बांदा : कवि, वैज्ञानिक और फिल्मकार गौहर रज़ा ने कहा कि शब्दों की ताकत से सरकारें कांप जाती हैं।
श्री रज़ा जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में बोल रहे थे। सम्मेलन में बोलने को अपनी खुशकिस्मती बताते हुए उन्होंने कहा कि जबसे इंसान ने लिखना आरंभ किया तब से समाज से लेखक का गहरा ताल्लुक रहा है।
बांदा के गांव बडोखर खुर्द में 19 सितम्बर से 21 सितम्बर 25 को आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन का उदघाटन करते हुए श्री रज़ा ने कहा कि साहित्य विचारों के टकराहट की यात्रा है, जिसमें समानता का द्वंद शामिल है। उन्होंने कहा कि सोवियत क्रांति के बाद लिखे गए साहित्य में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो हमें बार – बार पढ़ना चाहिए। जब हम लेखक हैं तो शब्द की एक अपनी जिम्मेदारी होती है। दुनिया भर के लेखकों ने इसे निभाया। शब्दों की ताकत से सरकारें कांप जाती हैं।
उर्दू और हिंदी के भीतर तीन तरह के लेखक मौजूद है। जो भ्रमों के दायरे में हैं। जो प्रगतिशील ख्वाब देखने वाले हैं। जो संघर्षों में हैं। दमन के खिलाफ कलम की धार को तेज करना पड़ेगा, जबकि हमने शब्दों की जिम्मेदारी नहीं निभाई। हमें फारसी और संस्कृत के बजाय अपनी बोलियों की ओर जाना चाहिए था।
सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता और पूर्व सांसद सुभाषिनी अली ने विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि बोलियों का महत्व भाषा की व्यापकता को बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि विचार को व्यक्त करने की आजादी हमारे सरोकारों और संस्कारों की अभिव्यक्ति है। हम मनुवादी ज्यादा हैं , जनवादी कम हैं। समानता हमारी सबसे कीमती धरोहर और जरूरत है। हमें मनुस्मृति की ओर झोंकने की साजिश हैं जिसकी शिकार औरतें और दलित हैं।
उदघाटन सत्र की अध्यक्षता चंचल चौहान, रेखा अवस्थी और इब्बार रब्बी के अध्यक्ष मंडल ने की। प्रारंभ में स्वागत समिति अध्यक्ष प्रेम सिंह ने उपस्थित लेखकों का स्वागत किया।
जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज सिंह और प्रलेस के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य फखरुद्दीन ने इस सम्मेलन का अपने संगठनों की ओर से शुभकामनाएं दीं।
जनवादी लेखक संघ के महासचिव संजीव कुमार ने उदघाटन सत्र का संचालन किया।
अगले सत्रों में कई वक्ताओं ने वैचारिक संवाद में भागीदारी किया जिसमें लोकप्रिय कवि सम्पत सरल, भंवर मेघवंशी, नितिशा खलखो ने मुख्य रूप से विचार रखे। बजरंग बिहारी तिवारी ने विचार सत्र का संचालन किया।
सम्मेलन के दूसरे दिन की शुरुआत ‘सरोकार का सिनेमा ‘ पर संजय जोशी की प्रस्तुति से हुई जिसमें उन्होंने सिनेमा के जन इतिहास से लेकर प्रतिरोध की अभिव्यक्ति की दृश्य – चर्चा की और प्रोजेक्टर से प्रस्तुति की।
इसके बाद सम्मेलन के प्रतिनिधि सत्र की विधिवत शुरुआत हुई जिसमें महासचिव संजीव कुमार ने सांगठनिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में पिछले 3 वर्षों के साहित्य रचना विकास , प्रवृत्तियों और चुनौतियों पर चर्चा किया।
इस संगठनिक सत्र की अध्यक्षता चंचल चौहान ,इब्बार रब्बी ,राम प्रकाश त्रिपाठी, मृणाल और रेखा अवस्थी के अध्यक्ष मंडल ने किया। महासचिव द्वारा प्रस्तुत की गई सांगठनिक रिपोर्ट पर विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों द्वारा चर्चा हुई।
शाम के सांस्कृतिक सत्र में कविता सत्र की शुरुआत केदारनाथ अग्रवाल की कविता बसंती हवा पर कथक नृत्य से हुई जो कथक गुरु श्रद्धा निगम की उपस्थिति में उनकी छात्राओं द्वारा पेश किया गया उसके बाद देश भर के आए कवियों ने कविता सत्र में अपनी कविताओं का पाठ किया ।
राष्ट्रीय सम्मेलन के तीसरे और आखिरी दिन बडोखर खुर्द में प्रेम सिंह की बगिया में देश भर से आए हिंदी – उर्दू लेखकों ने सम्मेलन में प्रस्तुत रिपोर्ट को व्यापक चर्चा के बाद स्वीकृत किया।
सम्मेलन ने कई मुद्दों पर प्रस्ताव भी पास किए जिनमें दलित समुदाय के उत्पीड़न के खिलाफ, 2020 की नई शिक्षा नीति के खिलाफ, लेबर कोड के विरोध में, संवैधानिक मूलाधारों पर निरंतर हमले के विरुद्ध,पाठ्यक्रमों के सांप्रदायिकीकरण के खिलाफ, फिलिस्तीन की भयावह त्रासदी और उसके प्रति भारत के रवैए पर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले के विरुद्ध , भ्रष्ट और आपराधिक राजसत्ता के विरुद्ध एकजुट संघर्ष के लिए प्रस्ताव पास हुए।
सम्मेलन के अंत में हुए सांगठनिक चुनाव में चंचल चौहान को राष्ट्रीय अध्यक्ष, संजीव कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष और नलिन रंजन सिंह को महासचिव चुना गया। बजरंग बिहारी तिवारी , संदीप मील, प्रेम तिवारी को संयुक्त महासचिव, 9 लेखकों को उपाध्यक्ष और 9 लेखकों को सचिव चुना गया।
सम्मेलन के समापन के बाद रमेश पाल की कला टीम द्वारा प्रस्तुत दीवारी नृत्य ने लेखकों का मन मोह लिया।
तीन दिन के इस सम्मेलन में देश भर के और स्थानीय लेखकों की विपुल भागीदारी ने इसकी प्रासंगिकता को जीवंत किया।
85 वर्ष से लेकर 22 वर्ष तक के लेखक जो गुजरात से लेकर झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान , मध्य प्रदेश और हरियाणा, दिल्ली से आए थे। 28 लेखिकाओं ने भी भागीदारी की।
(सुधीर सिंह की रिपोर्ट)