शायद ही कोई इससे इंकार कर पाए कि दुनिया में दो चरम व्यक्तिवादी, आत्मुग्ध और अहंकारी नेता- डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी हैं।
दोनों के बीच कॉमन बाते हैं-
1- दोनों विश्व गुरु होने का दावा करते हैं। नरेंद्र मोदी स्वयं को जैविक इंसान नहीं, ईश्वर का अवतार तक घोषित कर चुके हैं। ट्रंप पोप के रूप में अपनी भव्य धार्मिक (पोप) पुरोहित की एआई से बनाई तस्वीर जारी कर चुके हैं। दोनों खुद को सिर्फ सुपरमैन नहीं, उससे भी ऊपर ईश्वरीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
2- दोनों दावा करते हैं कि दुनिया की सारी समस्याओं का समाधान उनके पास है। ट्रंप के रूस-उक्रेन युद्ध एक दिन में खत्म कराने के दावे से पहले मोदी और उनके भक्तों ने यह दावा किया था कि ‘पापा जल्द ही रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध खत्म करा देंगे’। नरेंद्र मोदी ने इसके लिए हड़बड़ी में यूक्रेन की यात्रा भी की थी, उसके बाद भाग कर रूस गए।
3- ट्रंप अमेरिका को फिर से महान बनाने के वादे के साथ राष्ट्रपति का चुनाव लड़े थे और राष्ट्रपति बने। नरेंद्र मोदी भारत को महान ही नहीं, विश्व गुरु बनाने के वादे के साथ चुनाव लड़े थे, और प्रधानमंत्री बने।
4- ट्रंप और मोदी दोनों अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों और प्रधान मंत्रियों को कोसते रहते हैं। ट्रंप अमेरिका की सारी समस्याओं के लिए डेमोक्रेट राष्ट्रपतियों क्लिंटन, ओबामा और बाइडेन को जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्हें बात- बात कोसते रहते हैं, उन्हें गरियाते रहते हैं। नरेंद्र मोदी हर समस्या के लिए नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मनमोहन सिंह और कांग्रेस को कोसते रहते हैं। इन प्रधानमंत्रियों को गरियाते रहते हैं।
5- दोनों ने अपने देश की जनता के सामने खुद को गरीबों और कमजोरों के सबसे बड़े हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया। उसके पहले की सरकारों और राष्ट्रपतियों-प्रधानमंत्रियों को अभिजनों-कुलीनों और बड़े-धनिक लोगों का हितैषी ठहराया।
6- दोनों गरीबों-कमजोरों के हितैषी के नाम पर वोट लिए और काम मुट्ठी भर कार्पोरेट बिलियनरी लोगों का करते हैं। वही उनके सबसे बड़े साथी और हितैषी हैं।
7- दोनों बड़बोले हैं। झूठ बोलने में दोनों माहिर हैं। ट्रंप और नरेंद्र मोदी ने कितनी बार साफ-साफ तथ्यात्मक झूठ बोला है, इसके आंकड़े आ चुके हैं और आते ही रहते हैं। दोनों झूठ बोलने में माहिर हैं। बड़बोलापन करने और झूठ बोलने में दोनों को थोड़ी भी हिचक नहीं होती है।
8- दोनों को सिर्फ जी हजूरी पसंद है। दोनों किसी ऐसे व्यक्ति, संस्था और संगठन को पसंद नहीं करते हैं, जो उनसे कोई भिन्न राय प्रकट करे, उनसे असहमति दर्ज कराए या उनकी किसी बात का प्रतिवाद और प्रतिरोध करे।
दोनों ने अपने इर्द-गिर्द चापलूसों की फौज खड़ी कर रखी है।
9- दोनों अपने देश की संवैधानिक संस्थाओं को खत्म करने के लिए सब कुछ कर रहे हैं। उन्हें स्वायत्त और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं बिलकुल पसंद नहीं हैं। वे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और सैन्य सबको अपनी जेबी संस्था बनाने पर तुले हुए हैं, काफी हद तक बना भी चुके हैं।
