चुनावी धांधलियों और वोट चोरी की गूंज तो हरियाणा में है। लेकिन कांग्रेस की प्रदेश इकाई इसका प्रभाव बनाने में अभी कमजोर साबित हो रही है। लेकिन इस बीच एक समय प्रदेश में राजनीतिक ताकत रही इंडियन नेशनल लोकदल 25 सितंबर को देवीलाल जयंती पर कांग्रेस और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के गढ़ में रैली करके अपना जनाधार दुबारा हासिल करने के प्रयास में जुट गयी है। इंडियन नेशनल लोकदल के अध्यक्ष अभय सिंह चौटाला के निशाने पर कांग्रेस पार्टी से ज्यादा भूपेंदर सिंह हुड्डा बने हुए हैं।
अभय सिंह चौटाला की राजनीतिक अदावत का कारण भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्री काल में इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला की भ्रष्टाचार मामले में 10 साल की सजा का होना है। अभय सिंह चौटाला पर भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के अंतर्गत आय से अधिक संपत्ति का केस सीबीआई द्वारा उसी काल में दर्ज किया गया था। 2005 में सत्ता गंवाने के बाद से ही इनेलो पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था।
2024 के विधानसभा चुनावों में मिली हार से जेजेपी के हाशिये पर चले जाने के बाद अब इनेलो ने परिवारवादी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए प्रदेश में अपने जनाधार के विस्तार का मोर्चा संभाल लिया है। 2024 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस द्वारा भाजपा को उखाड़ने में की गई चूक ने प्रदेश के मतदाताओं को निराश ही किया क्योंकि भाजपा के खिलाफ़ धरातल पर नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी। कांग्रेस की आपसी गुटबाजी ने भी आम लोगों के विश्वास को ठेस पहुंचाई। हरियाणा में बहुल जाट और कांग्रेस समर्थक अन्य जातियों के लोग विधानसभा में कांग्रेस की हार को भूपेंदर सिंह हुड्डा (पिता पुत्र ) की रणनीतिक चूक के रूप में देख रहे हैं।
अभय सिंह चौटाला बार-बार भूपेंद्र हुड्डा की भाजपा से गुप्त रूप से साठ-गांठ का भी आरोप लगाते रहे हैं। अभय चौटाला ने यह भी आरोप लगाया था कि उचाना में कांग्रेस के बृजेन्द्र सिंह की हार भूपेंद्र हुड्डा की वजह से हुयी। हरियाणा में तीसरी बार भाजपा की सरकार बनाने के लिए भूपेंदर सिंह हुड्डा ने मदद की यह आरोप अभी एक सप्ताह पहले पत्रकारों से बात करते हुए अभय सिंह चौटाला ने लगाया।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पलट कर इनेलो को उनके कार्यकाल में हुयी घटनाओं की याद दिलाते हुए घेर लिया है। रोहतक में इनेलो पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए हुड्डा ने कहा कि प्रदेश में सभी को कहीं भी राजनीतिक कार्यक्रम करने की स्वतंत्रता है। हर पार्टी अपने कार्यक्रम में जनता के बीच अपनी उपलब्धियां रखती है। लेकिन बीजेपी और इनेलो ऐसी पार्टियां हैं, जिनके पास अपनी सरकार की बताने लायक एक भी उपलब्धि नहीं है। अब इनेलो (INLD) तो बीजेपी की प्रोक्सी बनकर काम कर रही है। क्योंकि बीजेपी कांग्रेस से कभी सीधे नहीं लड़ती, बल्कि उसे इनेलो और जेजेपी जैसी पार्टियों की जरूरत पड़ती है। इनका मकसद केवल बीजेपी-विरोधी वोटों का बंटवारा करना, जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ करना व जनता को धोखा देना है।
कभी देवीलाल का गढ़ माना जाने वाले सोनीपत, रोहतक, झज्जर के जाटों में भूपेंदर सिंह हुड्डा ने देवीलाल को लोकसभा चुनावों 1991, 1996 और 1998 में लगातर हरा कर अपनी राजनीतिक साख बनाई थी। देवीलाल को 1987 में महम से विधान सभा 1989 में रोहतक से लोकसभा चुनावों में बड़ी सफलता देने में जाटों का बड़ा योगदान रहा था। किसान कमेरा श्रमिकों की राजनीति करने वाले देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला जाटों के गढ़ में अपनी राजनीतिक जमीन बचा नहीं पाये।
