केरल ने इंसानी उन्नति के पैमाने मृत्यु दर में अमेरिका को छोड़ा पीछे

हम भारतीयों को केरल मॉडल पर गर्व करना ही चाहिए। केरल ने मानव विकास के सबसे बुनियादी पैमाने पर अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया। जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में कितने जिंदा रहते हैं, यह किसी देश या समाज की इंसानी उन्नति का सबसे बड़ा पैमाना है। इसी से जुड़ी हुई बात है कि कितनी महिलाएं घर पर बच्चों को जन्म देती हैं और कितनी महिलाएं प्रशिक्षित डॉक्टरों-नर्सों की देख-रेख में अस्पतालों या मेडिकल संस्थानों में बच्चों को जन्म देती हैं- हमें गुजरात मॉडल नहीं, केरल और तमिलनाडु मॉडल की जरूरत है।

इससे जुड़े कुछ तथ्य- 

1- केरल में जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में सिर्फ 5 बच्चों की मौत होती है, 9 हजार 995 जीवित बचते हैं। 

2- अमेरिका में 1000 जन्म लेने वाले बच्चों में 5.6 बच्चों की मौत हो जाती है। केरल इस मामले में अमेरिका से बेहतर स्थिति में है।

3- भारत में पूरे देश का यह औसत 25 है। मतलब 1000 जन्म लेने वाले बच्चों में 25 बच्चे तुरंत मर जाते हैं। 

4- इस तथ्य-आंकड़े की सबसे बड़ी रेखांकित करने वाली बात है कि 1000 जन्म लेने वाले बच्चों की जीवित रहने या मौत के मामले में केरल में शहर और गांवों के बीच नहीं के बराबर अंतर है।

कोई मां शहरी हो या गांव की उसका प्रसव करीब-करीब समान रूप से सुरक्षित होता है। गांव है या शहर बच्चों के जीवित रहने या मरने की संख्या में नहीं के बराबर अंतर है। 

5- सबसे गर्व करने लायक उपलब्धि यह है कि केरल में शहरी क्षेत्रों में करीब 99 प्रतिशत (98.99) माएं किसी न किसी मेडिकल संस्थान में प्रशिक्षित डॉक्टरों-नर्सों के देख-रेख में बच्चों को जन्म देती हैं। 

गांवों की करीब 97 प्रतिशत माएं किसी न किसी मेडिकल संस्थान में प्रशिक्षित डॉक्टर-नर्स  की देख-रेख में बच्चों को जन्म देती हैं। 

6- केरल के शहरों में सिर्फ 0.01 प्रतिशत माएं परंपरागत तरीके से परिवार या परंपरागत दाई की देख-रेख में बच्चों को जन्म देती हैं। 

7- गांवों में सिर्फ 1.37 प्रतिशत माँ परंपरागत तरीके से परिवार या परंपरागत दाई की देख-रेख में बच्चों को जन्म देती हैं। 

8- इस मामले में दुनिया भर की उपलब्धियां यह बताती हैं कि यह उन्नत पैमाना सिर्फ और सिर्फ स्वास्थ्य सेवा या मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराकर नहीं हासिल की जा सकती है। इसके लिए समाज और परिवार की जागरूकता और सहयोग जरूरी है। कहने की जरूरत नहीं है कि मेडिकल सुविधा और बड़ी संख्या में डॉक्टरों-नर्सों या अन्य प्रशिक्षित मेडिकल कर्मियों के बिना इसे हासिल नहीं किया जा सकता है। 

8- केरल में राजनीतिक दलों के बीच चुनावी प्रतियोगिता (वोट पाने) का एक बुनियादी आधार इंसानी विकास के उन्नत पैमाने हासिल करना है। यह सभी पार्टियों का लक्ष्य होता और घोषणा-पत्र होता है। 

9- मानव विकास का यह उन्नत पैमाना सिर्फ सरकार, राजनीतिक दल और मेडिकल सुविधा के आधार पर नहीं हासिल किया जा सकता है, इसके लिए पूरे समाज में एक बुनियादी क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है। केरल की पार्टियां, सरकार और सरकारी ढांचा ही सिर्फ उन्नत नहीं हुआ है, पूरा का पूरा समाज बदला है। उसके सोचने का ढंग, जीने का ढंग, उसकी संवेदना-सरोकार और वैज्ञानिक-तार्किक सोच में क्रांतिकारी रूपान्तरण हुआ है। 

10- केरल की इस उपलब्धि में सभी धार्मिक समूहों, सामाजिक समूहों और वर्गों की समान भूमिका है। 2011 की जनगणना (उसके बाद जनगणना नहीं हुई) के अनुसार केरल में 54.73 प्रतिशत हिंदू, 26.56 प्रतिशत मुस्लिम, 18.38 प्रतिशत ईसाई धर्म के अनुयायी लोग हैं। शेष 0.33 प्रतिशत अन्य धर्मों के लोग या किसी धर्म को न मानने वाले लोग हैं। 

केरल की इस उपलब्धि में सभी धर्मों के लोगों की समान भूमिका है। 

11- केरल विश्व का एक ऐसा मॉडल है, जहां हिंदू, मुस्लिम और ईसाई तीनों बड़ी संख्या में हैं और सभी ने मिलकर केरल मॉडल खड़ा किया है। सभी धर्मों के लोगों का होना कोई रोड़ा नहीं पना, बल्कि एक समावेशी केरल बनाने में मदद किया। केरल धर्मनिरपेक्षता का एक शानदार मॉडल है। 

12- केरल में वामपंथी आंदोलन, बहुजन आंदोलन और उदारवादी आंदोलन तीनों समान रूप से मजबूत रहे हैं। तीनों के संघर्षों ने केरल के भारत का एक ऐसा प्रदेश बना दिया, जो इंसानियत की विकास-यात्रा में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है। 

केरल के बराबरी करने की स्थिति में यदि कोई दूसरा प्रदेश है, तो वह तमिलनाडु है। वह कुछ पैमाने पर केरल से पीछे है, तो कुछ पैमानों पर केरल से आगे है। 

हमें केरल मॉडल पर गर्व करना चाहिए। देश को गुजरात मॉडल नहीं, केरल और तमिलनाडु के मॉडल की जरूरत है।

( तथ्यों का स्रोत- द इंडियन एक्सप्रेस, 7 सितंबर, 2025, दिल्ली संस्करण, पृ.5)

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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