
जिस स्थिति में बहुसंख्यकों के धर्म की खिलाफत करना अपराध और बहुसंख्यकों के धर्म का प्रचार करना शिक्षा माना जाता हो उसी तरह की राजनैतिक स्थिति को J. S. Mill ने अपनी किताब On Liberty में बहुसंख्यकों का आतंक कहा हैI
(बीरेंद्र सिंह रावत शिक्षा विभाग, दिल्ली–विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हैं)