मायावती की लखनऊ रैली में विपक्ष पर हमला, सत्ता पर मेहरबानी

मान्यवर कांशीराम की 19वीं पुण्यतीथि पर लखनऊ में बसपा द्वारा आयोजित विशाल रैली के बारे में दावा किया जा रहा है कि मायावती और बसपा भारतीय राजनीति के क्षितिज पर अब भी पहले जितनी ही मजबूती से मौजूद हैं।

बसपा के कई नेता मीडिया को बयान देते हुए दिख रहे हैं कि बहन मायावती का जादू अब भी बरकरार है। जो खबरें चल रही हैं उससे साफ पता चल रहा है कि इस रैली में लाखों लोग भागीदारी के लिए पहुंचे और लाखों रास्तों में रह गये हैं। खबरों में बताया जा रहा है कि लखनऊ शहर यातायात के मामले में ठहर सा गया है।

अनुमान है कि भागीदारों की संख्या 10 लाख के आसपास है जिसमें से 5 लाख के लगभग सभा स्थल तक पहुंच गये हैं। आजकल की हो रही विशाल रैलियों, खासकर प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों की तुलना में यह रैली निश्चित ही एक अलग तरह का मुकाम पेश करती है। इस रैली में भागीदारों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो दलित राजनीति को लेकर उत्सुक है और इसे दुबारा सत्ता में वापसी की उम्मीद बांधे हुए है।

उम्मीद करने के लिए जरूरी है जिनसे उम्मीद कर रहे हैं उसका सच क्या है! मायावती ने अपने भाषण के शुरूआती हिस्से में योगी सरकार की तारीफ और सपा, अखिलेश यादव पर करारा हमला किया। इसी हिस्से का मूल तत्व उनके पूरे भाषण में बना रहा जिसमें कांग्रेस पर हमलावर होती रहीं। केंद्र में भाजपा सरकार की आलोचना उसकी तारीफों के साथ हुई।


मायावती की इस रैली में उनके भाषण का मुख्य तेवर सपा पर तीखा हमला करना, उन्हें दोगला या दोहरा चरित्र वाली राजनीति करने वाला बताना, इसके सामानान्तर योगी सरकार की तारीफ करना ही रहा। भाषण का यह शुरुआती हिस्सा मायावती की बसपा की आगामी राजनीति की दिशा तय करने वाला है। यह साफ है कि आने वाले समय में वह उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी करने जा रही हैं। यह भी साफ है कि वह सपा या कांग्रेस या इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर इस प्रदेश की राजनीति में कुछ नया करने नहीं जा रही हैं।

यहां समस्या यही है कि प्रदेश में योगी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार से यदि वह इतना संतुष्ट हैं तब उन्हें वैकल्पिक राजनीति की ओर जाना ही क्यों हैं? यदि उनका काम एक चिठ्ठी लिख दिए जाने से पूरा हो जा रहा है तब इतनी बड़ी रैली को आयोजित करने के पीछे उनकी मंशा क्या है? क्या उन्होंने यह रैली इसलिए आयोजित किया जिससे कि अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को आगाह कर सकें उन्हें सपा के साथ नहीं जाना है, कांग्रेस के साथ नहीं जाना है? उनके भाषण का तेवर इसी तरह इशारा कर रहा है।

यह हैरानी की बात है कि सपा के राज के समय ‘गुंडों, माफियाओं और अराजक तत्वों’ के बढ़ावा मिलने का उल्लेख करते हुए बीसियों साल पुराने कांग्रेस राज की जातिवादी और संकीर्ण सोच की राजनीति को वह अपने श्रोताओं को याद दिला रही थीं। लेकिन, वह वर्तमान में उत्तर-प्रदेश में आये दिन हो रहे दंगों, हत्याओं, एनकाउंटर और राजनीतिक दमन को वह रेखांकित करने से बच निकलीं। उन्होंने यह भी कहा कि आई लव यू की राजनीति या किसी धर्म की राजनीति नहीं होनी चाहिए। लेकिन, धर्म की राजनीति में सत्ता पक्ष की पक्षधरता पर एक शब्द भी खर्च नहीं किया।


मायावती ने एक फिर बाबा साहेब आंबेडकर को भारत रत्न दिये जाने के विवाद को, जो इसी साल के शुरूआती महीनों में भाजपा द्वारा हवा दिया गया था, लखनऊ की इस रैली में उठाया। उन्होंने कांग्रेस पर प्रहार करते हुए कहा कि इस पार्टी ने बाबा साहेब को भारत रत्न नहीं दिया, मान्यवर कांशीराम के देहान्त पर राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया। उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि जो लोग बाबा साहेब के संविधान को हाथ में लेकर, उसे दिखाकर नाटक कर रहे हैं उनसे सावधान रहना चाहिए।

