‘जीएसटी बचत उत्सव’ बनाम ‘लूटोत्सव’

22 सितम्बर, 2025 को देश में जीएसटी रिफॉर्म लागू किया गया और इसे “न्यू जेनरेशन जीएसटी रिफॉर्म” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस रिफॉर्म को लाल किले के प्राचीर से लेकर 21 सितंबर, 2025 को राष्ट्र के नाम संबोधन कर इसे जनता के सामने पेश किया। भाजपा और केंद्र-राज्य सरकारें (भाजपा शासित) इसे ‘जीएसटी बचत उत्सव’ पखवाड़ा (22-29 सितंबर) के रूप में मना रही है। सभी भाजपा सांसदों और मंत्रियों को आदेश दिए गए हैं कि वे सड़कों और बाजारों में जाकर दुकानदारों और लोगों से संपर्क करें। यदि जीएसटी रिफॉर्म ‘बचत उत्सव’ है, तो क्या 1 जुलाई, 2017 से अब तक देश में ‘लूटोत्सव’ चल रहा था? आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि जीएसटी के नाम पर जनता की मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा सरकार और पूंजीपतियों द्वारा लिया गया।

1 जुलाई, 2017 से अगस्त 2025 तक 128 लाख करोड़ रुपये जीएसटी से एकत्र किए गए हैं। वित्तीय वर्ष 2018-19 में 11.78 लाख करोड़ रुपये एकत्र हुए, वहीं 2024-25 में यह राशि बढ़कर 22.08 लाख करोड़ रुपये हो गई। यानी छह साल में जीएसटी का संग्रह लगभग दोगुना हो गया। यह वृद्धि गरीबों से अप्रत्यक्ष रूप से वसूली के माध्यम से प्राप्त की गई है।

ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट बताती है कि जीएसटी संग्रह में 64.3 प्रतिशत हिस्सा देश के गरीब 50 प्रतिशत लोगों से आता है, जबकि अमीर 10 प्रतिशत लोग केवल 3-4 प्रतिशत योगदान करते हैं। मध्यम वर्ग (40 प्रतिशत लोग) लगभग 33 प्रतिशत योगदान देता है। भारत में 1 प्रतिशत लोगों के पास 40.6 प्रतिशत संपत्ति है, 10 प्रतिशत अमीरों के पास 72 प्रतिशत और गरीब 50 प्रतिशत लोगों के पास केवल 3 प्रतिशत संपत्ति है। इसका मतलब है कि कम संपत्ति वाले ही जीएसटी का बड़ा हिस्सा देते हैं, जबकि संपन्न वर्ग का योगदान बहुत कम है। यही कारण है कि पूंजीपतियों की संपत्ति रॉकेट की गति से बढ़ रही है। 2022 में भारत के सबसे धनी व्यक्ति की आय में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो ऑक्सफेम की रिपोर्ट द्वारा भी पुष्टि की गई है।

लोकसभा में वित्त मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, कुल जीएसटी संग्रह में 18 प्रतिशत स्लैब का योगदान लगभग 75 प्रतिशत है। इस स्लैब में हेयर ऑयल, टूथपेस्ट, आइसक्रीम, पास्ता, रेस्टोरेंट में खाने, और 100 रुपये से कम की सिनेमा टिकट जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं शामिल हैं। इसलिए विपक्ष के नेता इसे “गब्बर सिंह टैक्स” कहते हैं। लेकिन यह तुलना भी पूरी तरह सही नहीं है, जीएसटी का असली मतलब है: “गरीबों से लो, अमीरों को दो”– यानी ‘लूटोत्सव’।

जीएसटी लागू होने के बाद की स्थिति

30 जून, 2017 की मध्यरात्रि (1 जुलाई, 2017 से) जीएसटी लागू हुआ। उस समय सरकार ने बड़े दावे किए थे कि यह देश और आम जनता के लिए लाभकारी होगा। 15 प्रकार के केंद्र और राज्य करों को हटाकर एक गुड्स और सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लाया जाएगा। कहा गया कि यह टैक्स एक बार ही लगेगा और किसी राज्य में बिक्री पर अलग से टैक्स नहीं लगेगा, जिस वस्तु पर जीएसटी स्लैब कम है वो वस्तु सस्ती हो जायेगी।

लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद इसका उल्टा हुआ। पूंजीपतियों ने सभी करों को जोड़कर वस्तुओं के मैक्सिमम रिटेल प्राइस (एमआरपी) को बेस मानकर उस पर जीएसटी लागू किया, या वस्तुओं का वजन घटा दिया। इसके परिणामस्वरूप महंगाई बेतहाशा बढ़ गई। उदाहरण के लिए:

  • 60 हजार रुपये की टू-व्हीलर की कीमत 1,20,000 रुपये हो गई।
  • 15 हजार रुपये का रेफ्रिजरेटर 25 हजार रुपये का हो गया।
  • 80-90 रुपये प्रति लीटर बिकने वाला फर्च्यून ऑयल 170-180 रुपये प्रति लीटर हो गया।
  • लॉकडाउन के समय सबसे ज्यादा बिकने वाला 2 रुपये का परले जी बिस्कुट पैकेट अब 5 रुपये में बिक रहा है।

इस तरह बड़े पूंजीपतियों का खजाना रॉकेट की गति से बढ़ा और आम जनता त्राहिमाम करती रही।

स्लैब में कमी के बावजूद जनता को राहत नहीं

जीएसटी स्लैब में कमी के बाद भी आम जनता की रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम कम नहीं हुए। लेकिन गोरखपुर के सांसद दावा कर रहे हैं कि 100 रुपये का समान अब 40-45 रुपये में मिल रहा है। यह आम जनता के साथ माननीयों का भद्दा मजाक है।

स्लैब संशोधन से पहले कंपनियों ने वस्तुओं के दाम बढ़ा दिए थे, जैसा 2017 में हुआ था। 22 सितंबर, 2025 की नवभारत टाइम्स रिपोर्ट के अनुसार, घी के दाम 30 रुपये प्रति किलो बढ़ गए, टूथपेस्ट 75 रुपये से 90 रुपये हो गया। इसी तरह अदानी की सिमेंट कंपनियों ने 30-40 रुपये प्रति बोरी की वृद्धि की। पुराने स्टॉक पुराने दामों पर बिक रहे हैं, जबकि नए स्टॉक महंगे हैं। खिलौना कारोबारी राजीव बत्रा ने कहा कि थोड़ी राहत है, लेकिन टेंशन ज्यादा है, क्योंकि अगर किसी खिलौने पर म्यूजिक हॉर्न लगा हो तो अब उस पर 12 प्रतिशत की जगह 18 प्रतिशत जीएसटी लगेगा, जिससे ऐसे म्यूजिक वाले खिलौने महंगे हो जाएंगे।

2017 में भी इसी तरह जीएसटी को लेकर काफी भ्रम था, और आज जब स्लैब में बदलाव हुआ है, तब भी कन्फ्यूजन बरकरार है। छोटे दुकानदार और व्यापारी परेशान हैं; उन्हें आज भी पुराने रेट पर समान मिल रहा है और वे बेच रहे हैं, जबकि सरकार धुंआधार प्रचार कर रही है कि समान सस्ता हो गया है।

1 जुलाई, 2017 से 13 जुलाई, 2022 तक पांच सालों में जीएसटी के अलग-अलग टैक्सों में 907 बार संशोधन किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार ने बिना तैयारी के जीएसटी लागू किया और पूंजीपतियों के लाभ के अनुसार इसमें परिवर्तन किया।

संघीय ढांचे और राज्यों की स्वतंत्रता पर प्रभाव

जीएसटी लागू होते ही राज्यों की स्वतंत्र कर लगाने की शक्ति लगभग समाप्त हो गई। अब सभी कर निर्णय जीएसटी काउंसिल में लिए जाते हैं, जिसमें केंद्र सरकार का दबदबा अधिक है। इससे संघीय ढांचे में राज्यों की स्वायत्तता पर गंभीर आघात पहुँचा है। गैर भाजपा शासित राज्यों ने पैसे रोके जाने की शिकायतें भी की हैं।

नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री रहते हुए जीएसटी का विरोध करते रहे, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद इसे आधी रात्री में लागू किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन मामलों में भी माहिर हैं जहाँ वे असफल होते हैं; ऐसी असफलताओं का वे अलग-अलग तरह से गुणगान करते हैं, जैसा कि नोटबंदी या कोविड के दौरान अचानक लॉकडाउन लगाने के निर्णय में देखा जा सकता है। इसी तरह, जीएसटी के तहत गरीबों की वसूली और विपक्ष के मतों को दबाने के लिए वे अपनी असफलताओं को ‘उत्सव’ के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।

मोदी सरकार दावा करती है कि स्लैब घटने से लोगों को 2 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई। लेकिन यह नहीं बताती कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में जीएसटी से प्राप्ति 11.78 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 6 वित्तीय वर्षों में 22.08 लाख करोड़ रुपये कैसे हो गई? पूंजीपतियों की संपत्ति रॉकेट की गति से कैसे बढ़ी? साल में एक पूंजीपति की सम्पत्ति में 46 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कैसे हुई? आम जनता की रोजमर्रा की वस्तुओं का दाम क्यों नहीं कम हुआ? जीएसटी को पूरी तरह हटाकर उद्योगपतियों पर डायरेक्ट टैक्स क्यों नहीं लगाया गया?—ये सवाल खुले हैं।

इस प्रकार, आम जनता के लिए यह ‘बचत उत्सव’ नहीं, बल्कि ‘लूटोत्सव’ साबित हुआ है।

(सुनील कुमार लेखक और पत्रकार हैं।)

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