10-दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक संस्थाओं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों में रत्ती भर विश्वास नहीं करते हैं। लोकतंत्र उनके लिए अपरिहार्य बाध्यता है और जरूरत हैं। दोनों यह सोचते हैं कि उनके देशों और सारी दुनिया की समस्याओं का समाधान अकेले उनके पास है। इसके लिए किसी किसी से विमर्श या सलाह-मशविरे की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों सिर्फ को सुपरमैन ही नहीं, ईश्वरी भी समझते हैं। कमोबेश पैगंबर।
ट्रंप बाइडेन से अपनी हार के बाद चुनावी नतीजे को पलटने के लिए अपने समर्थकों को ललकार कर विधायिका में घुसा दिए थे। मोदी अपनी हारों को जीत में बदलने के लिए कई राज्य सरकारें गिरा चुके हैं। चुनाव का भी खूब इस्तेमाल करते हैं।
11- दोनों चरम आत्म मुग्ध हैं। दोनों सोचते हैं कि दोनों के देशों के इतिहास में आज तक उनके जैसा कोई नहीं पैदा हुआ है। दोनों चाहते हैं कि दोनों को इतिहास निर्माता के रूप में आने वाली पीढ़ियां याद करें। उन्हें इस रूप में याद करें कि उनके जैसा कोई इतिहास में पैदा नहीं हुआ था। दोनों खुद को अजर-अमर के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं।
अमेरिका जैसे वैश्विक ताकत का नेता होने के चलते ट्रंप विश्व इतिहास के निर्माता बनना चाहते हैं, उसी तरह के हरकतें करते हैं, नोबेल के लिए लालायित हैं। नरेंद्र मोदी भी यह चाहते हैं कि उन्हें विश्व इतिहास के नेता या विश्व गुरु के रूप में याद रखा जाए, लेकिन यदि यह न हो पाए तो कम से कम भारत के सबसे महानतम नायक या नेता की पदवी तो उन्हें मिल ही जाए। इसी कुंठा के चलते वे बार-बार नेहरू को गरियाते हैं, क्योंकि नेहरू आधुनिक भारत के ऐसे नेता के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिनकी विश्व इतिहास में एक जगह थी। भारत में राष्ट्र की नींव रखने वाले महान नेता के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
ट्रंप और नरेंद्र मोदी की इन समान विशेषाताओं ने दोनों को एक दूसरे की ओर तेजी से खींचा। दोनों अवसर-बेअवसर गलबहियां करते रहे। दोनों एक दूसरे की चापलूसी की हद तक व्यक्तिगत तारीफ भी करते रहे। स्वाभाविक है कि नरेंद्र मोदी को यह चापलूसी ज्यादा करनी पड़ी, क्योंकि ट्रंप कई गुना ज्यादा शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति हैं। अमेरिका पहले ही विश्व शक्ति है, नरेंद्र मोदी तो अभी भारत को सुपर पॉवर बनाने का सब्जबाग ही दिखा रहे हैं।
दोनों की मित्रता इस कदर बढ़ी कि दोनों यह भी भूल गए कि वे किसी देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं। अपने- अपने देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले, संवैधानिक प्रमुख हैं। यह सब किनारे लगाकर दोनों एक दूसरे को चुनाव जिताने के चुनाव प्रचार में लग गए। उनके भक्त भी एक दूसरे का चुनाव प्रचार करने में लग गए। यह सब कहानी दुनिया के सामने बार-बार आ चुकी है।
अब स्थिति उलटती लग रही है। डोनाल्ड ट्रंप हर तरीके से नरेंद्र मोदी को उनकी औकात बताना चाह रहे हैं, उन्हें यह बताना चाह रहे हैं कि तुम्हारी हमारे सामने कोई औकात नहीं है। नरेंद्र मोदी भी खुलकर डोनाल्ड ट्रंप की चापलूसी नहीं कर पा रहे हैं, इसमें उनका अहंकार आड़े आ रहा है।
दोनों के अहंकारों की टकराहट निम्न घटनाओं के बाद शुरू हुई-
