सेल एण्ड द सोलः एक विचारोत्तेजक जेल डायरी

जेल वो जगह है, जहां जेल प्रशासन द्वारा सत्ताबल का परपीड़क (सैडिस्ट) प्रदर्शन किया जाता है। आप कितने भी बड़े बुद्धिजीवी, ख्याति प्राप्त स्कालर हों, जेल प्रशासन अपने चंगुल में आये लोगों के साथ परपीड़क व्यवहार कर अपने सामंती सत्ताबल का प्रदर्शन करता ही है। लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि अपराध जगत के बड़े डॉन, जो जेल अधीक्षक से लेकर जेल गार्ड तक की जेबें गरम करते हैं, उसके आगे ये बलशाली जेल प्रशासन पूरी तरह नतमस्तक रहता है। 

प्रख्यात चिंतक और लेखक आनन्द तेलतुम्बडे की जेल डायरी, जो हाल ही में 5 सितम्बर को प्रकाशित होकर आयी है, इसी बात को उनके खुद के अनुभवों के माध्यम से बयान करती है। ‘द सेल एण्ड द सोल’ नाम से आये इस जेल संस्मरण को ‘ब्लूम्सबरी’ प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। आनन्द तेलतुम्बडे, दुनिया के सबसे कुख्यात सरकारी साइबर साजिश वाले मुकदमे- भीमा कोरेगांव, के सोलह अभियुक्तों में से एक हैं। उन्हें कुल 31 महीने मुम्बई की तलोजा जेल में रहना पड़ा। 

भीमा कोरेगांव मुकदमे में जेल भेजे गये लगभग सभी अभियुक्तों को जेल का खतरनाक कोरोना काल भी देखना पड़ा, जब बाहर की मुलाकात और कोर्ट की आवाजाही सब रोक दी गयी थी। बेशक इस दौरान पूरा देश ही एक जेल बन गया था, लेकिन इस दौरान जेलें सबसे अधिक प्रभावित थीं, जहां ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ एक मज़ाक ही था। इसी कोरोना लॉकडाउन के समय आये अम्बेडकर जयंती के दिन आनन्द तेलतुम्बडे ने मुम्बई के एनआईए आफिस में अपनी गिरफ्तारी दी।

वे कोरोना की चपेट में भी आये। कोरोना से लड़ने के साथ उन्हें जेल प्रशासन से इसके इलाज के लिए भी लड़ना पड़ा। उन्होंने इस दौरान जेल प्रशासन की अमानवीयता के बारे में लिखा है, जिसे हम उनके सह अभियुक्त कवि वरवर राव और फादर स्टेन स्वामी के हवाले से भी सुन चुके हैं। सुधा भारद्वाज ने भी अपनी जेल डायरी में कोरोना काल में जेल प्रशासन  की अराजकता और अमानवीयता के बारे में विस्तार से लिखा है, जो अब हिन्दी में भी उपलब्ध है।

आनन्द तुलतुम्बडे के सरेण्डर से पहले उनके गोवा स्थित आवास पर एनआईए की रेड और उसके बाद चली कोर्ट की प्रक्रिया और एक दिन की गैरकानूनी गिरफ्तारी के संस्मरण भी उन्होंने इसमें लिखा है, जो कि भारत सरकार, भारतीय पुलिस व्यवस्था और न्याय व्यवस्था के पक्षपात की पोल खोलने वाला है। इस मुकदमे, कोर्ट की प्रक्रिया और पुलिस वालों के दांव-पेंच, जो कुछ भी 2018 से उनके साथ हुआ सब कुछ को उन्होंने किताब में लिखा है, जो कि किसी भी जेल डायरी का हिस्सा होती है। 