भूपेंदर हुड्डा ने सवाल उठाया कि क्या इनेलो और बीजेपी यह बताएंगी कि उनके शासनकाल में हरियाणा किन परिस्थितियों से गुजरा था? उस समय किसानों की क्या स्थिति थी? हुड्डा ने पूछा कि इनेलो बताए कि उनकी सरकार में किसानों पर गोलियां क्यों चलाई गईं? महम कांड जैसी घटनाओं को किसने अंजाम दिया? कौन था जो अपनी ड्रेस बदलकर वहां से भागा था? क्या यह बताएंगे कि ना मीटर होगा ना मीटर रीडर होगा, बाद में किसानों को गोलियों से भूना। क्या ये भी बतायेंगे कैसे कंडेला कांड हुआ तब सत्ता के नशे में इंसान को इंसान नहीं समझा।
भूपेंद्र हुड्डा ने इनेलो को निशाने पर लेते हुए सवाल किया कि क्या इनेलो यह बताएगी कि उनकी सरकार में किसानों की जमीनें क्यों छीनी जाती थीं? कर्ज में डूबे किसानों की जमीनें क्यों कुर्क की जाती थीं ? क्यों उन्हें पकड़कर जेल में डाला जाता था? उन्होंने दावा किया कि उस समय जेल में किसानों को रोटी खिलाने का खर्चा भी उनके कर्ज में जोड़ दिया जाता था।
हुड्डा ने कहा कि पूरे हरियाणा को आज भी याद है कि इनेलो-बीजेपी सरकार के दौरान गुंडाराज था और सरकार जेल से चलती थी। उन्होंने दावा किया कि 2005 में कांग्रेस सरकार ने हरियाणा को गुंडाराज से मुक्ति दिलाई। कांग्रेस सरकार ने किसानों के 1600 करोड़ रुपये के बिजली बिल माफ किए, फसली ऋण पर ब्याज दर को शून्य किया, और 2300 करोड़ रुपये के किसानों के कर्ज माफ किए। साथ ही, यह नियम बनाया था कि किसी भी किसान की जमीन कुर्क नहीं होगी। हुड्डा ने चुनौती दी कि क्या इनेलो इन सच्चाइयों को जनता के सामने रख सकती है?
मूलतः कांग्रेस की नीतियों के विरोध से उपजी इनेलो ने लम्बे संघर्ष के बाद मिली सत्ता को अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते पिछले 2 दशकों में लगभग गंवा दिया। क्षेत्रीय राजनीति की ताकत को एकाधिकारवाद के ग्रहण से बचने में असफल इनेलो बदलती राजनीति की परिभाषा को अपनाने से चूक गयी। सैद्धांतिक तौर पर इनेलो के मध्यमार्गी समाजवादी विचारधारा के दृष्टिकोण में अंतर्द्वंद को पार्टी का वैचारिक थिंक टैंक स्पष्ट करने में असमर्थ रहा।
ग्रामीण कृषक समाज के हितों को सुरक्षित करने के प्रगतिवादी संघर्ष की राजनीति पूंजीपति दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक विचारधारा के प्रभाव से खुद को अलग नहीं कर पायी। लोकराज के सिद्धांत में समान भागीदारी का नियम पारिवारिक एकाधिकार के नीचे कब कुचल गया इसका नेतृत्व को भी आभास तक नहीं हुआ। पार्टी की लोकहित की राजनीति भ्रष्टाचार की चौखट लांघ कर गहरे आरोपों के मुहाने पहुंच गई। नेतृत्व के स्वार्थ और वर्चस्व की महत्वाकांक्षाओं के टकराव को सुलझाने में पार्टी विफल रही।
इनेलो सत्ता हसिल करने के लिए भाजपा से गठबंधन करती रही है और भाजपा समर्थन से सरकार भी बनाती रही है। राज्य में भाजपा की नीति को मजबूत करने के लिए नए नेतृत्व के दम्भ में इनेलो नयी संभावनाओं को लेकर वैकल्पिक राजनीतिक स्थान को हासिल करने के लिए समझौते व् संधियों के तहत यह पहल कर रही है। 2024 के लोक सभा चुनावों में इनेलो केवल 1.7 4 % और विधानसभा चुनावों में 4.1 4 % मतों के साथ केवल 2 सीट ही जीत सकी थी। मायावती की बहुजन समाज पार्टी से किया गया समझौता भी किसी काम नहीं आया। अब इनेलो फिर से जाटों और खास कर किसानों की हिमायती बन कर खुद को उभरने के प्रयासों को आजमा रही है।
(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं।)