पहली बार डोनाल्ड ट्रंप ने तब मोदी के अहंकार को चोट पहुंचाई, जब उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद अपना पदभार ग्रहण करते समय चीन के राष्ट्रपति को तो बुलावा भेजा, लेकिन नरेंद्र मोदी को आमंत्रित नहीं किया। विश्व गुरु नरेंद्र मोदी को तगड़ा झटका लगा। उनसे यह सवाल पूछा जाने लगा कि आप जैसे महानतम नेता को आपके चरम मित्र ने क्यों नहीं बुलाया? जब उन्होंने अपने सबसे घोषित शत्रु देश (चीन) के राष्ट्रपति को आमंत्रित किया। आखिर उन्होंने आप जैसे महानतम नेता और अपने मित्र के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया? नरेंद्र मोदी और उनके चापलूसों- भक्तों के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
दूसरी बार नरेंद्र मोदी और उनके चापलूसों-भक्तों को तब करारा झटका लगा, जब ट्रंप ने यह दावा किया कि भारत- पाकिस्तान के बीच युद्ध उनके फोन कॉल से रुका। उन्होंने दोनों देशों को डांटा-समझाया। व्यापार का प्रलोभन दिया और युद्ध रुकवाया। यह सही था या गलत यह दीगर बात है, लेकिन नरेंद्र मोदी खुलकर यह श्रेय ट्रंप को देने को तैयार नहीं हुए। इसमें उनका अहंकार आड़े आया। उन्हें लगा कि यदि यह बात मैं स्वीकार कर लेता हूं तो मैं ईश्वरी अवतार, चरम शक्तिशाली और विश्व गुरु हूं, मेरी यह छवि धूमिल हो जाएगी। भारत महानतम देश बन चुका है, वह अपने हिसाब से काम करता है, उसे कोई निर्देश नहीं दे सकता, उसके मामले में कोई मध्यस्थता या हस्तक्षेप नहीं करता है और न कर सकता है, उनका यह दावा झूठा साबित हो जाएगा।
भारत सरकार के प्रवक्ता और विदेश मंत्री यह बार-बार कहते रहे कि किसी ने कोई मध्यस्थता नहीं की है, किसी को फोन काल या कहने पर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध नहीं रुका है। संसद में तो यहां तक कह दिया कि कोई फोन- सोन नहीं आया था, न किसी दूसरे की सुनी गई। नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के बार-बार पूछने और कहने पर यह हिम्मत तो नहीं जुटाई कि कह सकें कि ट्रंप झूठ बोल रहे, लेकिन उन्होंने ट्रंप की मध्यस्थता और फोन की बात को अप्रत्यक्ष तौर ही सही खारिज कर दिया।
इसके विपरीत ट्रंप अब तक करीब 30 बार यह कह चुके हैं कि उन्होंने ही भारत-पाकिस्तान की बीच युद्ध रुकवाया। दो न्यूक्लियर पॉवर को युद्ध को आगे बढ़ाने से रोका। विश्व में शांति कायम की। इसके लिए उन्हें नोबल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए। पाकिस्तान खुलकर ट्रंप को श्रेय दे रहा है। पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख ने आसिफ मुनीर ने तो ट्रंप के लिए नोबल शांति पुरस्कार की मांग भी की। यह चापलूसी करने में नरेंद्र मोदी चूक गए। अपने चापलूस पसंद मित्र खुलकर चापलूसी नहीं कर पाए। हां बाजी आसिफ मुनीर मार ले गए।
इसके पहले ट्रंप ने आसिफ मुनीर के साथ लंच करके नरेंद्र मोदी को उनकी औकात बताई थी। किसी सैन्य प्रमुख के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति का लंच, अमेरिका इतिहास की पहली घटना थी। ट्रंप ने मोदी या भारत की इस बात जरा भी तवज्जो नहीं दिया कि भारत पाकिस्तान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अमेरिका को भारत को ज्यादा महत्व देना चाहिए। ट्रंप एक हद तक इसका उलटा किया, नरेंद्र मोदी की तुलना में आसिफ मुनीर और पाकिस्तान को ज्यादा महत्व दिया।
