भारत के मध्यकाल का आरम्भ बड़ी संख्या में सामंत राजाओं के उत्थान और पश्चिमोत्तर से कबीलों के युद्ध सरदारों के उद्भव और उनके आक्रमणों से शुरू होता है। इस काल में बड़े पैमाने पर मूर्तियों से सजी हुई मंदिरों की संख्या में तेज बढ़ोत्तरी होती है। पश्चिमोत्तर से आने वाले युद्ध सरदार अपने साथ एक नये तरह का स्थापत्य, जिस पर मुख्यतः ईरानी असर के साथ है लेकर आये। हालांकि भारत में उनकी बनवाई हुई इस काल की मस्जिदें अपने स्थापत्य में बहुत आरम्भिक स्तर की लगती हैं।
भारत की जमीन पर इन दो परम्पराओं का इन युद्धों से इतर सूफी और संत परम्परा के सम्मिलन में होता है। वैष्णव, शैव, शाक्त और बौद्ध परम्पराएं सामंत राजाओं के दरबारों से निकलकर जन के बीच जा रही थीं। यही स्थिति सूफियों की थी। वे दरबारी जिंदगी चुनने की बजाय वे अपनी रिहाईश वीरान स्थलों या आम जनों के आसपास रहने को तरजीह दे रहे थे। ये दोनों परम्पराएं आडम्बरपूर्ण, विलासिता का जीवन त्यागकर आध्यात्मिक जीवन की तलाश में लग गये जहां ईश्वर की शक्ति से बड़ा कोई नहीं हो और बराबरी ही मुख्य स्वर हो।
हाल ही के दिनों में एक ऐसे ही सूफी संत ख्वाजा खिज्र से परिचय हुआ। उनके बारे में बहुत जानकारी नहीं मिलती है।

उनका मकबरा सोनीपत के जटवारा गांव में है जिसे बनवाने का श्रेय इब्राहिम लोधी का जाता है, जिसका निर्माण 1522-24 के दौरान किया गया। इब्राहिम लोधी 1526 में पानीपत के युद्ध में, जो यहां अधिक दूर नहीं है, बाबर से लड़ते हुए मारे गये। उनकी मौत के बाद भारत में मुगल काल की नींव पड़ी। विकीपिडिया में ख्वाजा खिज्र को दरया खान का बेटा बताया गया है जो बलोच थे और सिंध में गवर्नर थे। सिंध में जाम फिरोज का शासन था। यहां यह बताना जरूरी है कि सिंध में सूफियों की दरियापंथी शाखा का उद्भव हुआ जिसमें नदी पूजन की परम्परा थी। यह नदी सिंधु नदी है जिस पर भारत में दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता हड़प्पा-मोहनजोदड़ो/ सिंधु सभ्यता पैदा हुई। यह मेसोपोटामिया की सभ्यता के समकालीन थी जो खुद भी एक नदी के किनारे विकसित हुई। इस प्राचीन परम्परा में संगीत, नृत्य और दीप का जलाना मुख्य पक्ष था।
सिंध प्रांत में पूजन की यह परम्परा परवर्ती काल में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही संस्कृतियों में अभिव्यक्त हुआ। सिंध प्रांत सुफी परम्परा का एक प्रमुख स्थल भी रहा है। (अधिक विस्तार के लिए एम,एल, भाटिया के लेख ‘ख्वाजा खिज्र और मध्यकालीन सिंध में नदी पंथ’ को देखें, स्रोत: ‘सूफीवाद और भक्ति आंदोलन, शाश्वत प्रासंगिकता’ मानक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित)। कहा जाता है कि खिज्र खान ने राजशाही की जिंदगी का त्याग कर दिया और सूफी जिंदगी का रास्ता चुना। वह कब सोनीपत आये इस बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिलती, लेकिन वह लोकप्रिय थे और साथ ही सल्तनतों और मुगल शासकों के बीच खास स्थान रखते थे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

दिल्ली से महज 50 किमी दूर खिज्र खान का यह मकबरा सोनीपत के जटवारा गांव, बस अड्डे से लगभग 3 किमी दूर स्थित है। हालांकि इस जगह तक पहुंचने में गूगल मैप ने हमारे साथ सांप-सीढ़ी का खेल खेला। इस मामले में स्थानीय लोगों से पूछकर वहां पहुंचना बेहद आसान है। भारतीय पुरातत्व विभाग, चंडीगढ़ द्वारा संरक्षित यह मकबरा एकबारगी अपनी ओर आपको खींचेगा। आप उससे जितना ही रूबरू होइए, आप अपने इतिहास के उन पन्नों को खुलते हुए पांएगे जिसमें इंडो-परसियन स्थापत्य को एकाकार होते हुए देखेंगे। इसका स्थापत्य दिल्ली में स्थित लोधी काल के स्थापत्य से अलग दिखता है। यह मकबरा मुगल काल के दौरान विकसित होने वाली स्थापत्य की भूमिका की तरह है।
यह मकबरा चौकोर और एक विशाल, ऊंचे चबूतरे पर स्थित है जिसके ऊपर लाल बलुआ पत्थर, सफेद संगमरमर और कंकड़ों से बने ब्लाॅक का प्रयोग करते एक विशाल गुम्बद, जो एक दूसरे के ऊपर रखते हुए ज्यामितीय संरचना में इसे बनाया गया है। ऐसा लगता है कि मकबरा का निर्माण द्विस्तरीय है जो बाद के समय में मुगलकाल में मुख्य परम्परा ही बन गया। खिज्र खान के साथ एक और मकबरा है और दो छोटे मकबरे भी हैं। मुख्य संरचना के बाहर दो और मकबरे हैं जिसके बारे में कहा जाता है एक घोड़े का है और दूसरा उसके मालिक की है। उसी से सटे हुए एक छोटी सी कन्नाती मस्जिद है। इस स्मारक के पश्चिम में एक बड़ा सा तालाब है जिसकी सीढ़ियाँ मकबरे से उतरते हुए दिखती हैं। इस समय तालाब और स्मारक के बीच काफी मिट्टी पट गई है और पक्की दीवाल बनाकर इस तालाब को छोटा कर दिया गया है। इस स्मारक की जमीन पर पश्चिम की ओर से काफी अतिक्रमण होता हुआ दिख रहा है जिससे इसकी मूल संरचना अब थोड़ी अलग सी दिख रही है।

