भारतीय लोकतंत्र एक खतरनाक मोड़ पर

भारत में लोकतंत्र आज कैसे काम कर रहा है इसे समझने के लिए पहलगाम हादसे से लेकर संसद में इस पर चली बहस तक के घटनाक्रम को देखना पर्याप्त होगा।

पहलगाम में आतंकी हमले में 26 मासूमों की जघन्य हत्या के बाद सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया, विपक्ष द्वारा संसद के विशेष सत्र की मांग ठुकरा दी गई।क्या यह लोकतंत्र और संसदीय परंपरा के अनुरूप था ? इतिहास में दर्ज है कि 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान विपक्ष की मांग पर सरकार ने विशेष सत्र बुलाया था, जबकि वह लड़ाई में हार रही थी।

पहलगाम मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरह तरह की चर्चाएं तैर रही थीं। ट्रंप ने अलग अलग फोरम पर 29 बार इस बात को दोहराया कि व्यापार की धमकी या लालच देकर उन्होंने भारत और पाकिस्तान युद्ध को रुकवाया। लेकिन भारत सरकार ने एक बार भी इसका खंडन नहीं किया, जबकि यह भारत की घोषित नीति रही है कि भारत पाक मामले में वह किसी तीसरी पार्टी के हस्तक्षेप के खिलाफ है। क्या ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे हैं? अगर हां तो प्रधानमंत्री संसद के बाहर अथवा अंदर अपने भाषण में अमेरिकी हस्तक्षेप की बात को साफ साफ नाम लेकर क्यों नहीं नकारते हैं?

भारत के जेट गिराए जाने की खबरें चलती रहीं लेकिन सरकार की ओर से इस पर भी संसद के अंदर या बाहर कोई स्पष्ट बात नहीं की गई। स्वयं उनकी पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी यह कह रहे हैं कि हमारे पांच जेट गिराए गए।

यह साफ है कि भारत में आज जो लोकतंत्र चल रहा है, इसमें सरकार की किसी विफलता के लिए किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं की जाती है। इतनी बड़ी घटना की जिम्मेदारी वह भी तीन महीने बाद उप राज्यपाल ने मानी, जबकि वह सीधे गृह मंत्रालय से संचालित है। बहरहाल किसी को जवाबदेह मानकर, न गृहमंत्री को, न उपराज्यपाल को, किसी को दंडित नहीं किया गया। किसी का इस्तीफा नहीं हुआ।

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सेना के तमाम अधिकारियों के बयान से स्पष्ट है कि सेना के हाथ बांध दिए गए और उसे लड़ने के लिए मैदान में उतार दिया गया जिसकी वजह से हमें नुकसान उठाने पड़े। यह भी रोचक है कि घटना के तीन महीने बाद अचानक वहां के उपराज्यपाल ने सारी सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी अपने ऊपर ओढ़ ली और एक विचित्र संयोग में संसद की बहस के दौरान ही पहलगाम हादसे से जुड़े तीन आतंकवादी मार दिए गए। इसका कोई कारण नहीं बताया गया कि उसी समय मोदी की कश्मीर यात्रा अचानक क्यों टाल दी गई और गृहमंत्री ने वहां जाकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया और अपनी पीठ थपथपाई। उसी के तुरंत बाद पहलगाम का हादसा हो गया।

संसद की विशेष बहस में एक भी पॉइंटेड सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया गया।

इसका कोई जवाब नहीं दिया गया कि जहां घाटी में हजारों सैलानी थे, वहां कोई सैन्य बल क्यों नहीं तैनात था ?जाहिर है सरकार का यह दावा भी ध्वस्त हो गया कि धारा 370 हटने के बाद से वहां आतंकवाद का सफाया हो गया है।

केंद्र सरकार ने अपने वायदे से मुकरते हुए उसका राज्य का दर्जा भी बहाल नहीं किया। जिस कश्मीर को कभी भारत के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की कसौटी माना गया था, वहां आज चप्पे चप्पे पर सैन्यबल के जवान हैं और जिसके दो टुकड़े करके राज्य के दर्जे को घटाकर केंद्र शासित इलाका बना  दिया गया है। जिस 370 के माध्यम से कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बना था उसे इस नाम पर हटा दिया गया कि यह अलगाववाद और आतंकवाद की जड़ है। लेकिन उस रणनीति की विफलता साबित करते हुए पहलगाम का लोमहर्षक हादसा घटित हुआ। अभी कुछ दिन पहले वहां के चुने हुए मुख्यमंत्री को दीवाल फांदकर शहीदों को श्रद्धांजलि देने जाना पड़ा।

