उपराष्ट्रपति उम्मीदवार राधाकृष्णन भारत के उपराष्ट्रपति बनेंगे या बीजेपी-संघ के समीकरण को आगे बढ़ाएंगे ?

17 अगस्त को देश में तीन बड़ी राजनीतिक हलचल देखने को मिली। पहली हलचल बिहार में दिखी जहाँ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन के सभी सहयोगी सासाराम में एक मंच पर आये और लाखों की भीड़ ने वोट चोर गद्दी छोड़ के नारे लगाए। दो सप्ताह तक बिहार में यही नारा गूंजता रहेगा। राहुल गाँधी बिहार के मिजाज को भांपने निकले हैं। कहने को उनकी यात्रा वोट अधिकार को लेकर है और जनता को वोट चोरी से आगाह करने के लिए है लेकिन असली कहानी यही है कि इस बार के बिहार चुनाव में इंडिया गठबंधन किसी भी सूरत में सत्ता तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। 

बिहार राजनीतिक रूप से एक सजग राज्य है। भले ही बिहार में अभी भी गरीबी ज्यादा है। अशिक्षा भी है और बदहाली भी लेकिन राजनीतिक बतकही में बिहार बाकी राज्यों से बहुत आगे है। यही वजह है कि 1974 में जेपी आंदोलन की शुरुआत भी बिहार से ही हुई थी। जेपी ने नारा दिया था सम्पूर्ण क्रांति का। पटना से शुरू हुई यह क्रांति पूरे देश में फैली और फिर 1977 के चुनाव में कांग्रेस की भारी पराजय हुई। कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज भी हार गए। यह बात और है कि जेपी के सम्पूर्ण क्रांति का हश्र बाद में बुरा ही हुआ और जेपी के सपने भी बिखर गए लेकिन उस क्रांति ने यह दिखा दिया था कि जब जनता सड़कों पर उतर जाती है तो सब कुछ बदल जाता है। कोई भी सत्ता जनता के सैलाब के सामने टिक नहीं पाती है। 

अबकी बार राहुल गांधी की अगुवाई में जिस तरह से इंडिया गठबंधन के लोग एक मत से सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर उत्तर रहे हैं उससे प्रभावित होकर कई आलोचक भी कहने लगे हैं कि अगर जनता का यह सैलाब यूँ ही आगे बढ़ता गया तो देश में कोई बड़ा परिवर्तन निश्चित है। सासाराम के मंच से खड़गे, तेजस्वी, राहुल और दीपंकर भट्टाचार्य जब बोल रहे थे और जनता जिस तरह से नारे लगा रही थी उससे साफ़ लग रहा था कि बिहार चुनाव से पहले और बिहार चुनाव के बाद केंद्र की सरकार में भी बड़े बदलाव संभव हो सकते हैं। सासाराम की गूंज दिल्ली तक पहुँच रही थी और दिल्ली में बीजेपी भी कई बड़ी तैयारियां कर रही थी। कई बैठकें की गईं। कई फैसले भी लिए गए। 

17 अगस्त को ही चुनाव आयोग ने प्रेस वार्ता भी किया। अब यह संयोग था या एक प्रयोग कहना मुश्किल है लेकिन चुनाव आयोग ने प्रेस वार्ता के दौरान जो बातें रखीं उनका कोई बड़ा मतलब भी नहीं निकला। आयोग ने बहुत सी बातें की लेकिन कोई भी बात मुद्दे की नहीं थी और न ही हालिया समय में राहुल समेत विपक्ष की तरफ से वोट चोरी के जो आरोप लगाए गए हैं उस पर चुनाव आयोग की तरफ से कोई स्पष्टीकरण दिया गया। 

चुनाव आयोग पर लगे रहे दाग लोकतंत्र पर दाग के समान हैं। पत्रकारों की तरफ से इस बाबत सवाल भी किये गए लेकिन आयोग के मुखिया ने कोई जवाब नहीं दिया। वे राहुल गाँधी के भंडाफोड़ पर अड़े रहे और माफ़ी मांगने की जिद पकड़े रहे। चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल तो अनुराग ठाकुर ने भी लगाया था और कहा था कि रायबरेली में वोटों की चोरी की गई। यह कुछ वही सब था जो राहुल गाँधी कर्नाटक के महादेवपुरा सीट के बारे में कहते रहे हैं। लेकिन आयोग ने अनुराग ठाकुर से न तो हलफनामा देने की बात कही और न ही माफीनामे की बात कही है। ऐसे में अगर कोई भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है तो इसमें गलती कहाँ है ?

