बिहार में 56 लाख घुसपैठिए? चुनाव बहिष्कार पर मंथन और फिर गृह मंत्री अमित शाह से इस्तीफे की मांग की राजनीति 

तृणमूल की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा, “स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त भाजपा प्रवक्ता की तरह बोल रहे हैं। अगर केंद्र सरकार को लगता है कि 56 लाख लोग बिहार में घुसपैठ कर चुके हैं, तो गृह मंत्रालय क्या कर रहा था? यह गृह मंत्री की ज़िम्मेदारी है और उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।”

महुआ का यह बयान तब आया जब बिहार में चल रहे एसआईआर के खिलाफ संसद परिसर में लगातार पांचवें दिन तक इंडिया गठबंधन के नेताओं, सांसदों दवा प्रदर्शन चलता रहा। इस विरोध-प्रदर्शन के साथ ही संसद सत्र का पहला सप्ताह ख़त्म हो गया। अब सोमवार से संसद के भीतर और बाहर क्या होगा यह देखने की बात है। कहा जा रहा है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुई वार्ता में यह तय हुआ है कि सोमवार से संसद सुचारू रूप से चलेगा। लेकिन क्या यह संभव है? 

अब मुद्दे की बात। चुनाव आयोग ने दावा किया है कि बिहार में 56 लाख फर्जी मतदाता हैं, जिन्हें वह बिहार के वोटर लिस्ट से पहले ही हटा चुका है। सवाल है कि ये फर्जी मतदाता कौन हैं और कहाँ से आ गए थे? और आ भी गए तो कैसे? क्या ये फर्जी मतदाता विदेशी हैं? बांग्लादेशी, नेपाली या फिर रोहिंग्या? या फिर पाकिस्तानी तो नहीं? 

देश में फर्जी वोटरों पर रोक लगे यह कौन नहीं चाहता? आखिर विदेशी नागरिक इस देश के वोटर बनकर मतदान कैसे कर सकते हैं? फिर अगर ये मतदाता फर्जी हैं तो जाहिर है कि इनके वोट भी फर्जी ही हुए। इनके वोट से चुने गए नेता भी फर्जी ही माने जायेंगे। 56 लाख कोई कम मतदाता नहीं होते। पूर्वोत्तर राज्यों में कई ऐसे राज्य हैं जहाँ कि इतनी आबादी भी नहीं है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में इन्हें मतदान से वंचित अगर किया गया है तो बात अब चुनाव आयोग को बताना होगा कि इतनी बड़ी आबादी कहाँ से आयी है और यह आबादी कैसे आयी?

बिहार के सीमांचल इलाके का कुछ हिस्सा बांग्लादेश से जुड़ा हो सकता है। ऐसे में इस बात की गुंजाइश भी हो सकती है कि बांग्लादेश के कुछ लोग अवैध तरीके से भारत में सालों से रह रहे हों और फर्जी तरीके से कागजात तैयार करवा लिए हों। मतदाता भी बन गए हों और मतदान भी करते आ रहे हों। लेकिन ऐसा है तब तो अब इस बात की जांच भी की जानी चाहिए कि ये 56 लाख मतदाता अब तक किसको वोट डालते रहे हैं?

और अगर वोट डालते रहे हैं तो उस इलाके को चिन्हित करके यह भी बताने की जरूरत है कि उन इलाकों से चुनाव जीतने वाले नेता, सांसद और विधायक को फर्जी माना जाए यह असली? अगर घुसपैठियों के वोट से कोई चुनाव जीतकर आता है तो उसे भी घुसपैठिया ही कहा जा सकता है या फिर उसे घुसपैठियों का सरदार भी कहा जा सकता है। ऐसे में अगर वोटर ही फर्जी है तो चुने गए लोग भी फर्जी हो सकते हैं। इस बारे में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार का क्या तर्क हो सकता है उसे जानने की जरूरत ज्यादा है। 

अभी साल भर पहले ही लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार की 40 सीटों के लिए मतदान हुए थे। इस चुनाव में सभी पार्टियों को कुछ न कुछ सीटें हाथ लगीं। जाहिर है उस चुनाव में ये सभी फर्जी कहे जाने वाले वोटर भी मतदान किये होंगे। जब फर्जी मतदान और मतदाता क़ानूनी अपराधी हैं तब फर्जी वोट से चुने गए लोग भी फर्जी हैं और अपराधी भी।