2014 के बाद देश में लोकतंत्र पर जिस तरह कुठाराघात किया गया है, कश्मीर का राजनीतिक घटनाक्रम और संसद में उस पर बहस तक कि कहानी भी उसी का हिस्सा है।

कभी डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि भारत में लोकतंत्र मूलतः सामंती जमीन के ऊपर टापड्रेसिंग है। पिछले दस साल से जो अधिनायकवादी निजाम चल रहा है, वह उनके कथन की ही पुष्टि करता है। मजेदार यह है कि इंदिरा गांधी के आपातकाल से सीखते हुए न तो आधी रात में आपातकाल की घोषणा और न ही उस तरह सभी विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी की घोषणा हो रही है।संविधान और कानून, संस्थाएं सब अपनी जगह बदस्तूर कायम हैं। लेकिन उन्हीं का ( दुर) उपयोग करके सारी चीजों को अपने विपरीत में बदल दिया गया है। यहां फिर डॉ अम्बेडकर को याद करना प्रासंगिक होगा। वे कहते थे कि संविधान चाहे जितना अच्छा हो, बुरे लोगों के हाथ में वह विफल होने के लिए अभिशप्त है।आपातकाल भी संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके ही लागू किया गया था।

विभिन्न देशों में लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर निगाह रखने वाली संस्था V dem ने उदार लोकतंत्र सूचकांक में 179 देशों में भारत को 90वें स्थान पर रखा है जबकि हमारे पड़ोसी श्रीलंका 70वें और नेपाल 72वें स्थान पर हमसे ऊपर हैं। उनका मानना है कि भारत में मीडिया, सिविल सोसायटी और विपक्ष की विरोध की आवाज की जगह कम हुई है। इस सूचकांक की गणना वे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,मीडिया व सिविल सोसायटी की स्वतंत्रता,चुनावों की गुणवत्ता, मीडिया में अलग अलग विचारों की जगह, शिक्षा की स्वतंत्रता आदि के आधार पर करते हैं।2018 में V dem ने भारत को चुनावी निरंकुशता वाला देश करार दिया था।तब से और नीचे गिरकर भारत आज दुनियां के सबसे खराब निरंकुशतावादी देशों में करार दिया है।इसके अनुसार भारत जहां दुनियां की 18%आबादी रहती है वह दुनियां की निरंकुशता में जीने वाली आबादी का आधा है।

उदाहरण के लिए भारत में मीडिया का पतन एक प्रमुख अवयव है।मीडिया जिस तरह सरकार का पक्ष लेता है, उसी के नैरेटिव को बढ़ा चढ़ा कर पेश करता है, मानो सरकार के मीडिया और स्वतंत्र मीडिया का फर्क ही मिट गया हो,सरकार विरोधी, असहमत पत्रकारों की प्रताड़ना, सेंसरशिप और सेल्फ सेंसरशिप। उसके निदेशक कहते हैं कि पिछले पाँच से आठ सालों में स्थिति अधिक बिगड़ गई है। भारत अब लोकतंत्र न कहलाए जाने वाले देशों की श्रेणी में आने के बिल्कुल क़रीब है।

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में लोकतंत्र के विशेषज्ञ निरंजन साहू वी-डेम की रिपोर्ट पर कहते हैं, “डेटा पर आधारित वी-डेम की रिपोर्ट काफ़ी हद तक लोकतंत्र में निरंतर गिरावट, ख़ासकर भारत में उदारवाद के लगातार कम होने के संकेत की पुष्टि करती है। ये बोलने की आज़ादी, मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने और विरोधी आवाज़ों को दबाने के प्रति सरकार की असहनशीलता में नज़र आती है।” रिपोर्ट में लोकतंत्र के ख़ास स्तंभ यानी मीडिया, मानवाधिकार और न्यायतंत्र की स्वतंत्रता में गिरावट पर ज़ोर दिया गया है। मीडिया वालों और सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ राजद्रोह से लेकर मानहानि तक की बढ़ती मुक़दमेबाज़ी का भी इसमें ज़िक्र है।

साहू रिपोर्ट से सहमति जताते हुए कहते हैं, “एक ज़माना था, जब न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी भारत की स्वतंत्र संस्थाओं के सरकार और शक्तिशाली नेताओं के दबाव में ना आने के लिए विश्व भर में भारत की प्रशंसा हुआ करती थी। अब ऐसा नहीं है। इन संस्थानों को सरकारी सोच के अनुरूप लाने के लिए लगातार प्रयास जारी हैं। आज एक्टिविस्ट और विपक्षी नेताओं को महीनों तक बिना ज़मानत के हिरासत में रखा जाता है, न्यायपालिका अपना मुँह मोड़ लेती है। इस तरह जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण तंत्र ग़ायब हो गए हैं।”

