गिरे से गिरा हुआ इंसान भी ऐसा करने की सोच नहीं सकता, परंतु ऐसी घटनाएँ हुई हैं। पहली घटना: यह घटना लखनऊ के एक अस्पताल की है। इस अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में, जहाँ गंभीर से गंभीर रोगी रखे जाते हैं, जो मृत्यु की कगार पर होते हैं, एक महिला भर्ती थी। अस्पताल के ही एक कर्मचारी ने उस महिला को एक इंजेक्शन दिया, जिसके बाद वह बेहोश हो गई। इसके बाद उस कर्मचारी ने उस महिला के साथ बलात्कार किया। क्या यह घृणित कृत्य नहीं, वह भी अस्पताल के कर्मचारी द्वारा और वह भी आईसीयू में भर्ती एक असहाय महिला के साथ?
हम जानते हैं कि आईसीयू में शांति रहती है, कोई बात भी नहीं कर सकता, और अस्पताल के कर्मचारी मरीजों पर सतत नजर रखते हैं। फिर भी, इतने गिरे हुए कृत्य की कल्पना करना असंभव है। पर यह हुआ है, और वह भी हमारे देश में-गीता और रामायण के देश में।
दूसरी घटना: एक प्रतियोगी परीक्षा चल रही थी, जिसमें कई लोग, जिनमें महिलाएँ और बच्चियाँ भी शामिल थीं, भाग लेने आए थे। ऐसी ही एक बच्ची परीक्षा देते समय बेहोश हो गई। उसे नहीं पता था कि उसके साथ क्या हो रहा है। परीक्षा आयोजकों ने तुरंत एक एम्बुलेंस बुलाई और उसे नजदीकी अस्पताल भेज दिया। बच्ची बेहोश थी, उसे तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत थी। लेकिन एम्बुलेंस के ड्राइवर ने उस बच्ची के साथ बलात्कार किया-वह भी तब, जब वह होश में नहीं थी। ड्राइवर ने एम्बुलेंस को एक कोने में खड़ा किया, यह घृणित कृत्य किया, और फिर भाग गया।
क्या कोई इस तरह की कल्पना कर सकता है-एक ऐसी बच्ची के साथ, जो होश में नहीं है और जिसे नहीं पता कि वह किस स्थिति में है? इतना नीच व्यवहार, जिसे व्यक्त करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाएँ। यह अपराध एक एम्बुलेंस ड्राइवर द्वारा किया गया, जिसके पास मरीजों को सुरक्षित अस्पताल पहुँचाने की जिम्मेदारी होती है। एम्बुलेंस वह वाहन है, जिसके लिए रास्ते में सारा ट्रैफिक रुक जाता है। फिर भी, इस तरह का जघन्य अपराध हुआ।
तीसरी घटना: यह भी उतनी ही भयावह है। एक पत्नी का अपने पति से मनमुटाव था। पति-पत्नी के बीच मतभेद आम हैं। सिनेमा में कहा जाता है, “तुम रूठी रहो, हम मनाते रहें।” पति-पत्नी के बीच झगड़े मामूली होते हैं, जैसे पत्नी कहे, “मैं हलवा बनाऊँगी,” और पति कहे, “नहीं, चिकन बनाओ।” लेकिन इस मामले में पत्नी अपने पति से छुटकारा पाना चाहती थी। उसने पति के खाने में नींद की गोलियाँ मिला दीं, ताकि वह मर जाए। लेकिन इतनी गोलियाँ खाने के बाद भी पति होश में आ गया। तब पत्नी ने अपने तथाकथित प्रेमी से संपर्क किया और उसकी सलाह पर पति की कलाई में बिजली का तार बाँधकर करंट चालू कर दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
क्या कोई इंसान, वह भी एक ऐसी पत्नी जो अपने पति के साथ वर्षों तक रही हो, इस तरह का अपराध कर सकती है? ऐसे अपराधों की सजा तो कानून में है, लेकिन क्या वह सजा पर्याप्त है? यह विचारणीय है कि हमारे देश में ऐसी प्रवृत्तियाँ क्यों बढ़ रही हैं? इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या मनोविज्ञान है? मन में ऐसी कौन सी गांठ बन जाती है, जिसके कारण लोग इस तरह के जघन्य अपराध करते हैं? यह पूरे देश को, संसद को, अधिकारियों को, और मनोवैज्ञानिकों को सोचने की जरूरत है।
(एल.एस. हरदेनिया सेकुलर फ्रंट के संयोजक हैं)