बिहार में दलितों के बीच सर्वे में आए चौंकाने वाले आंकड़े; महागठबंधन को बढ़त, नीतीश की पकड़ कमजोर

नई दिल्ली। बिहार में दलित समुदाय के बीच किए गए सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े आए हैं। सर्वे के मुताबिक दलितों के बीच महागठबंधन को सबसे ज्यादा समर्थन है जबकि मुख्यमंत्री नीतीश की पकड़ कमजोर हो गयी है। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में भी इस हिस्से में पीएम मोदी बहुत कम अंतर से ही कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से आगे हैं।

यह सर्वे नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइजेशन्स (NACDOAR) और द कन्वर्जेंट मीडिया (TCM) ने किया है। 18,581 सैंपल साइज के साथ यह सर्वे बिहार को छह क्षेत्रों में बांटकर किया गया – कोसी, मिथिलांचल, सीमांचल, भोजपुर, चंपारण, और मगध-पाटलिपुत्र। सर्वे प्रदेश की 49 विधानसभा सीटों पर किया गया, जिनमें 11 अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीटें शामिल हैं।

 नैकडोर के चेयरमेन अशोक भारती और टीसीएम के डायरेक्टर प्रेम कुमार एवं रंजन कुमार ने दावा किया कि यह पहल दलित कार्यकर्ताओं द्वारा दलित समुदाय की राय को सामने लाने की अनूठी कोशिश है। इसके लिए 98 कार्यकर्ताओं को पटना, बेगूसराय और दरभंगा में चार प्रशिक्षण शिविरों में प्रशिक्षित किया गया। प्रशिक्षण और सर्वेक्षण का काम 10 जून से 4 जुलाई तक 25 दिन चला।

महागठबंधन को बढ़त

सर्वेक्षण के बाद आये नतीजों में सबसे प्रमुख बात जो सामने आयी है वह है सर्वे में दलितों को बढ़त मिलना। आंकड़ों के मुताबिक दलित समुदाय में महागठबंधन को 46.13% समर्थन मिला, जबकि एनडीए को 31.93%। कोसी (72.33%) और भोजपुर (53.75%) में महा गठबंधन की मजबूत स्थिति है, जबकि सीमांचल में एनडीए (42.57%) को बढ़त है। 2020 के विधानसभा चुनाव की तुलना में महागठबंधन का वोट शेयर 0.19% बढ़ा, जबकि एनडीए का 4.6% घटा।

नीतीश की पकड़ पड़ी कमजोर

महादलितों में नीतीश का पूरा आधार बताया जाता था। लेकिन पिछले 20 सालों के उनके शासन में इसे रीढ़ के तौर पर देखा जाता था। लेकिन इस सर्वे के मुताबिक नीतीश की पकड़ इस हिस्से में कमजोर पड़ गयी है। खास तौर से यह इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बिहार में महादलित की सोच नीतीश कुमार ने ही स्थापित की थी। दुसाध (18.79%) में सबसे कम और बाकी दलित जातियों (महादलित) में नीतीश को समर्थन 20 से 33 प्रतिशत के बीच है। 

तेजस्वी सबसे ज्यादा लोकप्रिय

आरेजडी और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी की लोकप्रियता इस हिस्से में सबसे ज्यादा है। तेजस्वी यादव (28.83%) बिहार में दलितों के सबसे पसंदीदा नेता हैं। दूसरे नंबर पर चिराग पासवान (25.88%) हैं और दलितों में नीतीश कुमार (22.80%) पिछड़कर तीसरे नंबर पर पहुंच गए हैं। 

बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा

बिहार में पलायन ज्यादा होता है यह पूरा देश जानता है। और इस सर्वे में भी यही बात खुलकर सामने आयी है। इसीलिए सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक बेरोजगारी को सबसे बड़ा बिहार का मुद्दा है। सर्वे में 58.85% दलित मतदाताओं ने बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा बताया, विशेष रूप से कोसी (80.51%) और भोजपुर (61.42%) में। शिक्षा-स्वास्थ्य (14.67%) और भ्रष्टाचार (11.21%) भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। तेजस्वी यादव द्वारा बेरोजगारी पर लगातार उठाए गए सवालों का प्रभाव दलित समुदाय में स्पष्ट दिखा है।

राष्ट्रीय नेताओं में मोदी-राहुल सबसे ज्यादा लोकप्रिय

राष्ट्रीय नेताओं की लोकप्रियता के मामले में भले ही अभी पीएम मोदी बढ़त बनाए हुए हैं लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी इस मामले में उनके बेहद करीब पहुंच गए हैं। दलित मतदाताओं में नरेंद्र मोदी 47.51% जबकि राहुल गांधी की लोकप्रियता 40.30% है। हालांकि मोदी अभी आगे हैं लेकिन बिहार में कांग्रेस के सीमित प्रभाव को देखते हुए राहुल गांधी को मिल रहा समर्थन बड़ा लगता है। राहुल गांधी आंकड़ों में नरेंद्र मोदी को टक्कर देते दिख रहे हैं।