लेकिन एक मायने में यह डायरी बाकी जेल डायरियों से अलग है- इस डायरी में तेलतुम्बडे आज के समय के ढेर सारे ज़रूरी मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखते चलते हैं, जो कि काफी विचारोत्तेजक है। इस कारण भी यह किताब ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए। खासतौर पर मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद पर काफी विचारणीय टिप्पणियां उन्होंने की हैं। इस संस्मरण में उन्होंने कम्युनिस्टों और अम्बेडकरवादियों दोनों से संवाद करते हुए कहा है कि दोनों ही उन्हें अपना नहीं मानते। उन्होंने लिखा है कि किसी भी ‘वाद’ के दायरे के अन्दर अपने आप को कैद नहीं करना चाहते हैं। किताब में उन्होंने दुनिया भर की विकसित होती जेल व्यवस्था और कानून व्यवस्था और राष्ट्रवाद की प्रासंगिकता पर अपनी बात रखी है साथ ही यह संकेत भी दिया है कि राष्ट्रवाद पर उनकी किताब जल्द आने वाली है।

तेलतुम्बडे ने अपनी यह जेल डायरी अपने छोटे भाई मिलिंद तेलतुम्बडे को समर्पित की है, साथ ही उन पर एक अध्याय भी लिखा है, जो कि बेहद खास है। मिलिंद तेलतुम्बडे सीपीआई (माओवादी) के सेन्ट्रल कमेटी सदस्य थे। 14 नवम्बर, 2021 को मुठभेड़ में उनके मारे जाने की खबर आयी। आनन्द तेलतुम्बडे को यह खबर जेल की टीवी पर प्रसारित समाचार से मिली। यह उनके लिए बेहद गहन निराशा का क्षण था, आस-पास कोई उन्हें ढांढस देने वाला और कंधे पर हाथ रखने वाला भी नहीं था। अमानवीयता की हद है कि इस मौके पर भी कोर्ट से उन्हें मां से मिलने के लिए पेरोल नहीं मिली। इस घटना को याद करते हुए उन्होंने मिलिन्द तेलतुम्बडे के बचपन से लेकर बड़े होने और एक मजदूर नेता होने से अदृष्य क्रांतिकारी होने तक के सफर को बहुत प्यार से याद किया है।

उन्होंने लिखा है कि मिलिन्द उनसे 15 साल छोटे थे और पढ़ने में बहुत अच्छे थे। आनन्द अपनी सारी किताबें और पेन्सिल बॉक्स इसलिए संभालकर रखते थे कि मिलिन्द जब बड़े होंगे, तो ये उनके काम आयेंगी। लेकिन उन्हें निराश करते हुए मिलिन्द ने इण्टर के बाद आईटीआई के कोर्स में दाखिला ले लिया। फिर वे नौकरी के लिए चले गये और मजदूर यूनियन में काम करने लगे। वे बेहद लोकप्रिय और जुझारू मजदूर नेता बने। आनन्द लिखते हैं कि उनके पिता और मां को अपने सभी बच्चों में सबसे अधिक गर्व मिलिन्द पर ही था, बेशक मिलिन्द ने घर आना बन्द कर दिया था। खैरलांजी की घटना का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं कि घटना के बाद वे उस इलाके में इसकी फैक्ट फाइंडिंग के लिए जहां-जहां भी गये, उन्हें आन्दोलन के पीछे मिलिन्द का प्रयास होने की कहानियां सुनने को मिलती रहीं।

यह पढ़कर मुझे बहुत पहले पढ़ा गया एक रूसी उपन्यास ‘सुदूर का तारा’ याद आ गई, जिसमें हिटलर के खिलाफ सोवियत संघ के युद्ध के दौरान एक लड़का अपनी प्रियतमा को खोजने जहां-जहां भी जाता है, वहां उसे वह तो नहीं मिलती, लेकिन उसकी बहादुरी और प्यार की अनोखी कहानियां मिलती हैं। भाई मिलिन्द के बारे में लिखते हुए आनन्द उनके ‘मुठभेड़’ में मारे जाने पर सवाल भी खड़े करते हैं और मानवाधिकार संगठनों पर भी सवाल उठाते हैं कि उन्होंने अब ऐसी मुठभेड़ों पर आवाज उठाना बंद कर दिया है। 

आनन्द ने इसी डायरी में जाति व्यवस्था के खिलाफ अपनी मां की एक जुझारू लड़ाई के बारे में लिखा है और इस हवाले वे लिखते हैं कि सामंती ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले एक या दो लोग नहीं, जिन्हें याद किया जाता है, बल्कि सैकड़ों अनाम लोग भी थे। उनकी मां एक जुझारू महिला थीं, जो अन्याय और न्याय को अच्छी तरह समझती थीं।