यह कुछ वैसा ही है जैसा कि 80 के दशक में बिहार समेत कई राज्यों में बन्दूक की नोक पर मतदान केंद्र को लूट लिया जाता था और चुनावी बक्सों में फर्जी वोट डाल दिए जाते थे। बिहार समेत कई राज्यों में बूथ लुटेरों की एक फ़ौज तैयार कर ली थी नेताओं ने। यानी फर्जी वोट के जरिये पहले भी दबंग नेता चुनाव जीत रहे थे और अब फर्जी मतदाता के जरिये भी बहुत से नेता जीत हासिल कर रहे हैं। 

यह कैसे हो सकता है कि जो मतदाता पिछले कई चुनावों तक फर्जी नहीं था अब वह फर्जी हो गया है। क्या चुनाव आयोग इस पर कोई सफाई देगा ? और सफाई देता भी है तो क्या वह यह ऐलान करेगा कि 56 लाख वोटरों ने जिसे वोट डाला वह सब अवैध था और उनकी जीत -हार भी अवैध थी। और यह सब अगर अवैध है तो बिहार की सरकार भी अवैध हो सकती है। और जब सरकार ही अवैध है तो उसके सारे फैसले भी वैध नहीं ही होंगे ? लेकिन यह सब बड़ी प्रक्रिया है। किसी को झट से हटा देना तो मामूली सी बात है लेकिन उसके इतिहास को मिटाना काफी कठिन है। 

फिर सवाल यह भी है कि सरकारी कर्मचारियों ने उन फर्जी वोटरों को मतदान केंद्रों पर वोट डालने दिया वह भी गलत काम किया। असंवैधानिक काम। क्या उनकी नौकरी को चुनौती दी जा सकती है? क्या उनकी नौकरी ख़त्म की जा सकती है और क्या उन्हें देशद्रोही साबित किया जा सकता है? ऐसे बहुत से सवाल उठ रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग किसी का जवाब नहीं दे रहा है। 

इसका अंजाम आगे क्या होगा यह देखने की बात हो सकती है। खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और वंचितों के वोट छीनना चाहती है ताकि वह मनुस्मृति के अनुसार भारत के संविधान को बदल सके। खड़गे ने यह भी कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था ‘वोटबंदी’ की इस साजिश में भाजपा-आरएसएस का साथ दे रही है। उन्होंने आरोप लगाया, “पूरे देश ने देखा है कि कैसे बिहार में चुनाव आयोग के बीएलओ बैठकर अपने लोगों से फॉर्म भरवा रहे हैं, ताकि समाज के वंचित वर्गों से वोट का अधिकार छीना जा सके। अब चुनाव आयोग पूरे देश में यही करेगा।”

उन्होंने यह भी कहा, “भाजपा भारत के संविधान और लोकतंत्र से नफरत करती है। वह बाबा साहेब डॉ. बीआर अंबेडकर और पंडित (जवाहरलाल) नेहरू द्वारा बनाए गए संविधान पर हमला करने के लिए हर दिन नए तरीके ईजाद करती है।”

लेकिन मामला केवल खड़गे के बयान तक का ही नहीं है। बीजेपी जो कर रही है उसकी आंच पूरे देश में फैलना तय है। बीजेपी के लिए जितना बिहार ज़रूरी है उतना ही बंगाल और फिर यूपी को साधना भी ज़रूरी है। मोदी और शाह को लग रहा है कि भले ही वह पूरे उत्तर भारत को अपने में समेट लिए हैं लेकिन जब तक बिहार और बंगाल को वह नहीं जीत पाएगी तब तक मिशन पूरा नहीं होगा।

याद रहे बंगाल वाम राजनीति का केंद्र रहा है। वहां लम्बे समय तक वाम दलों की सरकार रही है। वहां के अधिकतर लोग बीजेपी के खेल को जानते हैं और अधिकतर लोग सेक्युलर और एकता में यकीन भी रखते हैं। वे खुदीराम बोस को भी मानते हैं और सुभाष चंद्र बोस के दर्शन को भी पूजते हैं। वहां के लोग रवींद्रनाथ टैगोर को भी आदर करते हैं और मौजूदा आधुनिक नेताओं को भी स्वीकार करते हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए बिहार और बंगाल को भेदना काफी कठिन हो गया है। बीजेपी की राह इन राज्यों में आसान बने इसलिए यह वोटर और वोट लिस्ट बनाने का खेला तैयार किया गया है। 

लेकिन कहानी को और विस्तार देने के लिए शुक्रवार को ही चुनाव आयोग ने यह ऐलान किया कि अब वोटर पुनरीक्षण का काम पूरे देश में होगा। आयोग का यह बयान केवल इसलिए है क्योंकि उसके ऊपर कोई शक न करे। कोई कह सकता है कि जब पूरे देश में यह काम होना है तो बिहार और कुछ राज्यों को इसमें क्या आपत्ति है? 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो अब यह हो चला है कि अगर बिहार में अभी तक 56 लाख फर्जी वोटर पाए गए हैं और उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिये गए हैं तो अमित शाह अभी तक चुप क्यों हैं? ये फर्जी वोटर कैसे आये यह तो उन्हें बताना होगा और सिर्फ बताना ही नहीं यह भी साबित करना होगा कि ये किस देश से आये हैं?

