केरल हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि इस्लाम में बहुविवाह केवल तभी मान्य है जब पुरुष अपनी पत्नियों के साथ समान न्याय करने में सक्षम हो। जस्टिस पी.वी. कुन्हिकृष्णन ने यह अवलोकन उस समय किया जब उन्होंने एक पुनरीक्षण याचिका का निपटारा करते हुए परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा। कुरान की आयतों (सूरह 4, आयत 3 और 129) का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लामी कानून की वास्तविक भावना एकपत्नी प्रथा है और बहुविवाह केवल अपवाद है, वह भी न्याय और क्षमता की शर्त पर।
परिवार न्यायालय ने पत्नी की उस मांग को खारिज कर दिया था जिसमें उसने अपने पति से ₹10,000 मासिक भरण-पोषण की मांग की थी। पति एक नेत्रहीन व्यक्ति है, जो भीख और पड़ोसियों की कभी-कभी मिलने वाली मदद से जीवनयापन करता है।
याचिकाकर्ता पत्नी ने तर्क दिया कि उसका पति पहले से दो पत्नियों के होते हुए भी शादी करने की धमकी दे रहा है। इस पर कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह तभी संभव है जब पति अपनी पत्नियों का उचित भरण-पोषण और न्याय कर सके। आर्थिक रूप से अक्षम व्यक्ति के लिए बहुविवाह संभव नहीं है।
कुरान की आयतों (सूरह 4, आयत 3 और 129) का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लामी कानून की वास्तविक भावना एकपत्नी प्रथा है और बहुविवाह केवल अपवाद है, वह भी न्याय और क्षमता की शर्त पर।कोर्ट ने कहा,“इन आयतों की आत्मा और मंशा एकपत्नी प्रथा है, बहुविवाह केवल अपवाद है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कुरान न्याय पर विशेष जोर देता है। यदि मुस्लिम पुरुष अपनी पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पत्नी के साथ न्याय कर सकता है, तभी उसे एक से अधिक विवाह की अनुमति है। मुस्लिम समाज का अधिकांश हिस्सा, चाहे उनके पास आर्थिक क्षमता हो, एक ही पत्नी के साथ रहता है। यही कुरान की सच्ची भावना है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिम समाज का छोटा-सा वर्ग जो कुरान की आयतों को भूलकर बहुविवाह कर रहा है, उसे धार्मिक नेताओं और समाज द्वारा शिक्षित किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि राज्य का यह कर्तव्य है कि मुस्लिम रीति-रिवाजों और कानून की बुनियादी बातों के बारे में उचित परामर्श दिया जाए। “यदि कोई नेत्रहीन मुस्लिम व्यक्ति, जो मस्जिद के सामने भीख मांगकर जीवनयापन करता है, बिना इस बुनियादी जानकारी के लगातार शादियां कर रहा है, तो राज्य का कर्तव्य है कि उसे सही तरीके से परामर्श दिया जाए।” कोर्ट ने आगे कहा कि मुस्लिम समुदाय की वे निर्धन महिलाएँ, जो बहुविवाह की शिकार हैं, उनकी रक्षा करना भी राज्य का दायित्व है।
इसलिए कोर्ट ने सरकार के संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि उत्तरदाता (पति) को योग्य परामर्शदाताओं और धार्मिक नेताओं की मदद से उचित काउंसलिंग दी जाए, ताकि वह दोबारा विवाह न करे और एक और महिला बेसहारा न बने। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि संभव हो तो राज्य सरकार पति और पत्नी को पुनः मिलाने का प्रयास करे, “यह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए गर्व की बात होगी।” अंततः कोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए परिवार न्यायालय का आदेश बरकरार रखा और इस निर्णय की प्रति केरल सरकार के समाज कल्याण विभाग के सचिव को उचित कार्रवाई हेतु भेजने का निर्देश दिया।
इसके साथ केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जो व्यक्ति भिक्षा पर निर्भर है, उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश नहीं दिया जा सकता, भले ही पत्नी उससे गुज़ारा भत्ता की मांग करे। जस्टिस पी.वी कुनहीकृष्णन ने पुनरीक्षण याचिका का निपटारा करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्त्री द्वारा अपने पति से ₹10,000 मासिक गुज़ारा भत्ता मांगने की अर्जी खारिज कर दी गई थी। पति नेत्रहीन है और भिक्षा तथा पड़ोसियों से मिलने वाली कभी-कभार की मदद पर जीवन यापन करता है।
अदालत ने कहा कि CrPC की धारा 125 के तहत पति की पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी तभी लागू होती है, जब पति अपनी पत्नी का पालन-पोषण करने में सक्षम हो। जब यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि पति भिखारी है और उसकी कोई नियमित आय नहीं है, तो इस तरह का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की: “जब पत्नी यह स्वीकार करती है कि उसका पति भिखारी है, तो कोई भी अदालत उसे पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश नहीं दे सकती।”
राज्य की जिम्मेदारी अदालत ने यह भी कहा कि जिस व्यक्ति की जीविका भिक्षा पर आधारित है, उसकी असहाय पत्नी की सुरक्षा राज्य द्वारा उचित उपायों से की जानी चाहिए। अदालत ने कहा: “हमारे राज्य में भिक्षावृत्ति को मान्यता प्राप्त नहीं है। यह राज्य, समाज और अदालत का कर्तव्य है कि कोई भी व्यक्ति जीविका के लिए भिक्षा न मांगे। राज्य का यह दायित्व है कि कम से कम ऐसे व्यक्ति को भोजन और वस्त्र उपलब्ध कराए। ऐसे व्यक्ति की असहाय पत्नी की भी रक्षा राज्य द्वारा उपयुक्त उपायों से की जानी चाहिए।”
अदालत ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, फैमिली कोर्ट के निर्णय की पुष्टि की और समाज कल्याण विभाग के सचिव को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
(जेपी सिंह की रिपोर्ट।)