इस जेल संस्मरण में फादर स्टेन स्वामी पर भी एक अध्याय है और उनकी मौत के एक साल होने पर लिखी गयी एक लम्बी कविता भी। स्टेन स्वामी कोविड से पीड़ित होने के बाद जब ‘होली फैमिली अस्पताल’ जा रहे थे, तो उसी समय कोर्ट में उनकी बेल पर बहस भी चल रही थी। उनकी मेडिकल कंडीशन को देखते हुए सभी को उम्मीद थी कि उन्हें जमानत मिल जायेगी, इसलिए आनन्द ने उन्हें अस्पताल के लिए विदा करते समय कहा- ‘अब कभी यहां मत आइयेगा’ तो उन्हें क्या पता था कि स्टेन अब उनसे कभी भी मिलेंगे ही नहीं। जबकि फादर स्टेन ने अपने आरोपों की तय सज़ा जोड़कर एक दिन तेलतुम्बडे से कहा था, कि वे 185 साल का जीवन जीयेंगे। उनके प्रति सरकार, एनआईए और कोर्ट की अमानवीयता का विस्तृत वर्णन उन्होंने किताब में किया है।

भीमा कोरेगांव केस में तेलतुम्बडे के सहअभियुक्त, उन सबमें सबसे युवा महेश राउत ने जेल में एक अनोखा सर्वे किया, जिसके आंकड़े विस्तार से किताब में दिये गये हैं। इसमें सबसे विचारोत्तेजक आंकड़े ‘पोक्सो’ केसेज के हैं। सर्वे में उन्होंने पाया कि पोक्सो मुकदमों में बन्द अधिकांश लोग दलित या अल्पसंख्यक हैं और युवा हैं। उसकी वजह मानवाधिकारकर्मियों और नारीवादियों के लिए आंख खोलने वाली हैं। उनका सर्वे यह खुलासा करता है कि ऐसे किशोर प्रेम के मामलों में जब लड़का दलित या अल्पसंख्यक है और लड़की सवर्ण और हिन्दू, तो परिवार और समाज की ‘इज्ज़त’ पर इसे गम्भीर चोट मानी जाती है।

ऐसे मामलों में अगर मामला सहमति का हो (जो कि ज्यादातर होता भी है), तो भी लड़की के परिजन अपने सामंती ‘अपमान’ का बदला लेने के लिए लड़के की ज़िंदगी बरबाद करने पर तुल जाते हैं। जबकि मामला यदि  उल्टा है, तो दलित या अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के परिजनों की बात पुलिस प्रशासन से लेकर कोर्ट तक में सुनी ही नहीं जाती, और आरोपी पर कोई मुकदमा दर्ज होता ही नहीं। तेलतुम्बडे ने इस पर लम्बी बात किताब में की है।

जैसा कि पहले भी बताया गया है कि किताब में अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद पर पढ़ने के लिए काफी कुछ है। उन्होंने किताब में उन अम्बेडकरवादियों की आलोचना की है, जो अपनी लड़ाई को दलित सम्मान की लड़ाई तक ले जाने की बजाय अम्बेडकर की मूर्ति स्थापना और उनकी जयंती मनाने और संविधानवाद तक अपने आप को सीमित रखते हैं। उनका कहना है कि ऐसे अम्बेडकरवादी ही अधिक हैं। उन्होंने इसका विश्लेषण भी किया है कि उनकी गिरफ्तारी के समय अम्बेडकरवादी क्यों चुप थे। उन्होंने इस सवाल को भी सम्बोधित किया है कि अम्बेडकरवादी बदलाव की राजनीति का हिस्सा क्यों नहीं बनते।

