बिना भुगतान महिला से काम: सामंती मूल्यों की आर्थिक संरचना

मीडिया के आर्थिक पन्नों पर छपी एक खबर के अनुसार 2024 में बिना भुगतान वाले काम में महिला हिस्सेदारी 84 प्रतिशत है।
ये गैर-भुगतान वाले काम कौन से हो सकते हैं? निश्चित ही सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू काम है जिसमें रसोई से लेकर पूरा घर संभालने, बड़े-बूढों और बच्चों का पालन-पोषण है। इसके अतिरिक्त ‘सहयोगी श्रमिक’ की भूमिका और कार्य के अनुपात में वेतन न मिलना भी इसका हिस्सा होता है। लेकिन, यहां खबर में मुख्य जोर घरेलू काम पर ही है।
उपरोक्त आंकड़ा सांख्यिकी और योजना कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा किये गये ‘टाइम यूज सर्वे’ से आया है। यह सर्वे भारतीयों द्वारा विभिन्न कार्यों, गतिविधियों में बिताए जा रहे समय का आकलन करता है और यह देखता है कि ऐसी गतिविधियां करने वाले का कोई भुगतान मिल रहा है या नहीं। यहां हम सामान्य अनुभव के आधार पर यह जानते हैं कि महिलाएं बिना भुगतान के घरों में काम करते हुए पूरी जिंदगी बिता देती है। ये वे घरेलू काम ही हैं जिनकी वजह से महिलायें वेतन भुगतान वाले काम में हिस्सेदारी नहीं कर पाती हैं। घरेलू काम के दबाव की वजह महिलाओं द्वारा कौशल हासिल करने वाली गतिविधियों में हिस्सेदारी भी कम होती जाती है। आमतौर पर परिवारों में श्रम के मूल्य के आधार पर पोषण और शिक्षा आदि के आधार पर लैंगिक भेदभाव को गहरे पैठे हुए देखा जा सकता है। एक लड़की को शिक्षित करना है या नहीं, यह उसके परिवार द्वारा तय किया जाने लगता है। लड़की के व्यस्क जीवन में उतरते ही उसे विवाह की सामाजिक परम्परा में एक दूसरे परिवार में घरेलू कामकाज की ओर ठेल दिया जाता है। यह सब कुछ एक ऐसी आर्थिक संरचना के भीतर चल रहे समाज में घट रहा होता है जिसमें लाभ-हानि का क्रूर आकलन निर्णायक होता है। घरेलू जीवन का सामंती मूल्यों की परिवरिश इन्हीं संरचनाओं के भीतर होती है।
उपरोक्त सर्वे बताता है कि मार्च, 2024 तक हासिल आंकड़ों में भुगतान योग्य कार्य हिस्सेदारी महज 20.5 प्रतिशत थी तो पुरूषों की 60.5 प्रतिशत। इस आंकड़े में गांव और शहर में कुछ चैंकाने वाले तथ्य दिखते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की भुगतान योग्य हिस्सेदारी 21.8 प्रतिशत है जबकि पुरूष की 60.1 प्रतिशत। शहर में यह क्रमशः 18.0 और 61.2 प्रतिशत है। सांख्यिकी बहुत सारे तथ्यों को साथ लेकर आती है। लेकिन, उन तथ्यों को अन्य संदर्भों के साथ मिलान करना भी जरूर होता है। भारत में बहुत सारे आंकड़े सरकार की ओर से या तो बनाये नहीं गये, या जारी नहीं किये गये या जारी किये आंकड़े विवादित रहे। फिर भी हम यहां कुछ अनुमान लगाने की ओर बढ़ सकते हैं। इसी सर्वे के हवाले से यह बताया गया है कि 15-19 वर्ष आयु वर्ग के युवा 2019 में घरेलू कार्यों के पूरा करने में 154 मिनट बिताते थे जो अब 164 मिनट हो गया है। इस औसत बढ़ोत्तरी को स्त्री और पुरूष द्वारा गैरभुगतान वाले कामों की हिस्सेदारी के सामने रखकर देखें तब इस महिलाओं के घरेलू जीवन में फंसते जाने का चित्र और साफ दिखाई देगा। इन आंकड़ों को लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट के पीरियोडिक रिपोर्ट के साथ भी रखकर देखा जाना चाहिए, जहां हाल ही के आंकड़े यह बताते हैं कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं की श्रम हिस्सेदारी घटी है।
टाइम यूज सर्वे का आंकड़े में गैर भुगतान वाले कार्य में महिलाओं की हिस्सेदारी गांव में 84.4 प्रतिशत है तो शहर में यह 82.8 प्रतिशत है। पुरूषों में यह प्रतिशत क्रमशः 47.4 और 42.4 प्रतिशत है। महिलाओं के संदर्भ में गांव और शहर के बीच गैर भुगतान वाले कार्य में उस तरह का फर्क नहीं दिखता है जैसा पुरूषों के संदर्भ में।
भारत के समाज में सामंती मूल्यों को आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि ये अतीत के अवशेष हैं। इसके लिए कई बार उन अनुभववादी तरीकों को इस्तेमाल किया जाता है जिससे सच छिपा रहे। शहर की चकाचौंध, चौड़ी सड़कें, गांव की संपन्नता और धर्म का बोलबाला के साथ-साथ उपभोग के सूचकांक भी इसमें बड़ी भूमिका अदा करते हैं। एक पूंजीवादी सामाजिक और आर्थिक संरचना में श्रम की हिस्सेदारी, उसका भुगतान, पूंजी निर्माण और उसकी गतिविधियां मुख्य धुरी होती हैं। भारत में इसकी संरचना कुछ अलग ही तरह की है। अमेरीका और यूरोप के देशों, यहां तक कि चीन और कोरिया तक में महिलाओं द्वारा श्रम में हिस्सेदारी का पैटर्न वैसा नहीं है जैसा भारत में है। यहां महिलाओं पर घरेलू काम का दबाव और गैर भुगतान वाले काम की ओर ठेलने की प्रवृत्ति हमेशा से बनी रही है। लेकिन, पिछले दस सालों में जिस तरह की आर्थिक और सांस्कृतिक नीतियां अपनाई गई हैं, जिस तरह की राजनीतिक को बढ़ावा दिया गया है और सामाजिक विभाजनों पर जोर दिया गया है उसकी सबसे अधिक शिकार महिलाएं हैं। उपरोक्त आंकड़े यही दिखा रहे हैं। हम इन्हीं आंकड़ों पुरूषों द्वारा कुल गैरभुगतान वाले कार्यों की हिस्सेदारी भी देख सकते हैं जो 45.8 प्रतिशत है। यह आंकड़ा भी पुरूषों के उस घरेलू जीवन में हिस्सेदारी को दिखाता है जहां कोई भुगतान नहीं है। यह हमारे समाज में परिवार और उस पर पड़ने वाले दबावों को दिखा रहा है। जो बेहद चिंताजनक है, खासकर उनके लिए जो एक प्रगतिशील समाज की उम्मीद कर रहे हैं। यहां गति उल्टी दिशा में दिख रही है।

Leave a Reply