मायावती यह बताना भूल गई कि केंद्र की भाजपा सरकार ने संविधान से संबंधित कई ऐसे संसोधन, अधिनियम आदि पेश किये जिस पर या तो न्यायपालिका ने उसे असंवैधानिक बताया और उसकी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाये। साथ ही इस सरकार के निर्णयों पर सर्वाधिक बार कांस्टीच्यूशनल बेंच को बैठना पड़ा है और उस पर उसने निर्णय सुनाया है।
ऐसे में यह जरूर देखना चाहिए कि मायावती के भाषण का सारतत्व क्या है? क्या यह रैली सत्ता पक्ष के लिए किया गया था? सपा, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के खिलाफ किया गया था? या यह मान्यवर कांशीराम की राजनीतिक अवधारणा ‘सत्ता की कुंजी’ हासिल करने के लिए किया गया था?
इन सवालों का हल ढूंढ़ते समय यह ध्यान मंे रखना होगा कि उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में एक और प्रभावी स्वर चंद्रशेखर ने भी सपा, कांग्रेस के साथ जाने से इंकार कर दिया था। इसी तरह से जाट राजनीति की परम्परा में आने वाले जयंत चौधरी ने भाजपा के साथ जाने का रास्ता चुना। पूर्वांचल में राजभर और निषाद समूहों से जुड़ी पार्टियों ने भी भाजपा के साथ जाने का निर्णय लिया।

उत्तर प्रदेश की जातिवार वर्गीकरण में सवर्ण, दलित और मुस्लिम क्रमशः 20 प्रतिशत हैं। जो कुल 60 प्रतिशत बनते हैं। बाकी 40 प्रतिशत के लगभग ओबीसी हैं। सवर्णों में ब्राम्हण लगभग 10 प्रतिशत हैं जबकि दलित समुदाय में जाटव 12 प्रतिशत हैं। उत्तर प्रदेश में जातियों की जटिल संरचना, क्षेत्रिय स्तर पर उनकी बहुंसख्या वोट की राजनीति को और भी जटिल बना देती है।

1980-90 के दशक के बीच चले कांग्रेस विरोधी और इसके बाद सपा विरोधी राजनीति में धर्म और दलित राजनीति ने एक बड़ी भूमिका निभाई। इसने उत्तर प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक तानेबाने को और भी उलझा दिया। उत्तर प्रदेश की आर्थिक संरचना को लेकर बड़े बड़े दावे किये गये लेकिन आज भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। आज भी कानपुर, नोएडा, हापुड़ और मेरठ ही थोड़े बहुत आर्थिक गतिविधियों के केंद्र हैं जो उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवकों को नौकरी देने में असमर्थ हैं।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार, केंद्र के सक्रिय सहयोग से धर्मोइकोनाॅमिक्स पर जोर देने में लगी हुई है और धर्म आधारित प्रोजेक्ट पर काफी काम चल रहा है। इससे इस प्रदेश के लोगों को कितना आर्थिक लाभ मिल रहा है, उसका कोई विवरण अभी तक सामने नहीं आया है। लेकिन, जिस तेजी से सांस्कृतिक विघटन हुआ है उसके कई रूप अब सामने आने लगे हैं। एनकाउंटर, बुलडोजर, नफरती भाषण, दंगे और धार्मिक स्थलों पर हमला अब एक सामान्य सी बात हो गई।

लखनऊ रैली में मायावती का भाषण न तो दलित राजनीति में आये संकट के बारे में बात करता है और न ही उत्तर प्रदेश की मौजूदा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का कोई जिक्र करता है। यह इस प्रदेश के सांस्कृतिक संकट और विघटन के बारे में चुप है। मायावती इस बात से खुश है कि उनके बनाये पार्क की मूर्तियां और स्थल इसे देखने आने वालों के टिकटों की आय से सुरक्षित हैं। उनका भाषण इस मूर्तिपूजन की आत्ममुग्धता से भरा हुआ था। उनके भाषण में राजनीतिक सत्ता हासिल करने का जो पहले तेवर हुआ करता था, इस बार गायब था। उन्होंने जितनी प्रखरता से वर्तमान सत्ता का गुणगान किया, उससे तो यही लगता है कि हाथी गणेश बन लड्डू खाने की लालसा से भर गया है।

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