जब नेता सच बोलने लगें और पत्रकार चुप हों
आज हालात ऐसे हैं कि प्रशांत किशोर जैसे लोग वह काम कर रहे हैं, जो असल में पत्रकारों को करना चाहिए था और वह काम था-जनता के बीच जाना, सच बताना, सत्ता से सवाल करना और भ्रष्टाचार उजागर करना। यह दरअसल प्रशांत किशोर की सफलता से कहीं ज़्यादा पत्रकारिता की नाकामी का नतीजा है।
पत्रकार क्यों पीछे हटे?
पहले पत्रकार सरकार और जनता के बीच सच का पुल थे। अब टीवी बहस, राजनीतिक झुकाव और कॉर्पोरेट दबाव ने उन्हें कमज़ोर कर दिया है। वे जमीनी रिपोर्टिंग छोड़कर स्टूडियो की बहसों में बंद हो गए हैं।
मीडिया और सत्ता की दोस्ती
कई मीडिया घराने नेताओं और बड़े उद्योगपतियों के नियंत्रण में हैं। इसलिए असली सवाल, असली रिपोर्ट और असली भ्रष्टाचार पर चुप्पी छा गई है।
भ्रष्टाचार अब पत्रकार नहीं, दूसरे खोल रहे हैं
ताज़ा समय में कई बड़े भ्रष्टाचार मामले पत्रकारों ने नहीं, बल्कि कोर्ट में दाखिल केसों, सरकारी एजेंसियों की रिपोर्टों, राजनीतिक अंदरूनी टकराव, या कुछ साहसी व्यक्तियों के ज़रिए सामने आए हैं।
पत्रकार सिर्फ बाद में उन ख़बरों को पढ़ देते हैं, लेकिन खुलासा नहीं करते।
प्रशांत किशोर खुले मंचों पर एक बेहद ज़रूरी सवाल पूछते हैं:
“बिना कारोबार किए नेता करोड़ों की संपत्ति कैसे बना लेते हैं?” ऐसा सवाल टीवी पत्रकार अब नहीं उठाते।
ज़मीन छोड़ चुके पत्रकार, ज़मीन पर उतरे रणनीतिकार
पहले रिपोर्टर गाँव, कस्बों और संकटग्रस्त इलाक़ों में जाते थे। आज उनमें से बहुत से सोशल मीडिया और बयानबाज़ी तक सीमित हो गए हैं। यही वह खाली जगह है, जिसे प्रशांत किशोर ने भर दिया है।
भरभराता जनता का भरोसा
लोग अब टीवी बहसों और अख़बारों पर पहले जैसा भरोसा नहीं करते। उन्हें लगता है कि सच कोई और बता रहा है, पत्रकार नहीं।
सबसे बड़ा खतरा: आदत पड़ जाना
अगर पत्रकारिता ऐसे ही चुप और डरपोक बनी रही, तो लोग सच जानने के लिए नेताओं, यूट्यूबरों और रणनीतिकारों पर निर्भर हो जाएंगे। यह लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक संकेत है।ऐसे में पत्रकारिता को बचाने के लिए ज़रूरी है:
ज़मीन से रिपोर्टिंग
सत्ता से सवाल
आर्थिक और संपादकीय स्वतंत्रता
भ्रष्टाचार पर खुली पड़ताल
डर और दबाव से आज़ादी
कुल मिलाकर प्रशांत किशोर का उभार कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि पत्रकारिता की हार का प्रमाण है। सवाल यह नहीं है कि वह क्यों बोल रहे हैं, सवाल यह है कि पत्रकारों के कैमरे, कम्प्यूटर और कलम चुप क्यों हैं ?
(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)