मोदी झुके या भागवत या फिर मैच टल गया? 

बहुत सारे लोगों को 11 सितंबर और 17 सितंबर का इंतजार था। उसकी एक खास वजह है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का जन्म दिन है 11 सितंबर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्म दिन है 17 सितंबर। दोनों ही 1950 में पैदा हुए। इस तरह दोनों ही सितंबर में अपने-अपने जन्म दिन पर 75 वर्ष के हो रहे हैं। आपको मालूम है जब 2014 में नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद देश के प्रधानमंत्री बने तो पार्टी में इनसे कई वरिष्ठ और सम्मानित नेता थे।

सवाल पैदा हुआ कि नरेंद्र मोदी तो प्रधानमंत्री बन गये अब उन वरिष्ठ नेताओं का क्या होगा ? वे सरकार में शामिल हो नहीं सकते तो फिर क्या वे पार्टी का काम देखेंगे ? और अगर पार्टी का काम देखेंगे तो सत्ता के दो केंद्र नहीं बन जाएंगे ? तब नरेंद्र मोदी ने ही रास्ता निकाला। उन्होंने एक फॉर्मूला बनाया कि जो नेता 75 साल के हो गये हैं वो पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में रहेंगे। उनका काम पार्टी को सलाह देना होगा। कहने को तो ये था कि पार्टी को उनके अनुभवों का लाभ मिलेगा। लेकिन असल मंशा उनसे पिंड छुड़ाने की थी। उन्हें मार्ग दर्शक मंडल के बहाने बर्फ में लगाने की थी। और अंतत: लगा भी दिया।

लेकिन जब मोदी जी ने यह नियम बनाया तो शायद यह नहीं सोचा होगा कि यह टोपी कभी उन्हें भी पहनने का वक्त आ सकता है। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। मोदी जी दो बार तो लोक सभा का चुनाव अपने बूते जीते तीसरी बार सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं आया तो भी सहयोगी दलों ( एनडीए ) के सहयोग से प्रधानमंत्री बन गये। तीसरी बार शपथ ग्रहण के बाद एक साल बाद ही उनकी उम्र भी 75 की हो गई। जब लोगों के ध्यान में यह बात आई तब वे सवाल उठाने लगे कि अब नरेंद्र मोदी क्या करेंगे?

क्या वे अपने ही बनाये नियम के तहत मार्गदर्शक मंडल में जाएंगे ? या उस नियम को नहीं मानेंगे? ऐसे भला गद्दी कौन छोड़ता है। तो मोदी जी के भी गद्दी छोड़ने की कोई संभावना नहीं है। इनके भक्तों की ओर से ये कहा जाने लगा कि भारतीय जनता पार्टी के संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है कि व्यक्ति 75 साल पूरा करते ही सत्ता या पद छोड़ देगा। मतलब साफ कर दिया गया कि मोदी जी प्रधानमंत्री का पद नहीं छोड़ने जा रहे। फिर भी कुछ लोग आस लगाये बैठे थे।

2014 में मोदी जी के पीएम बनने के बाद से उनका कद लगातार बढ़ता रहा। उनका कद इतना बढ़ गया कि सरकार तो सरकार पार्टी में भी इनके सामने बोलने की किसी की हिम्मत नहीं रही। इस ताकत ने मोदी जी और उनके सहयोगी अमित शाह को मनमानी करने को प्रेरित कर दिया। अब वो सरकार में या पार्टी में जैसे चाहते, जो चाहते वही होता। चर्चा यहां तक होने लगी कि वे राष्ट्रीय स्वयं संघ तक की नहीं सुनते। पीएम बनने के दस साल तक वे कभी संघ मुख्यालय नहीं गये। इससे संघ और मोदी के बीच कुछ मनमुटाव की खबरें भी आने लगीं। लेकिन मोदी जी पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

