भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) – लिबरेशन के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने माना कि सीटों की सीमित संख्या और गठबंधन की बाध्यताओं के कारण उनकी सूची में असंतुलन है और वह कई योग्य साथियों को अवसर नहीं दे सके हैं लेकिन उन्होंने उम्मीद जताई है कि सभी साथी और मित्र इस परिस्थिति को समझेंगे और इस निर्णायक चुनावी संघर्ष में हमारे सभी प्रत्याशियों को भरपूर समर्थन देंगे।
भट्टाचार्य ने जारी वक्तव्य में कहा कि उनके कई कार्यकर्ता और शुभचिंतक उम्मीद कर रहे थे कि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की प्रत्याशियों की सूची कुछ लंबी होगी — जिसमें कुछ और जिलों से कुछ और साथियों के नाम शामिल होंगे। ऐसा संभव नहीं हो सका, लेकिन उन्हें खुशी है कि इस बार हमने कुछ और पार्टियों की भागीदारी के साथ एक थोड़ा बड़ा गठबंधन सुनिश्चित करने में सफलता पाई है।
उन्होंने कहा, “हमने पहले ही तय कर लिया था कि किसी भी सीट पर ‘मित्रवत मुकाबला’ नहीं होगा। हमारी ओर से, केवल बीस सीटों की सीमित संख्या के बावजूद, हमने इस सिद्धांत का पूरी तरह पालन किया है। हमें आशा है कि कांग्रेस, राजद और अन्य पार्टियां, जो अभी ‘मित्रवत मुकाबले’ की स्थिति में हैं, वे अपने सीट-बंटवारे के मुद्दे सुलझा लेंगी और नामांकन वापसी की अंतिम तिथि तक पूर्ण एकता सुनिश्चित करेंगी।
उन्होंने कहा कि उनकी सूची में निश्चित रूप से कई असंतुलन हैं, और अनेक योग्य साथियों को अवसर नहीं दिया जा सका है। स्थानीय स्तर की आकांक्षाओं और प्रतिनिधित्व के व्यापक प्रश्न के बीच संतुलन बनाना बहुत कठिन होता है — खासकर जब सीटों की संख्या सीमित हो और गठबंधन की बाध्यताएं हों। उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि हमारे सभी साथी और मित्र इस परिस्थिति को समझेंगे और इस निर्णायक चुनावी संघर्ष में हमारे सभी प्रत्याशियों को भरपूर समर्थन देंगे।”
*चुनाव सामूहिक जन संघर्ष का एक रूप है* — जिसमें एक व्यक्ति उम्मीदवार बनता तो है, पर उसकी सफलता सैकड़ों कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत, एकजुट प्रयास और हजारों नागरिकों के सद्भाव, समर्थन तथा लाखों मतदाताओं की भागीदारी से ही संभव होती है। और _हमारे जैसे कम्युनिस्ट दल के लिए हर संघर्ष सत्ता द्वारा दमन और उत्पीड़न के जोखिम के साथ आता है — चुनाव तो विशेष रूप से ऐसा ही एक क्षेत्र है।_
उदाहरण के तौर पर गोपालगंज के भोरे (अनुसूचित जाति) क्षेत्र को लें — हमारे प्रस्तावित प्रत्याशी *कॉमरेड जितेन्द्र पासवान* को नामांकन दाखिल करने के बाद ही हिरासत में ले लिया गया, और हमें कॉमरेड धनंजय (पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष) को उनका स्थानापन्न बनाना पड़ा ताकि वे भोरे में राजनीतिक प्रतिशोध, राज्य दमन और सामंती-सांप्रदायिक हिंसा के सभी पीड़ितों की ओर से न्याय की इस लड़ाई को आगे बढ़ा सकें।
साल 1995 में इस सीट से हमारे पहले प्रत्याशी *कॉमरेड उमेश पासवान* थे — जिन्होंने करीब 16,000 वोट हासिल किए और तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन दो साल बाद वे शहीद हो गए।
साल 2020 में कॉमरेड जितेन्द्र ने 70,000 से अधिक वोट प्राप्त किए, परंतु लगभग 400 वोटों के मामूली अंतर से हार गए। चुनाव के तुरंत बाद उन पर झूठा मुकदमा दर्ज किया गया, और भोजपुर के अगिआंव (अनुसूचित जाति) से 2020 में निर्वाचित हमारे विधायक *कॉमरेड मनोज मंजिल* की तरह ही, उन्हें भी दोषसिद्धि की स्थिति में चुनावी अयोग्यता का खतरा है।
उन्होंने कहा कि भाकपा माले का चुनाव अभियान केवल सीट-बंटवारे या चुनावी गणित का मामला नहीं है — यह दमन का मुकाबला करने और असमान संघर्ष के बीच लगातार रुकावटों को पार करने की लड़ाई है।