इस स्मारक के गेट पर लाल बलुआ पत्थरों पर उकेरे गये कमल के फूल, पत्तियों के तोरण, कलश, ताखा शानदार हैं। इसकी नक्काशियों की संरचना की अभिव्यक्ति अकबर द्वारा बनवाये गये फतेहपुर सीकरी के किले के कुछ भवनों में हुआ। यह मूलतः राजस्थानी परम्परा थी जो धीरे-धीरेे पूरे उत्तर भारत के भवन निर्माण का हिस्सा बन गई। कंकड़ ब्लाॅक, सीधी कटान वाले पत्थर और लाल बलुए की नक्काशीदार पत्थरों के पीलर पर एक ऊंचा आधार बनाया गया है जिस पर गुम्बद का निर्माण किया गया है। यह लोधी काल के बने स्मारकों के गुम्बद से थोड़ा भिन्न है। खासकर, इसका बनाया गया शीर्ष/छतरी अपने पूर्ववर्ती काल से भिन्न है और जिसे हम हुमायूं के मकबरे और ताजमहल में और अधिक विकसित रूप में हम देख सकते हैं।
इस मकबरे की पूरी संरचना इस जगह पर लोगों की सक्रिय उपस्थिति को बताती है। इससे सटे हुए जटवारा गांव का होना भी इसे यह सिद्ध करता है कि यहां लोगों का आना जाना काफी था। संभव है कि यहां सराय रही हो। घोड़े और घुड़सवार के कब्र का होना, संभव है सराय के रखवार या ऐसी ही किसी परम्परा को याद दिलाने के लिए बनाई गई हो।

हम लोग 16 अक्टूबर, 2025 को वहां पहुंचे थे। यह वृहस्पतिवार का दिन था। इस दिन आमतौर पर पीरों के मजार पर मेला और मजमा लगता है। गीत गाये जाते हैं। लेकिन, इस दिन भी वहां सन्नाटा था। कुछ लोग जरूर वहां आ जा रहे थे। किसी ने यहां अंदर दो दिये जला रखे थे। एक व्यक्ति वहां ध्यान की मुद्रा लगाकर वहां थोड़ी देर रहे और फिर चले गये। ‘द ट्रिब्यून’ के लिए अल्का रजा ने 30 जून, 2024 में इस स्मारक के लिए लेख लिखा है।
वह इस स्थल को भक्ति और सूफी आंदोलन के एकत्व की तरह देखती हैं। वह अपने लेख में बताती है कि ‘‘मै जनवरी 2019 में जटवारा में सोनीपत के इस ऐतिहासिक स्थल की खोज में आई थी जहां सदियों पुराने पेड़ थे। 500 साल पुराना यह मकबरा घने बाग, जिसके एक ओर तालाब और साथ में ‘ऐतिहासिक पेड़’ थे।’’ अपनी जून की यात्रों बारे में बताती हैं कि उस समय 45 डिग्री तापमान में भी लोग मन्नत मांगने, फूल चढ़ाने, दीप जलाने और दुआ मांगने वालों की कमी नहीं थी। महज साल भर बाद जब हम इस जगह पर पहुंचे हैं तब उनके द्वारा वर्णित पक्ष दिखाई नहीं दे रहा था। ऐतिहासिक पेड़ों का अस्तित्व फिलहाल नहीं दिख रहा था। तालाब को भी पाटकर काफी छोटा कर दिया गया है। इसके किनारे कूड़े से पटे पड़े हैं।
एक ऐतिहासिक स्थल सिर्फ अपने इतिहास की वजह से ही महत्वपूर्ण नहीं है, यह अपनी उपस्थिति से आज के दौर के साथ जीवंत संवाद करने की स्थिति में है। यह स्थल अपनी संरचना में भी आज भी पूरी तरह से प्रासंगिक है। एक विशाल बाग, एक स्मारक, तालाब और खाली जगह आज की धूल भरी, संकरी गलियों, सड़कों और भवन निर्माणों से बाहर एक सांस लेने की जगह उपलब्ध कराती है। यह पानी के संरक्षण की संरचना उपलब्ध कराती है। और, साथ ही स्थापत्य का पाठ प्रस्तुत करती है। इस जगह की भौतिक उपस्थिति को बचाये रखना आज के शहरी समाज के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना इतिहास को संरक्षित करने की दिशा में काम करने वालों के लिए। यह हमारे इतिहास और स्थापत्य का एक खुला हुआ पन्ना है जिसे पढ़ने की जरूरत है।
(अंजनी कुमार लेखक और पत्रकार हैं। पुरातत्व पर उनका विशेष काम है।)