गुरु: दाई, दलाल या दीपक?

भारतीय परंपरा और पश्चिमी दर्शन दोनों ही यह मानते हैं कि “गुरु” केवल शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक है। उपनिषद कहते हैं- “तमसो मा ज्योतिर्गमय”, यानी अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। “गुरु” शब्द ही “गु” (अंधकार) और “रु” (प्रकाश) से बना है। पश्चिम में सुकरात ने गुरु को “Midwife (दाई)” कहा।

सुकरात की दाई और भारतीय गुरु

सुकरात का कहना था कि जैसे दाई बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि मां की मदद करती है, ताकि बच्चा सुरक्षित पैदा हो सके, वैसे ही गुरु ज्ञान नहीं देता, बल्कि शिष्य के भीतर पहले से छिपे सत्य को जन्म लेने में मदद करता है। उनका यह “Socratic method” लगातार सवाल पूछकर शिष्य को सोचने पर मजबूर करना था, ताकि अंततः शिष्य अपने भीतर ही उत्तर खोज ले।

भारतीय परंपरा भी यही कहती है। गुरु कोई बाहर से प्रकाश नहीं देता, बल्कि भीतर छिपी ज्योति को जगाता है। गीता में अर्जुन के मोह को तोड़ने वाला कृष्ण हो या बौद्ध परंपरा में बुद्ध का उपदेश, गुरु हर जगह शिष्य को स्वयं का साक्षात्कार कराता है।

आज का गुरु: कोचिंग सर्स और मोक्ष व्यापारी

लेकिन आज गुरु का अर्थ बदल गया है।

“कोचिंग सर्स” गुरु नहीं, व्यापारी बन गए हैं। उनका तर्क है;“IIT में घुसा दो, बस,चाहे वह जीने-मरने-संघर्ष-जनोन्मुख होने की कला जाने या न जाने,उनकी बला से।” वे सुकरात की तरह प्रश्न नहीं पूछते, बल्कि टेस्ट सीरीज़ और फीस का हिसाब पूछते हैं। वे शिष्य को अंधकार से प्रकाश नहीं, बल्कि होस्टल से हॉस्टल शिफ्ट करवाते हैं।

दूसरी ओर ”प्रोफेशनल आध्यात्मिक गुरु या मौलाना या पादरी” हैं, जो मोक्ष या जन्नत को पैकेज में बेचते हैं। सुबह टीवी पर योगा, दोपहर में प्रवचन, शाम को “हर्बल प्रोडक्ट्स’,सब कुछ एक ही दुकान में उपलब्ध करवा देते हैं। उनके लिए भक्त “कस्टमर” हैं और धर्म “ब्रांड्स”।

यानी सुकरात का Midwife अब Mid-man (बिचौलिया) बन चुका है,जो सत्य और शिष्य के बीच दलाली करने करता है।

मगर, यहां आलोक सागर भी हैं

लेकिन इस भीड़ में कहीं-कहीं सच्चे गुरु भी हैं। प्रो. आलोक सागर, जिन्होंने IIT दिल्ली की नौकरी छोड़ दी और आदिवासियों के बीच रहना चुना। वे बच्चों को पढ़ाते हैं, जंगल बचाते हैं, और समाज को भीतर से जगाते हैं। न कोई विज्ञापन, न कोई दान पेटी, न कोई कोचिंग पैकेज। वे वही हैं, जो सुकरात कहते थे और उपनिषद बताते हैं, यानी “जो शिष्य के भीतर के सत्य को जन्म दिलाए।”

अंतत: गुरु दाई है, जो शिष्य के भीतर छिपे सत्य को बाहर लाने में मदद करता है।

गुरु दीपक है, जो अंधकार में दिशा दिखाता है।

लेकिन अगर गुरु दलाल बन जाए, तो? वह कभी कोचिंग कभी अध्यात्म के ज़रिए समाज को अज्ञान में और गहरे डूबा जाता है।

आज हमें आलोक सागर जैसे गुरुओं की पहचान करने की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि वही हमें दिखाते हैं कि गुरु का असली काम ज्ञान बेचना नहीं, ”उस सत्य को ढूंढना है, जो हमारी कंडिशनिंग से हमें दिखायी नहीं पड़ता है।’’

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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