उन्हें यह भी बताना पड़ेगा कि उनके जैसे सख्त गृह मंत्री के होते हुए इतनी बड़ी चौकसी में कैसे चूक हो गई? कैसे देश का बॉर्डर घुसपैठियों के लिए खुल गए? फिर कैसे वे देश में आ गए और देश के मतदाता और नागरिक भी बन गए। कैसे उनके पास तमाम कागजात भी आ गए? और इसके बाद अगर वाकई में मानते हैं कि देश में घुसपैठिये पहुँच गए हैं तो उन्हें विपक्ष द्वारा की गई इस्तीफे की मांग को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन क्या वे ऐसा करेंगे ?

बिहार में मतदाता सूची गहन परीक्षण यानी स्पेशल इंटेसिव रिविजन (एसआईआर) के मामले पर सरकार और विपक्ष के बीच छिड़ा विवाद इतने गंभीर स्तर तक जा पहुंचा है कि नौबत चुनाव का बहिष्कार करने जैसे फैसले तक पहुंच गई है। बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने साफ कहा है कि जब चुनाव में धांधली ही करनी है तो वैसे ही बिहार सरकार को एक्सटेंशन दे दो। 

उन्होंने कहा कि महागठबंधन में सभी दल चुनाव बहिष्कार के बारे में बात कर सकते हैं। हमारे पास यह विकल्प है और हो सकता है कि इस पर जल्द चर्चा भी हो। यह बयान अपने आप में काफी गंभीर है। विपक्ष सरकार से मुद्दों पर बहस कर सकता है, उसके फैसलों की खामियां निकाल सकता है, उसे किसी मसले पर राय दे सकता है, लेकिन जब पिछले दरवाजे से चुनाव जीतने की कोशिशें हों और यह तय किया जाए कि विपक्ष की हर बात को काटना ही है, तब लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाता है। 

विपक्ष के तर्कों का चुनाव आयोग या भाजपा के पास कोई जवाब नहीं दिख रहा है और इसलिए बौखलाहट भरे कुतर्क आ रहे हैं। लेकिन अब 28 जुलाई को जब सुप्रीम कोर्ट में फिर से यह मामला उठेगा, तब तक क्या चुनाव आयोग कोई बड़ा कदम उठा चुका होगा, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। तेजस्वी यादव ने तो न केवल चुनाव का बहिष्कार करने की बात कही है, बल्कि यह भी कहा है कि 1 अगस्त से असली खेला शुरू होगा। यानी उन्हें संदेह है कि तब तक लाखों नाम काटे जा चुके होंगे और जिन इलाकों में पहले भाजपा हारी है, वहां नए नाम वोटर लिस्ट में जुड़ जाएंगे जिनके वोट आखिर में भाजपा को ही जाएंगे।

यह खुलेआम लोकतंत्र की लूट है, इसलिए तेजस्वी यादव को कहना पड़ा है कि जब सब पहले ही तय है, तो फिर विपक्ष के चुनाव लड़ने का ही क्या मतलब है। उन्होंने यहां चंडीगढ़ वाकये की याद दिलाई है, जिसमें चुनाव अधिकारी के पद पर बैठे अनिल मसीह ने मतपत्र पर छेड़खानी की थी और यह सब कैमरे में दर्ज हुआ था। उस वीडियो को देख सुप्रीम कोर्ट भी दंग रह गया था और इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया था। लेकिन इस हत्या के दोषी को कोई सजा मिलते देश ने नहीं देखा। बल्कि अनिल मसीह चुनाव आयोग से निकल कर अब भाजपा के ही पार्षद बन चुके हैं। 

जब ऐसी धांधली के सबूत सामने हैं, और धोखेबाजों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब क्या भरोसा कि हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में वैसी ही गड़बड़ी नहीं की जाएगी। तेजस्वी यादव ने साफ पूछा है कि जब लोकतंत्र में जनता को वोट ही नहीं देने दिया जाएगा तो फिर हम चुनाव लड़कर क्या करेंगे?

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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