उन्होंने बताया, “धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, जो ज़्यादातर सोशल मीडिया की ओर से संचालित होता है और जिसका सत्ताधारी दल राजनीतिक फ़ायदा उठाते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता के संदर्भ में इसके बड़े नकारात्मक प्रभाव होते हैं। इससे देश में राजनीतिक माहौल ज़हरीला हो रहा है। अल्पसंख्यकों और विरोधी दलों के नेताओं को कमज़ोर और खलनायक या राष्ट्रविरोधी के रूप में दिखाया जा रहा है।”

अमरीका स्थित चर्चित संस्था ‘फ़्रीडम हाउस’ ने भारत पर टिप्पणी करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की सरकार के तहत भाजपा ने देश की बहुलता और व्यक्तिगत अधिकारों के लिए सरकार की प्रतिबद्धता से ख़ुद को दूर कर लिया है, जिसके बिना लोकतंत्र लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता।”

साल 2017 में Civicus नाम की संस्था ने एक रिपोर्ट जारी की। इसे ‘भारत: सिविल सोसाइटी पर बढ़ते हमलों से लोकतंत्र को ख़तरा’ टाइटल से जारी किया गया था।

रिपोर्ट में कहा गया है- हालाँकि, भारत की आज़ादी के बाद से सिविल सोसाइटी आवश्यक भूमिका निभा रही है, लेकिन इसकी जगह तेज़ी से ख़त्म होती जा रही है। जबसे 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीता है, लोकतंत्र की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक विरोध में भाग लेने की जगह कम हुई है। आने वाले सालों में सिविल सोसाइटी के कार्यकर्ता और संस्थाएँ, जो सत्ताधारियों की आलोचना करते हैं, अधिकारियों की ओर से टारगेट किए जा सकते हैं।”

वी डेम की रिपोर्ट के मुताबिक़ जी-20 के सभी प्रमुख देश और दुनिया के सभी क्षेत्र अब “निरंकुशता की तीसरी लहर’ से गुज़र रहे हैं, जिसकी लपेट में भारत, ब्राज़ील, अमरीका और तुर्की जैसी अर्थव्यवस्थाएँ आ चुकी हैं।”

वी-डेम इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टाफ़न लिंडबर्ग कहते हैं, “भारत में जो हो रहा है, वो विश्व में जारी एक रुझान का हिस्सा है, जो चिंता का विषय है। भारत में बढ़ रही निरंकुशता दुनिया की निरंकुशता के रास्ते का अनुसरण कर रही है।”

वे आगे कहते हैं, “चिंता की बात ये है कि दुनिया के जिन लोकतांत्रिक देशों में ये रुझान शुरू होता है, उनमें से 80 प्रतिशत तानाशाही में परिवर्तित हो गए हैं।”

साहू कहते हैं, “पोलैंड, तुर्की, भारत, ब्राज़ील, हंगरी और यहाँ तक कि अमरीका जैसे देशों में अधिनायकवाद के साथ निरंकुशता के बढ़ते रुझान के बारे में कोई संदेह नहीं है।”

ये भी रुझान देखा गया है कि आजकल तख़्ता पलटने या सैन्य हुकूमत बनाने और आपातकाल लागू करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। तानाशाह संविधान, क़ानून और लोकतंत्र के सभी प्रावधानों का इस्तेमाल करके ही सत्ता पर आते हैं और देर तक टिके रहने के लिए क़ानून का दुरुपयोग करते हैं। स्टाफ़न लिंडबर्ग तुर्की की मिसाल देते हैं और कहते हैं कि “राष्ट्रपति अर्दोआन ने संसद का इस्तेमाल करके दो बार संविधान बदल दिया। “

भारत में भी RSS भाजपा संविधान बदलना चाहते हैंलेकिन जनता के प्रबल प्रतिरोध के कारण संसद में ज़रूरी संख्या न हो पाने के कारण वे ऐसा कर नहीं पा रहे हैं। बिहार में SIR के माध्यम से चुनावी धांधली की जो शुरुआत हो रही है, और इसे पूरे देश में जिस तरह लागू करने की तैयारी है, वह देश में बचे खुचे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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