2025 का ‘SIR’ बनाम 2003 का ‘गहन पुनरीक्षण’- वो सब जो इस बार अभूतपूर्व है

चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 के बाद जब से बिहार में SIR का नोटिफिकेशन जारी किया है, तब से प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या सुप्रीम कोर्ट सभी जगह आयोग दुहाई देता रहा है कि इस तरह का रिवीजन साल 2003 में भी हुआ था। 

लेकिन, जब एक RTI में चुनाव आयोग से 2002-2003 में हुए ‘गहन पुनरीक्षण’(Intensive Revision) के आदेश की कॉपी मांगी गई तो उपलब्ध नहीं कहकर मना कर दिया गया।

जबकि चुनाव आयोग ने SIR 2025 को 2003 में हुए रिवीजन के उदाहरण से उसे न्यायसंगत ठहराने की कोशिश की, आयोग ने 22 साल पुराने अपने आदेश को हर तरह से छुपाने की कोशिश की। आज भी 2003 का वह आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। 

2003 IR बनाम 2025 SIR:

नागरिकता की जांच: SIR 2025 के नोटिफिकेशन जारी होने के बाद से इस प्रक्रिया के जरिए नागरिकता की जांच करना एक अहम मुद्दा रहा है, जबकि 2003 में यह एन्यूमरेटर (BLO) का काम नहीं था; केवल उम्र और निवास की जांच ही एन्यूमरेटर करता था। 

चुनाव आयोग की ‘2003 की गहन संशोधन रूल बुक’ 62-पृष्ठ दस्तावेज़ का पैरा 32 यह स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता निर्धारित करना एन्यूमरेटर (गणनाकर्ता/BLO) का काम नहीं है” 

उस समय नागरिकता की जांच के लिए केवल दो अपवाद थे। 

(i) पहला, पहली बार पंजीकरण कराने वाले मतदाताओं के मामले में, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) यदि आवश्यक समझे तो नागरिकता के प्रश्न का उत्तर देने के लिए दस्तावेज़ माँग सकता था।

(ii) दूसरा, राज्य सरकार द्वारा चिह्नित विदेशी नागरिकों की पर्याप्त संख्या वाले क्षेत्रों में, 2002-03 के दिशा-निर्देशों में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय निर्धारित किए गए थे। इन क्षेत्रों के मौजूदा मतदाताओं को नागरिकता साबित करने की आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, गणना कर्ता नए नाम तभी जोड़ सकते थे, जब वे पहले से ही मतदाता सूची में शामिल परिवारों से संबंधित हों या उनके पास EPIC हो। अन्य सभी आवेदकों को अलग से आवेदन करना होता था। नए मामलों में, ईआरओ प्रासंगिक कानूनों के तहत नागरिकता का सत्यापन करने, निष्पक्ष सुनवाई करने और विभिन्न दस्तावेजों – पासपोर्ट, जन्म या नागरिकता प्रमाण पत्र, एनआरसी प्रविष्टियों पर विचार करने के लिए जिम्मेदार था।

जबकि SIR में नागरिकता साबित करने का दायित्व केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है, जो पहली बार शामिल होने के लिए आवेदन कर रहा है। यह उन सभी पर लागू है, जो 2003 की सूची में नाम होने के कारण छूट प्राप्त नहीं हैं।

2003 में EPIC स्वीकार किया गया 

2003 के रिवीजन के दौरान EPIC कार्ड मौजूदा मतदाताओं की पहचान और सत्यापन का मुख्य आधार था। 

जबकि SIR 2025 में दो दशक बाद, बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) 2025 में आयोग ने EPIC कार्ड को पात्रता के प्रमाण के रूप में मान्यता नहीं दी। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया था कि मौजूदा मतदाता EPIC प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन आयोग ने इसे अस्वीकार किया।

मतदाताओं पर बोझ 

2003 में वोटर रिवीजन की  पूरी जिम्मेदारी एन्यूमरेटर पर थी; मतदाता को फॉर्म भरने या सख्त समय-सीमा का सामना नहीं करना पड़ता था, जबकि SIR 2025 में मतदाता को दस्तावेज़ जुटाने के लिए दबाव झेलना पड़ा।

वहीं 2003 रूल बुक के पैरा 66 में कहा गया है:- 

नागरिकता सिद्ध करने का दायित्व उस आवेदक पर होगा, जो मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए ‘पहली बार’ आवेदन करता है, न कि प्रत्येक मतदाता पर – जैसा कि एसआईआर 2025 में किया गया है।

एसआईआर 2025 ने सभी के लिए दस्तावेज़ जमा करना अनिवार्य कर दिया, जिससे ज़िम्मेदारी हर मतदाता पर आ गई। इससे पहले चुनाव आयोग ने 2003 में केवल असाधारण मामलों में ही दस्तावेज़ मांगे थे। 

जिसमें 4 प्रकार के दस्तावेज़ स्वीकार किए गए थे:

  1. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)
  2. नागरिकता प्रमाण पत्र
  3. पासपोर्ट
  4. जन्म प्रमाण पत्र

मतलब, केवल उन्हीं मतदाताओं से दस्तावेज़ मांगे जाते थे जिनकी पात्रता या विवरण में कोई शंका होती थी। आम मतदाताओं को दस्तावेज़ जमा करने की जरूरत नहीं थी।

(प्रत्यक्ष मिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)

इनसे [email protected] मेल पर संपर्क किया जा सकता है।  

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