हिंदी की दुनिया में जितनी चर्चा एक चित्रकार के बतौर अशोक भौमिक की होती रही है उतनी शायद ही किसी की हो। संभवतः इसका कारण उनकी हिंदी साहित्य की दुनिया में सक्रियता, भारत के श्रेष्ठतम चित्रकारों को हिंदी में प्रस्तुति और हिंदी समाज की प्रगतिशील आंदोलनों के साथ अपने चित्रों के साथ पक्षधर भूमिका निभाना रहा है। लेकिन, उनकी जितनी चर्चा हिंदी की दुनिया में होनी चाहिए थी, वह अब भी उम्मीदों से कम है।

इस दिशा में, धूमीमल गैलरी की ओर से अशोक भौमिक की कला-यात्रा के 50 साल पर बीकानेर हाउस में उनके आरम्भिक चित्रों, रेखांकनों, पोस्टरों से लेकर आज तक की पेंटिग्स की प्रदर्शनी का आयोजन किया। यह प्रदर्शनी 3 अक्टूबर से 15 अक्टूबर, 2025 तक है। यह प्रदर्शनी ‘लिमिनल लाइन्स: अशोक भौमिक के 50 साल’ शीर्षक से प्रदर्शित है। इसकी साज-सज्जा प्रो. राजन श्रीपद फुलारी ने किया है।

इस प्रदर्शनी में उनकी आरम्भिक चित्रकला, जो काले और सफेद रंग में है, जिंदगी को देखने और उसे कैनवास पर उतारने की परिप्रेक्ष्य का उद्घाटन है। पेन से हैचिंग पद्धति के आधार पर ‘मां’ (1979) का चित्रण मैक्सिम गोर्की के मां उपन्यास का एक सार संकलन बनकर उभरा है। चित्त प्रसाद के चित्रों में रोशनी अपनी जगह बनाते हुए अवरोधों के बीच से मनुष्यों को गढ़ती है। अशोक भौमिक ने अपने इस चित्र में रोशनी को ही मां के रूप में पेश किया है। यहां यह कहना उपयुक्त होगा कि चित्त प्रसाद अशोक भौमिक के पसंदीदा चित्रकारों में सर्वोपरि हैं। काले और सफेद की श्रृंखला में उनकी बनाई गई 1998 की एक और पेंटिंग में दर्पण के प्रतिबिंबन में रोशनी से बनती हुई आभा का चित्रण है।

1994 में बनाई गई उनकी ‘सिटी स्पेस’ पुराने लखनऊ शहर की याद दिला देता है। उनके बाद के चित्रों में लखनऊ का रंग पतंगों की उड़ान, मेहराब और ताखों में जलते हुए लालटेन अक्सर अभिव्यक्त होते रहे हैं। 2005 में बनाई गई उनकी ‘बार्डर’ में यह शहर एक त्रासदी में बदलता हुआ दिखता है। इसी वर्ष में बनाई गई ‘सुनामी बर्ड्स’ इस त्रासदी के आर्तस्वर में बदल गई है।

2012 में उन्होंने ‘कोलमाईनर्स एण्ड द कैनरी’ की श्रृंखला को बनाया। इस चित्र प्रदर्शनी में इस श्रृंखला के तीन चित्र हैं। श्रम करने वाले शरीर का सौष्ठव और जीवन चलाने की जद्दोजहद, लालटेन की रोशनी में बैठी हुई उम्मीद कैनवास की पृष्ठभूमि में लाल रंग पर जिस तरह उभरकर आया है उसे देखने के लिए आप बरबस ही ठहर जाएंगे। ‘भूमा’ श्रृंखला के चित्रों में से एक में चिंतन की भंगिमा शानदार है।

अशोक भौमिक के चित्रों में आपातकाल के दौरान बनाए गये चित्रों की श्रृंखला देखने योग्य है। इसमें इंदिरा गांधी की छवि प्रतीकात्मक रूप लिए हुए हैं जिसमें उस समय की विभीषिका को देखा जा सकता है। अशोक भौमिक के चित्रों और इंस्टालेशन में बैलों के चित्रण पर बात किये बिना अधूरा रहेगा। भारतीय परम्परा में बैल श्रम, जीवंतता और गति का प्रतीक रहा है। हालांकि आने वाले समय में, जब खेती घाटे का सौदा बन गई तब ज़रूर ही इसे मुहावरों में ठहराव के तौर पर देखा जाने लगा। नवउदारवाद के दौर में खेतों से न सिर्फ बैल नदारद हो गये उसके साथ ही आसमान में असीम उड़ान भरने वाले गिद्ध भी लुप्त होने की ओर बढ़ गये। अशोक भौमिक ‘बैल और चिड़िया’ श्रृंखला में बैल के साथ चिड़िया को भी साथ ले आते हैं। श्रम, बल और स्वप्न को संयोजित करने वाले चित्र एक अलग ही कथा कहते हैं।

इस प्रदर्शन में लगभग 200 चित्र प्रदर्शित हैं। इन चित्रों में उनके वे चित्र भी शामिल हैं जिनमें वह रूप का अवलोकन करते हुए उसे पन्नों पर रेखाओं की भाषा दे रहे थे। नीलाभ की कविताओं पर बनाए गये पोस्टर देखने लायक हैं जिसकी परम्परा आज कमजोर पड़ी है।
अशोक भौमिक के चित्रकला की यह यात्रा अपने समय के साथ होने वाले संवाद की तरह दिखाई देती है। आज जब कई सारी अतीत में शुरू हुई यात्राओं के पचास साल, सौ साल पूरे हो रहे हैं और उनके इस पड़ाव में निराशा, हताशा की लहरें उठ रही हैं, जब प्रगति की उम्मीद बांधे हुए लोग बदहवास हो दाएं या बाएं हो रहे हैं, …..ऐसे समय में अशोक भौमिक की इस चित्रकला यात्रा प्रदर्शनी को ज़रूर देखना चाहिए और अपने समय के साथ संवाद करने के उनके तरीकों से रूबरू होना चाहिए। आप इस कला यात्रा को देखते हुए सिर्फ उनकी विशिष्ट शैली और चित्रों की पद्धतियों को ही नहीं देखेंगे, उनकी छवियों में उस समय के प्रकाश और अंधेरों को भी देखेंगे और चटख रंगों में आप उनकी आकांक्षा और उम्मीदों को भी देखेंगे। आप उन्हें देखते हुए अपने साथ कुछ रंग लेकर लौटेंगे।
(अंजनी कुमार लेखक और पत्रकार हैं।)