इसके बाद ट्रंप ने नरेंद्र मोदी को उनकी असली औकता बताने की ठान ली। उन्होंने भारत के खिलाफ 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। इसके साथ रूस से तेल और हथियार खरीदने पर और अधिक टैरिफ लगाने की चेतावनी दे दी। ब्रिक्स के सदस्य के रूप में अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी वे पहले ही दे चुके हैं।
ट्रंप यहीं नहीं रूके उन्होंने पाकिस्तान के साथ व्यापार समझौते की घोषणा कर दी। पाकिस्तान के खिलाफ 19 प्रतिशत टैरिफ लगाया। उन्होंने ब्रिटेन पर सिर्फ 10 प्रतिशत और यूरोपीय यूनियन पर 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया। इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने और उनकी टीम ने जल्द ही चीन के साथ व्यापार समझौता हो जाएगा, इसकी घोषणा भी कर दी। इसके साथ ही यह कह दिया कि वह चीन से युद्ध नहीं, एशिया पैसफिक में सिर्फ स्थायित्व चाहता है। भारत के साथ व्यापार समझौता खटाई में पड़ गई।
ट्रंप ने मोदी और भारत को नीचा दिखाने के लिए एक और घोषणा कर दिया, उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर तेल और गैस का भंडार मिला है। अमेरिका इसको एक्सप्लोर करेगा। उन्होंने कहा कि जल्द ही पाकिस्तान भारत को तेल निर्यात करेगा। यह होगा या नहीं, ऐसी स्थिति है नहीं, इस पर सबको संदेह है, लेकिन ट्रंप ने जल्दीबाजी में यह घोषणा नरेंद्र मोदी और भारत को औकात बताने, मोदी को नीचा दिखाने के लिए किया है।
दो चरम आत्ममुग्ध और चरम अहंकारियों की मित्रता ज्यादा दिन हीं चलती है, सारे समान गुण होने के बाद भी। उनके बीच में उनका चरम अहंकार आकर एक न एक दिन खड़ा हो जाता है। जैसा ट्रंप और एलन मस्क के बीच हुआ। ट्रंप और एलन मस्क एक समय चरम मित्र थे, ट्रंप और एलन मस्क को जानने वाले कहते थे कि यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चलेगी। दोनों का अहंकार एक दिन टकराएगा। आखिर टकरा गया, दोनों एक दूसरे के जानी दुश्मन बन गए हैं।
फिलहाल ट्रंप और मोदी के बीच की मित्रता का दौर खत्म हो गया है, दोनों का चरम अहंकार टकरा रहा है। बड़े और शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति होने के चलते ट्रंप का पलड़ा भारी है। ट्रंप मोदी को रौंदने और उनकी औकात बताने में फिलहाल कामयाब होते दिख रहे हैं। मोदी को कुछ सूझ नहीं रहा है। यह दिन देखने की उन्होंने कल्पना नहीं की थी। मोदी भक्तों को भी बड़े पापा (ट्रंप) का व्यवहार पच नहीं पा रहा है।
इन दोनों के चरम अहंकार की टकराहट में पिसने जा रही है, देश की अर्थव्यवस्था, रोजी-रोटी, रोजगार और कारोबार। मोदी अपने कार्पोरेट मित्रों को तो बचा ले जाएंगे, लेकिन देश के आमजन और मध्यवर्ग को इसकी कीमत चुकानी ही पड़ रही है और पड़ेगी।
दो चरम अहंकारी और आत्ममुग्ध ज्यादा दिनों तक मित्र नहीं रह सकते हैं। उनके अहंकार टकराएंगे ही। ट्रंप और मोदी की दोस्ती और टकराहट ने साबित कर दिया। दुखद यह है कि दोनों सिर्फ दो व्यक्ति नहीं है, दो देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं। इस टकराहट की कीमत दोनों देशों के आम लोग चुकाएंगे। भारत और भारतीयों को कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ेगी।
( डॉ. सिद्धार्थ स्वतंत्र पत्रकार हैं)