17 तारीख को ही बीजेपी की तरफ से उपराष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा की गई। घोषणा करते हुए यह भी कहा गया कि महाराष्ट्र के मौजूदा राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन ओबीसी समाज से आते हैं और वे संघ और बीजेपी के बड़े नेताओं में शामिल हैं। चर्चा में यह बात भी सामने आयी कि उपराष्ट्रपति उम्मीदवार राधाकृष्णन की छवि निर्विवाद है और वे दक्षिण की राजनीति में बीजेपी और संघ को आगे बढ़ाने में महती भूमिका निभाते रहे हैं। 

कई जानकार यह कह रहे हैं कि सासाराम की रैली को कमजोर करने के हिसाब से ही बीजेपी और केंद्र सरकार के कहने पर चुनाव आयोग की वार्ता और उपराष्ट्रपति उम्मीदवार का ऐलान किया गया था ताकि लोगों का ध्यान इधर आ जाए और चर्चा इन बातों की हो जाए। लेकिन बिहार के लोगों ने ऐसा नहीं किया। बिहारी समाज इस बार कोई बड़ा परिवर्तन करने को तैयार है। यह परिवर्तन कितना बड़ा होगा यह कहना अभी जल्दबाजी हो सकती है लेकिन बिहार में वोट चोरी का नारा अब आसमान तक गूंजने लगा है। 

अब एनडीए की तरफ से उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के ऐलान पर अगर गौर किया जाए तो कहा जा रहा है कि वे बचपन से ही संघ के आदमी हैं और बड़े ही काबिल और जनता प्रेमी हैं। वे कई राज्यों के राज्यपाल भी रह चुके हैं। उन्होंने कई बड़ी बड़ी यात्रा भी की है। कई आंदोलनों का भी उन्होंने नेतृत्व किया है और तमिलनाडु की राजनीति में उनकी अपनी एक ख़ास पहचान भी रही है। ऐसे में संघ और बीजेपी ने उन्हें उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर कई समीकरणों को साधने की कोशिश की है। 

पहली बात तो यही है कि चूंकि राधाकृष्णन अभी महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं इसलिए मराठी लोगों और वहां की राजनीतिक पार्टियों का सहयोग भी मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही चूंकि राधाकृष्णन पिछड़े समाज से आते हैं इसलिए बीजेपी को उम्मीद है कि देश का पिछड़ा समाज उनका सपोर्ट कर सकता है और खासकर बिहार चुनाव में इसका लाभ मिल सकता है। 

लेकिन बीजेपी और संघ की नजर राधाकृष्णन को लेकर बिहार की राजनीति को साधना नहीं है। बीजेपी की नजर तो तमिलनाडु की राजनीति पर लगी है जहाँ वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रही है। इसलिए बीजेपी को लग रहा है कि इस बार तमिलनाडु में राधाकृष्णन के जरिये कोई बड़ा लाभ उठाया जा सकता है और डीएमके की राजनीति को बड़ी चुनौती दी सा सकती है। 

बीजेपी की रणनीति साफ है। राष्ट्रपति पद आदिवासी समाज से, प्रधानमंत्री पिछड़े वर्ग से और अब उपराष्ट्रपति पद भी ओबीसी नेता को देकर पार्टी 2029 और उससे आगे के चुनावों का सामाजिक समीकरण साध रही है। बीजेपी ने  महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार घोषित कर एक रणनीतिक दांव चला है।  यह फैसला केवल एक नाम की घोषणा नहीं, बल्कि ओबीसी वोट बैंक और दक्षिण भारत की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की स्पष्ट कोशिश है। 

दक्षिण भारत की राजनीति में भाजपा की अब तक सीमित उपस्थिति रही है। ऐसे में तमिलनाडु के एक अनुभवी नेता को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी नहीं है, बल्कि वह समग्र भारत की प्रतिनिधि बनना चाहती है। कांग्रेस और विपक्षी दलों ने हाल के वर्षों में ओबीसी जनगणना और सामाजिक न्याय को लेकर मुखर भूमिका निभाई है। ऐसे में भाजपा ने राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर सीधा मुकाबला पेश कर दिया है। अब भाजपा विपक्ष से यह सवाल पूछेगी: “क्या वे ओबीसी सम्मान के नाम पर एनडीए के ओबीसी उम्मीदवार का समर्थन करेंगे?”

विपक्षी इंडिया गठबंधन अभी अपने उम्मीदवार की घोषणा से दूर है, लेकिन जानकारों का मानना है कि वे भी किसी ओबीसी या अल्पसंख्यक चेहरे को मैदान में उतार सकते हैं, जिससे मुकाबला आंकड़ों से आगे बढ़कर सामाजिक संतुलन की लड़ाई बन जाए।

 राधाकृष्णन लंबे समय से भाजपा और आरएसएस के वैचारिक एजेंडे पर काम करते आए हैं। चाहे बात समान नागरिक संहिता की हो या शिक्षा-संस्कृति आधारित सुधार की, उन्होंने हर जगह संगठन के विचारों को मजबूती दी है।  वाजपेयी-आडवाणी के दौर से लेकर आज मोदी-शाह के युग तक, उनकी निष्ठा और निरंतरता अटूट रही है। जाहिर है वे आगे भी वही करेंगे जो संघ और बीजेपी के लिए लाभकारी हो। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है कि भारत को ऐसा उपराष्ट्रपति चाहिए जो सभी को समान नजर से देखे और वह देश का राष्ट्रपति हो न कि बीजेपी और संघ का।

पूर्व राष्ट्रपति धनखड़ ने यह साबित कर दिया है कि वे भले ही किसान परिवार से आते थे लेकिन वे जो करते दिख रहे थे वह सब बीजेपी और संघ के लिए ही। उन्होंने वह सब कर दिखाया जो उस गरिमामयी पद के खिलाफ था। ऐसे में अगर राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति बन भी जाते हैं तो उन्हें देश और सभी को समान नजरिये से देखना होगा और ऐसा होता है तभी उस पद की गरिमा बानी रहेगी और भारत का लोकतंत्र भी मजबूत होगा। 

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply