बिहार का चुनावी परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन बिहार के घरों में राहुल और तेजस्वी या फिर महागठबंधन के नेताओं की वोट चोरी की आवाज अब गूंजने लगी है। पिछले 17 अगस्त से चली वोटर अधिकार यात्रा का समापन भले ही एक सितम्बर को हो गया लेकिन इस यात्रा ने कई छाप भी छोड़ दिए। ये ऐसे छाप हैं जो मिट नहीं सकते। जब लोगों की जुबान पर वोट चोरी के नारे तैरने लगे और बच्चे-बूढ़े ”वोट चोर, गद्दी छोड़” जैसे नारों पर बहस करने लगें तो समझा जा सकता है कि बिहार का मिजाज अब पहले जैसा नहीं रहा। लोगों के मन में एक आशंका तो बैठ ही गई है। ये आशंका राहुल गाँधी की आवाज से नहीं है।
आशंका तो उस चुनाव आयोग की चुप्पी से बढ़ी है जो अभी तक राहुल के सवालों का जवाब नहीं दे सका है और न ही यह कह पा रहा है कि राहुल के वोट चोरी वाले आरोप गलत हैं। बयान देने से कुछ तो होता नहीं। सच तो यही है कि राहुल गाँधी ने जो भी बातें देश के सामने रखने का प्रयास किया है वह सब कागजी है और बड़ी बात तो यह है कि जो आंकड़े राहुल ने पेश किये हैं वे भी चुनाव आयोग के ही हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की चुप्पी बहुत कुछ बता रही है। और आयोग की इस चुप्पी का असर कहिये या फिर बदनामी बीजेपी से लेकर बीजेपी के कर्ता -धर्ता पीएम मोदी और शाह की हो रही है।
लोग अब शक की निगाह से बीजेपी नेताओं को देख रहे हैं। सच तो यह है कि राहुल और तेजस्वी के प्रति भले ही बिहारी समाज में अभी भी कोई बड़ा फैसला नहीं बना हो लेकिन बीजेपी और उनके नेताओं के खिलाफ लोगों का जमीर जाग गया है। इस जागे जमीर का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा यह अभी नहीं बताया जा सकता। लेकिन इस बार अगर बिहारी समाज और खासकर युवाओं का मन बदल गया तो बड़ा खेला हो सकता है। कुछ ऐसा खेला जो मोदी और शाह के लिए काफी मुश्किलों भरा हो सकता है। केंद्र की सरकार भी इस जद में आ सकती है।
बीते एक सितम्बर को जब पटना में गाँधी मैदान से डाक बांग्ला चौराहा और फिर पटना की नामचीन सड़कों से गुजरते हुए रोड शो संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति तक पहुंची तो लोगों का हुजूम चाहे जितना बड़ा ही क्यों न हो, एक बात तो समझ में आ ही रही थी कि बिहार में राहुल ने कोई चमत्कार कर दिया है। यह चमत्कार कई मसलों को लेकर कहा जा सकता है। पहली दफा राहुल को बिहारी समाज ने नजदीक से करीब एक पखवारा तक देखा और समझा भी।
बिहारी युवा और यहाँ के लोग जो पहले राहुल गाँधी को कई नामों से जानते थे और ठिठोली भी करने से बाज नहीं आते थे, उनका इरादा बदल चुका था। युवा लड़के और लड़कियों की बड़ी तादाद पार्टी से भी जुड़ी और कइयों को राहुल गाँधी ने दिल्ली में आने का निमंत्रण भी दिया। निमंत्रण पाने वालों में बिहार के उन 52 युवाओं का समूह भी शामिल है जो कई सालों से समाज बदलने के नाम पर हिंसा और तिरस्कार का शिकार होता रहा है। सीमांचल इलाके के कई युवा और युवती सीधे राहुल के संपर्क में आ गए जो न सिर्फ पार्टी के लिए काम करने के इच्छुक हैं बल्कि बिहार के चुनाव को प्रभावित करने में बड़ा योगदान भी कर सकते हैं।
पटना का गाँधी मैदान अब खाली हो गया है। तम्बू, शामियाना और टेंट हटाए जा रहे हैं और इस काम में जुटे मजदूर जो कह रहे हैं वे भी कमतर नहीं है। कुछ लोग यह कह रहे हैं कि बिहार में चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन राहुल गाँधी जो कह रहे हैं वह सही है। यह कैसे हो सकता है कि कोई एक आदमी और एक पार्टी ही बार-बार चुनाव जीते और सरकार बना ले। अगर ऐसा है तो इस प्रदेश की सभी जनता ऐसे नेताओं और पार्टियों को ही वोट क्यों नहीं डालती।
आखिर विरोध क्यों होता है ? राजू मंडल कहते हैं कि ”देखिये हम लोग कम पढ़े हैं लेकिन बिहार को बर्बाद करने वाला नेता दसे ज्यादा वे पढ़े लिखे लोग हैं जो जातीय लोभ ,पैसे के लोभ ,पांच सेर चावल के लोभ ,हिन्दू -मुसलमान के खेल और सरकार द्वारा दी जा रही नकदी पर लट्टू हैं। भले ही इनके बच्चे आज भी बेरोजगार हैं लेकिन इन्हें जो सुविधा मिल रही है वही इनके लिए काफी है। ऐसे में राहुल की आवाज पहली बार जिस तरह से बिहार में गूंज रही है, अगर इसका थोड़ा भी असर पड़ेगा तो बड़ा खेला हो जाएगा।”
पटना के एसपी वर्मा रोड पर रिक्शा चलते हुए जीवछ मांझी से मुलाकात हुई। कई बातें भी हुईं। पता चला कि 80 के दशक के मैट्रिक पास हैं। माझी लोगों की बातों को समझते भी हैं और अपनी राय रखने से नहीं चूकते। उन्होंने कहा कि ”देखिये भाई साहब ये बिहार है। यहाँ ठगों का गिरोह काम करता है। नेता लोग तो वैसे भी बेईमान होते हैं लेकिन पहली बार एक ईमानदार आवाज सुनने को मिला। हम राहुल गाँधी को नजदीक से पहली बार देख सके हैं।
बिहार में कांग्रेस भले ही कमजोर है लेकिन अब यह पार्टी दौड़ने लगी है। अभी तक हम वाम दलों को ही वोट डालते रहे हैं लेकिन अब कह सकते हैं कि चाहे बिहार चुनाव में महागठबंधन की जीत हो या नहीं हो बीजेपी और जदयू वाले खेल तो कर ही रहे हैं। जिस तरह से हर जगह बीजेपी जीत रही है उससे यह संदेह ख़त्म हो गया कि लोग इसे वोट डालते हैं। राहुल जो कह रहे हैं वह सौ फीसदी सही है। अगर गलत है तो चुनाव आयोग उस पर केस क्यों नहीं करता? फिर चुनाव आयोग चुप है और बीजेपी वाले आवाज उठा रहे हैं। ”
पटना के बेली रोड पर चाय -नाश्ता की दुकान चला रही एक महिला ने जो कहा वह बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है। एक अनपढ़ महिला की इस राजनीतिक सोच से कोई भी भ्रमित हो सकता है। उस महिला ने यह कहा कि जब चोरी से चुनाव जीतना है तो कोई जनता के लिए क्यों कुछ करेगा। जनता को तो भिखमंगा बना दिया गया है। बात-बात पर कुछ पैसे सरकार देती है। हम भी लेते हैं लेकिन आप ही बताइये जो पैसा लेगा वह जुबान से कुछ बोल सकता है क्या? जो पैसे सरकार देती है उसी पैसे से कोई बड़ा कारखाना क्यों नहीं लग जाता जिसमें बहुत से लोग काम करते।”
आप भी इन बातों को जानकार आश्चर्य में पड़ सकते हैं। क्या किसी भी प्रदेश की एक अनपढ़ महिला जो मजदूरी कर रही है, उसकी जुबान से इस तरह की बात निकल रही है। लेकिन सच तो यही है। बिहार भले ही गरीब, अशिक्षित ,बेरोजगार ,पलायन वाला और आर्थिक रूप से कमजोर राज्य है लेकिन राजनीतिक रूप से यहाँ के लोग काफी समृद्ध कहे जाते हैं। ऐसे में राहुल की वोटर अधिकार यात्रा का फलाफल चाहे जो भी हो लेकिन इस यात्रा ने बिहार के जनमानस को जगा तो दिया है।
लोग अब इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि महागठबंधन अब पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है क्योंकि इस महागठबंधन के दलों के बीच केवल दिमागी तालमेल तक ही था। अब दिल का भी मिलन हो गया है। इस महागठबंधन में राजद बड़ी पार्टी है जाहिर है वह ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उधर कमजोर हो चुकी कांग्रेस अब जीवित हो चुकी है और अब अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस पहले से ज्यादा सीटें जीतने में सक्षम होगी और माले को भी बड़ा लाभ मिलेगा।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पटना के डाकबंगला चौराहे पर बीजेपी को चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा, “महादेवपुरा के एटम बम के बाद अब हाइड्रोजन बम आने वाला है। बीजेपी के नेताओं को यह बम मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा ” इससे ये तो साफ़ हो गया कि कांग्रेस एसआईआर के मुद्दे को यहीं छोड़ने वाली नहीं है बल्कि अभी इस मुद्दे के इर्द गिर्द और भी कार्यक्रम भविष्य में बुने जाएंगे।
पटना के रोड शो में शामिल होने के लिए पूरे बिहार से कांग्रेस ,राजद ,माले और वीआईपी के लोग पहुंचे थे। मन में बस यही था कि रैली में भी शामिल होंगे और पटना भी घूम लेंगे और कुछ अपने लोगों से मिल लेंगे। सीतामढ़ी से बूढ़े जीवन राय भी पटना पहुंचे थे। कहने लगे ”बड़ा मजा आया। गर्मी थी लेकिन सच की भीड़ पहली बार देखा। राहुल को देख लिया। हम लोग इंदिरा गाँधी को अपना नेता मानते थे। बाभन लोग भी पहले कांग्रेसी ही थे लेकिन अब वे बदल गए।
ये लोग कांग्रेस के राज में खूब खाये -पीये और कमाए और अब कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी में चले गए। नेता को लोग पलटीमार कहते हैं। लेकिन जब जनता ही पलट जाए तो क्या कहा जाए। इस बार सरकार पलट जायेगी। राहुल और तेजस्वी के सामने अब चोरी की सरकार नहीं बनेगी। जनता सब समझ गयी है। कांग्रेस को अभी और मेहनत करनी होगी। कांग्रेस अगर 30 से ज्यादा सीट जीत जाती है तो खेल हो जाएगा। ”
इस पूरी यात्रा में फ्रंट सीट पर राहुल गांधी रहे लेकिन इसके चलते महागठबंधन के कार्यकर्ताओं में किसी तरह की दरार नहीं दिखी। बल्कि नेतृत्व के स्तर पर भी बेहतर तालमेल दिखा। महागठबंधन के भीतर एक चीज़ तय है कि अगर उसकी जीत हुई तो तेजस्वी यादव ही मुख्यमंत्री बनेंगे। इसलिए महागठबंधन के सबसे बड़े दल राजद और उसके नेता तेजस्वी को कांग्रेस में कोई ख़तरा महसूस नहीं होता। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि चुनाव आयोग जो एसआईआर कर रहा है उसमें 1 फ़ीसदी वोटरों के नाम हटाए जाने का मतलब महागठबंधन के 3 से 4 फ़ीसदी वोटर्स का नुकसान है। इसलिए महागठबंधन के दलों के भीतर भी वोट ट्रांसफ़र एक ज़रूरी प्रक्रिया है और इसके लिए ज़रूरी है कि उनमें एकता दिखे।
आगामी दिनों में महागठबंधन का क्या स्वरुप होता है और उसकी क्या रणनीति बनती है और फिर राहुल गाँधी कितना बड़ा हाइड्रोजन बम फोड़ते हैं इसका इन्तजार बिहार के लोगों को तो है ही लगे हाथ देश को भी है। सच तो यही है कि देश में अब वोट चोरी की कहानी तैरने लगी है और अब लोग यह यकीन भी करने लगे हैं कि पिछले कुछ सालों से चुनाव जीतने का यह नया खेल खूब फल फूल रहा है और इसका लाभ बीजेपी को मिल रहा है।
लेकिन बिहार में राहुल के अंदाज को देखते हुए नीतीश सरकार भी बहुत कुछ करती नजर आ रही है। अब सूबे की सरकार ने मुफ्त रेवड़ियों का बड़ा सहारा लिया है और वह भी चुनाव से पहले ही। इन रेवड़ियों पर बिहारी समाज भी मुस्कुरा रहा है। बिहार के लोग यह कह रहे हैं कि सरकार देती है तो हमें लेने से क्या गुरेज है। लेकिन लगे हाथ लोग यह भी कह रहे हैं कि एनडीए का अब खेल यही रह गया है। इससे लोकतंत्र और संविधान पर चाहे जो भी असर पड़े सच तो यही है कि हम इस नए खेल में फंस गए हैं। लोभ के इस खेल से बिहारियों का निकलना मुश्किल है।
चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार की सरकार ने अपना खजाना खोल दिया है। इस खुले खजाने का लाभ सहयोगी पार्टी बीजेपी को कितना मिलेगा कहना मुश्किल है लेकिन जदयू की कोशिश तो यही है कि पार्टी को बचाने के लिए अब उसके सामने इससे सस्ता रास्ता कुछ भी नहीं। सरकार द्वारा कई घोषणाएं की गई हैं। बड़ी मात्रा में सरकारी नौकरियों की घोषणाएं की जा रही हैं और लगे हाथ नकदी की घोषणाएं भी हो रही हैं। हालिया घोषणा सूबे की महिलाओं के खाते में दस दस हजार की नकदी देने की बात है।
नीतीश कुमार ने कहा है कि राज्य में ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ की शुरुआत की गई है, जिसके तहत प्रत्येक परिवार की एक महिला को रोजगार शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाएगी। इस योजना को बिहार सरकार की कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है और इसे सितंबर 2025 से लागू किया जाएगा। इस कदम को नीतीश सरकार का ‘महिला कार्ड’ के रूप में देखा जा रहा है। तो क्या नीतीश कुमार और बीजेपी को इसका कुछ फायदा मिल पाएगा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह योजना राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले नीतीश कुमार की सरकार का एक रणनीतिक कदम है, जिसे ‘महिला कार्ड’ के रूप में देखा जा रहा है। बिहार में महिलाएँ मतदाता के रूप में एक अहम हिस्सा हैं और उनके आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ी यह योजना न केवल सामाजिक बदलाव ला सकती है, बल्कि आगामी चुनावों में भी जेडीयू के लिए एक मज़बूत आधार तैयार कर सकती है। लेकिन सवाल उठाए जा रहे हैं कि आख़िर महिलाओं के सशक्तिकरण की चिंता सरकार को चुनाव से ऐन पहले क्यों हुई? विपक्षी दल भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार को पिछले पाँच सालों में इसकी ज़रूरत महसूस नहीं हुई?
नीतीश ने हाल में कई घोषणाएँ की हैं। 15 अगस्त, 2025 को नीतीश कुमार ने घोषणा की कि अगले पाँच वर्षों में 1 करोड़ युवाओं को सरकारी नौकरी और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे। इसका मक़सद युवाओं को आकर्षित करना और बिहार में रोजगार के अवसरों को बढ़ाना है।19 अगस्त, 2025 को नीतीश कुमार ने शिक्षा विभाग के तहत अनुकंपा के आधार पर 5,353 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए, जिसमें 4,835 विद्यालय लिपिक और 518 विद्यालय परिचारी शामिल थे। 20 अगस्त 2025 को नीतीश कुमार ने बाढ़ से प्रभावित 6 लाख 51 हजार 602 परिवारों के बैंक खातों में 7,000 रुपये प्रति परिवार की दर से कुल 456 करोड़ 12 लाख रुपये की राहत राशि डीबीटी के माध्यम से हस्तांतरित की।
जाहिर है आने वाले समय में और भी रेवड़ियां बंट सकती हैं। फिर बीजेपी का पिटारा अलग से खुलेगा। जाहिर है कि राहुल की वोट चोरी की काट के लिए नीतीश सरकार और भी कुछ बड़ा कर सकती है ऐसे में आज जो महागठबंधन के साथ खड़े हैं कल किधर जाएंगे ,कहना मुश्किल है।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)