दलित नेताओं में राम विलास पासवान नंबर 1

बात जब दलित नेताओं की लोकप्रियता की आयी तो उसमें राम विलास पासवान नंबर वन पर दिखे। राम विलास पासवान को 52.35% दलितों ने सबसे बड़ा दलित नेता माना, विशेष रूप से दुसाध (65.37%) और अन्य छोटी जातियों (68.36) में। रविदास/च.. में बाबू जगजीवन राम (47.87%) को प्राथमिकता मिली।

जाति जनगणना का श्रेय राहुल और तेजस्वी को

दिलचस्प आंकड़ा जातिगत जनगणना पर आया है। भले ही मोदी सरकार ने इसका ऐलान किया हो लेकिन इसका पूरा श्रेय राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को दिया जा रहा है। सर्वे में यह बात खुलकर सामने आयी है। राहुल गांधी (30.81%) और तेजस्वी यादव (27.57%) को मिलाकर महागठबंधन को 58.38% लोग जातिगत जनगणना का श्रेय देते हैं, जबकि नरेंद्र मोदी को महज 33.15%। 

नीतीश से नाराजगी

अभी तक अपने कामकाज के भरोसे वोट मांगने वाले नीतीश कुमार के लिए यह सर्वे परेशान करने वाला है। क्योंकि दलितों में उनके कामकाज को लेकर नाराजगी है। आंकड़ों के मुताबिक नीतीश सरकार के कामकाज को 48.43% दलितों ने खराब बताया, विशेष रूप से भोजपुर (71.10%) और कोसी (68.75%) में। मेहतर/हाडी/वाल्मीकि (54.30%) और पासी (53.03%) में थोड़ी सकारात्मक राय ज़रूर दिखी। यहां भोजपुर में दलितों के नीतीश कुमार के खिलाफ जाने की एक प्रमुख वजह वहां दलितों के बीच भाकपा माले के आधार का होना है।

चुनाव आयोग से उठा भरोसा

लोगों को अब चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं रह गया है। जिस तरह से उसने मतदाता गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की है उससे लोगों के बीच उसके प्रति संदेह और बढ़ गया है। केवल 51.22% लोग चुनाव आयोग पर भरोसा करते हैं, जबकि 27.40% इसे निष्पक्ष नहीं मानते। कुल मिलाकर ऐसे लोगों का आंकड़ा 80 फीसदी से ऊपर हो जाता है।

मतदाता सूची से नाम कटने का डर

चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया के आगे बढ़ने के साथ ही लोगों का मतदाता सूची से अपना नाम कटने की आशंका बढ़ गयी है। 71.56% दलित इस बात से डरे हुए हैं। विशेष रूप से रविदास/च.. (83.05%) और पासी (78.84%) में यह डर ज्यादा है। उसी तरह से सीमांचल (78.08%) और कोसी (77.19%) में यह चिंता सबसे अधिक है।

आरक्षण सीमा बढ़ाने पर सहमति

कांग्रेस नेता राहुल गांधी आरक्षण की सीमा को लगातार बढ़ाए जाने का वादा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सत्ता में आते ही वह 50 की लक्ष्मण रेखा को तोड़ देंगे। जमीन से भी इस बात की मांग उठ रही है। सर्वे में सामने आया कि 82.89% दलित आरक्षण का दायरा बढ़ाने के पक्ष में हैं। आरक्षण की सीमा तोड़ने की राजनीतिक मुहिम का ये असर हो सकता है। 

राजनीतिक समर्थन की जहां तक बात है तो महागठबंधन को इस हिस्से में खासी बढ़त मिलती दिख रही है। रविदास/च.. (52.31%) और अन्य छोटी जातियां (57.76%) महागठबंधन का मजबूत आधार हैं। जबकि दुसाध (37.34%) और मेहतर/हाडी/वाल्मीकि (35.73%) में एनडीए को समर्थन हैं।

सर्वे को संचालित करने वालों का कहना है कि यह सर्वे दलित कार्यकर्ताओं द्वारा दलित समुदाय के बीच किया गया है। और इसमें बिहार की सभी 23 दलित जातियों को शामिल किया गया है। इनमें 9 प्रमुख जातियां (97.8% आबादी) शामिल हैं। जिनमें दुसाध (31%), रविदास (30.72%), और मुसहर (17.08%) प्रमुख हैं। सर्वे में उम्मीदवार (44.66%) और पार्टी (32.51%) को मतदान का आधार बताया गया, जबकि जाति (10.09%) का प्रभाव सीमित है। हालांकि पसंद के उम्मीदवार का आधार जातिगत हो सकता है।  

कुल मिलाकर सर्वे बिहार की राजनीति में दलित समुदाय की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करता है। महागठबंधन की बढ़ती लोकप्रियता, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी का प्रभाव, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों का उभरना नीति निर्माताओं और राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है।

(सर्वे पर आधारित रिपोर्ट।)

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