उनका कहना है कि ये वो अम्बेडकरवादी हैं, जो इस दमनकारी स्टेट का विरोध इसलिए नहीं करते क्योंकि यह उस संविधान से चलता है, जिसे अम्बेडकर ने बनाया था। इसलिए स्टेट के खिलाफ बात करने का मतलब अम्बेडकर के खिलाफ बात करना और काम करना है। इसलिए वे स्टेट के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा नहीं बनते। अम्बेडकरवादियों पर बहस कई अध्यायों में है, जो कि काफी विचारोत्तेजक है, जिसे अम्बेडकरवादियों को तो पढ़ना ही चाहिए उन्हें नकारने वालों को भी ज़रूर पढ़ना चाहिए। क्योंकि तेलतुम्बडे ने इसकी भी चर्चा किताब में की है कि अम्बेडकर और उनके कामों को किस तरह से देखा जाना चाहिए। वे अपने आप को न तो अम्बेडकर‘वादी’ कहते हैं, न ही मार्क्स‘वादी’। वे कहते हैं अम्बेडकर और मार्क्स ने भी अपने को इन सबसे मुक्त रखा और मार्क्स ने तो हर वैज्ञानिक दृष्टि के लिए अपने को खुला रखा। 

तेलतुम्बडे बताते हैं कि अम्बेडकर और कई सारे दलित समाज सुधारकों, योद्धाओं के बारे में उन्होंने अपने पिता और समाज से जाना। लेकिन उनकी वैचारिकी पर सबसे पहला असर जोसेफ स्टालिन का पड़ा, इसके बाद वे भगत सिंह से प्रभावित हुए, वे उनके हीरो थे।

जेल के पात्रों के बारे में लिखते हुए एक पुलिस वाले के बारे में रोचक बात लिखी है यह पुलिस का अधिकारी, जो कि भाजपा समर्थक भी था, ने एक दिन तेलतुम्बडे से कहा कि अगर वो अंग्रेजों के समय में होता तो वो भी भगत सिंह को गोली मार देता।

‘द सेल एण्ड द सोल’ का एक अध्याय राष्ट्रवाद पर है, जिसमें उन्होंने दिल्ली दंगों में उमर खालिद सहित जेल में बंद कई लोगों का जिक्र करते हुए लिखा है, कि भारत देशद्रोहियों से भरा देश है। उन्होंने इस क्रम में रोहित वेमुला को याद किया है। उन्होंने राष्ट्रवाद पर आंइस्टीन को कोट करते हुए लिखा है कि यह एक पुराने समय का विचार है, जो आज के सत्तालोभी नेताओं-पार्टियों का हथियार बन गया है। आज खुद राष्ट्रवाद को ही चैलेन्ज करने का समय है। 

किताब का एक अध्याय दुनिया भर में जेलों का एक अध्ययन है। जिसमें उन्होंने नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड, डेनमार्क जैसे लोकतान्त्रिक देशों की जेल व्यवस्था का जिक्र किया है, जो अपनी जेलें और कैदी कम करने की दिशा में अत्यधिक काम कर रहे हैं, जेलों को अधिक से अधिक सुधार केन्द्रित, मानसिक स्वास्थ्य केन्द्र के संस्थान और अधिक से अधिक पुनर्वासन केन्द्र के रूप में विकसित कर रहे हैं। ये देश ये मानते हैं कि अपराध लोकतान्त्रिक व्यवस्था की असफलता है। लेकिन भारत इन सबसे परे है, वह अपनी जेलों की संख्या के साथ अपने कैदी बढ़ाने की दिशा में और जेलों को ‘अपराध और उत्पीड़न केन्द्र बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो कि यहां के लोकतान्त्रिक व्यवस्था की गंभीर खामी है।

उन्होंने अपने सहअभियुक्तों को भी याद किया है, जो अपने गीतों से चुटकुलों से बातों से ‘सेल’ में ‘सोल’ को बनाये रखने में सहयोगी बने।

कुल मिलाकर इस किताब को सिर्फ जेल संस्मरण के रूप में नहीं, बल्कि दलित आन्दोलन को समझने, उसकी दिशा तय करने और वामपंथी आन्दोलन में अम्बेडकर को समझने के लिए भी इस किताब को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। इसके लिए इस किताब को जल्द ही हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित करना चाहिए।      

(सीमा आजाद यूपी पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव हैं।)      

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