2024 के चुनाव में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने एनडीए की चार सौ सीटें आने का दावा किया। इसमें बीजेपी की खुद की 330 से ज्यादा सीटें होतीं। चुनाव जब चल ही रहे थे तभी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक अखबार को दिये इंटरव्यू में कहा कि अब बीजेपी को संघ की कोई जरूरत नहीं है। बीजेपी इतनी बड़ी और सक्षम हो गई है कि वो अपना खयाल खुद रख सकती है। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी 240 पर ही अटक गई। संघ को पलटवार करने का मौका मिला। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इशारों-इशारों में बहुत बातें कहीं। अभी दो-तीन महीने पहले एक किस्सा सुनाकर उन्होंने मोदी जी का नाम लिये बिना उन्हें संदेश दिया कि 75 के हो रहे हैं। अब दूसरों के लिए रास्ता साफ करें। इस तरह जो बात रुक गई थी, एक बार फिर से शुरू हो गई। लोगों ने यहां तक कहा कि अब तो मोदी जी को जाना ही होगा क्योंकि संघ भी उनकी विदाई के पक्ष में है।

लेकिन अब जब 17 सितंबर बिलकुल पास आने वाली है तो संघ प्रमुख अपनी बात से मुकर गये। संघ के शताब्दी समारोह से जुड़े तीन दिन के कार्यक्रम के तीसरे दिन गुरुवार को उन्होंने कहा कि मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे या किसी और को 75 साल की उम्र पूरी करने पर रिटायर हो जाना चाहिए। जब कि कुछ समय पहले उन्होंने कहा था कि जब आपको 75 साल का शाल ओढ़ा दिया जाए तो इसका मतलब होता है कि आपको नए लोगों के लिए जगह खाली कर देना चाहिए।

भागवत जी की यह बात लोगों को कुछ वैसी ही लगी जैसे गलवान में चीनी सैनिकों से संघर्ष और चीनी सैनिकों के हमारी जमीन पर कब्जे की चर्चा के बीच मोदी जी ने कह दिया था कि “ न हमारी सीमा में कोई घुसा और न हमारी कोई पोस्ट किसी के कब्जे में है। “ यह दोनों के ही द्वारा दिया गया ऐसा वक्तव्य था जो लोगों के गले नहीं उतरा। तब पूछा जा रहा था कि सब कुछ जानते हुए आखिर मोदी जी ने ऐसा बयान क्यों दिया ? अब वही सवाल मोहन भागवत से पूछा जा रहा है कि आखिर किस मजबूरी के तहत उन्होंने ऐसा बयान दिया ?

इस पर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। एक चर्चा ये है कि भागवत जी मोदी जी को हटाना चाहते थे लेकिन मोदी ने उनकी एक न सुनी और अब मोहन भागवत इतने सक्षम नहीं हैं कि मोदी जी को हटा सकें। नतीजतन ये बयान देकर दुखी मन से दिल्ली से नागपुर लौट गये हैं। दूसरी चर्चा यह है कि विदेश मोर्चे पर, विपक्ष के मोर्चे पर, पार्टी में बढ़ रहे असंतोष और देश में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई की समस्याओं से घिरे नरेंद्र मोदी ने भागवत के सामने सरेंडर कर दिया। कहा कि आप जो चाहते हैं करें। लेकिन किसी को ये न लगे कि मोदी जी को 75 वर्ष पूरे करने के कारण हटाया जा रहा है, संघ ने उन्हें कुछ दिन का समय दे दिया है।

लेकिन थोड़े समय बाद उन्हें हटना ही होगा। इस बीच संघ अपनी पसंद का बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाएगा। एक तीसरी चर्चा ये भी है कि मोदी जी भागवत के कार्यक्रम में नहीं आये। इनकी उपेक्षा करके जापान चले गये। भागवत जी को भी लगता है कि जोर आजमाइश करने से केंद्र की सत्ता भी जा सकती है। संघ यह तो चाहता है कि मोदी जी की जगह उनका कोई आदमी प्रधानमंत्री बने लेकिन यह नहीं चाहता कि इस झगड़े में सरकार गिर जाए और इंडिया गठबंधन को सरकार बनाने का मौका मिल जाए। इसलिए इस फैसले को कुछ दिन के लिए टाल दिया गया है। तो अभी कोई समझौता नहीं हुआ है। फाइनल मैच फिलहाल कुछ दिन बाद खेला जाएगा। शायद दो अक्टूबर के बाद जब संघ दशहरा पर अपनी सौवीं वर्षगांठ मना लेगा।

(अमरेंद्र कुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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