दिल्ली की क्लाउड सीडिंग योजना को वायु प्रदूषण के एक साहसिक समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। हकीकत में, यह विज्ञान के गलत इस्तेमाल और नैतिकता की अनदेखी का एक जीवंत उदाहरण है।
सर्दियों में दिल्ली की हवा खराब क्यों हो जाती है?
पूरे उत्तर भारत में, वायु गुणवत्ता साल भर खराब रहती है, लेकिन मानसून के बाद और सर्दियों के महीनों में यह चरम स्तर पर पहुँच जाती है। मानसून के विदा होने के बाद, उत्तर-पश्चिम से आने वाली महाद्वीपीय शुष्क हवाएं इस क्षेत्र पर ठहर जाती हैं। हवा का बहाव कमजोर पड़ जाता है और वह स्थिर हो जाती है, जिससे हवा में घुला प्रदूषण भी यहीं ठहर जाता है।
ठंडी हवा में निरपेक्ष जलवाष्प कम होती है। गर्म हवा के ऊपर उठने से बादल बनते हैं, लेकिन इन महीनों में हवा की ठंडक और मौजूद स्थिर, उच्च-दाब प्रणालियाँ बादलों के बनने की इस प्रक्रिया को रोक देती हैं। आकाश धुंधला दिख सकता है, लेकिन यह धुंध फंसे हुए प्रदूषण से आती है, न कि वर्षा लाने वाले बादलों से। बारिश केवल हवा से नहीं आती है। इसके लिए जलवाष्प की जरूरत होती है।
ज़्यादातर अत्यधिक प्रदूषित इन ठंडे महीनों में, वातावरण इतना शुष्क और स्थिर होता है कि पर्याप्त वर्षा नहीं हो पाती। इन महीनों में कभी-कभार बारिश होती है, लेकिन ये संक्षिप्त दौर आमतौर पर पश्चिमी विक्षोभों के कारण होते हैं। यानि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली मौसम प्रणालियाँ, जो उस क्षेत्र से नमी ला सकती हैं या हमारे पड़ोसी समुद्रों से नमी खींचने वाली स्थानीय प्रणालियों के साथ मिल कर बारिश करती हैं। इन घटनाओं का कुछ दिन पहले पूर्वानुमान लगाया जा सकता है, लेकिन ये उत्तर भारत के लिए वर्षा का विश्वसनीय या स्थायी स्रोत नहीं हो सकता है।
क्या क्लाउड सीडिंग से मदद मिलती है?
क्लाउड सीडिंग प्राकृतिक बादलों पर निर्भर होती है; यह उन्हें बना नहीं सकती। और जब बादल होते भी हैं, तब भी, सीडिंग से वर्षा में विश्वसनीय वृद्धि होती हो, इस बात के प्रमाण कमज़ोर भी हैं और विवादास्पद भी। जब कभी बारिश होती है और प्रदूषण कम होता भी है, तो यह राहत ज़्यादा से ज़्यादा अस्थायी होती है। अभी तक का प्रमाण तो यह है कि प्रदूषण का स्तर एक या दो दिन में फिर से बढ़ जाता है।
वायु प्रदूषण की समस्या सिर्फ़ दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। पूरे उत्तर भारत में वायु गुणवत्ता साल भर खतरनाक रूप से खराब रहती है। फिर भी, सार्वजनिक बहसों में अक्सर धुंध को एक मौसमी उपद्रव मान लिया जाता है, जबकि प्रदूषण को सामान्य परिघटना मान लिया जाता है और जब यह असहनीय स्तर पर पहुंच जाता है तभी इस पर ध्यान दिया जाता है । दरअसल, क्लाउड सीडिंग, स्मॉग टावरों जैसे ही अवैज्ञानिक विचारों की शृंखला में एक और नौटंकी मात्र है। गंभीर, संरचनात्मक समाधानों की जगह पर दिखावटी तिकड़में कोई विकल्प नहीं हो सकती हैं।
क्लाउड सीडिंग के जोखिम क्या हैं?
वायु प्रदूषण को ठीक करने के लिए शॉर्टकट अपनाने का प्रलोभन तो समझ में आ रहा है, लेकिन यह गहन नैतिक प्रश्न उठाता है कि विज्ञान का उपयोग कैसे किया जाए, कौन से जोखिम उचित हैं, और जब चीजें गलत हो जाएं तो जिम्मेदारी किसकी होगी।
हलांकि क्लाउड सीडिंग बेहद कमजोर वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित है, फिर भी, अगर इसके पीछे का विज्ञान मज़बूत भी होता, तो भी यह नैतिक नहीं है। इसमें संघनन को प्रेरित करने के लिए सिल्वर आयोडाइड या सोडियम क्लोराइड जैसे यौगिकों का बादलों में छिड़काव किया जाता है। सिल्वर आयोडाइड क्लाउड सीडिंग के लिए कारगर है क्योंकि इसकी क्रिस्टल संरचना बर्फ से बहुत मिलती-जुलती है, इसलिए बादलों में मौजूद पानी की बूंदें इन क्रिस्टलों पर जमने लगती हैं।
ये नए बने बर्फ के क्रिस्टल फिर भारी हो जाते हैं और बारिश या बर्फ के रूप में नीचे गिरते हैं। हालाँकि कम मात्रा में इसे आम तौर पर कम जोखिम वाला माना जाता है, लेकिन बार-बार इस्तेमाल से मिट्टी और जल निकायों में इन रसायनों का जमाव हो सकता है। कृषि, पारिस्थितिक तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों को अभी तक ठीक से समझा नहीं गया है।
इन पर्यावरणीय जोखिमों से परे, जवाबदेही का सवाल भी है। अगर क्लाउड सीडिंग के साथ-साथ भारी बारिश हो जाए जिससे बाढ़ आ जाए, जिससे बुनियादी ढांचे, फसलों और आजीविका को नुकसान हो, या जान-माल का नुकसान हो, तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा? भले ही बारिश और बाढ़ का सीडिंग से कोई संबंध न हो, फिर भी जनता की धारणा दोनों को जोड़ सकती है, जिससे विज्ञान और शासन, दोनों में विश्वास कम हो सकता है।
हवा को आखिर ‘ठीक’ कैसे किया सकता है?
विज्ञान ने बहुत पहले ही उत्तर भारत की खतरनाक हवा का असली कारण पहचान लिया है। वाहनों का धुंआ, उद्योगों, निर्माण, बिजली संयंत्रों और अपशिष्ट पदार्थों के जलाने तथा इस मौसम में पराली की आग से होने वाले उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण का अभाव ही इस समस्या का मूल कारण है। ठंड के महीनों में प्रतिकूल मौसमी प्रभाव के कारण यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
इस समस्या के समाधान भी उतने ही स्पष्ट हैं, लेकिन इन्हें बड़े पैमाने पर कभी लागू नहीं किया गया। प्रदूषण के स्रोतों को कम करने वाले ये समाधान हैं: स्वच्छ परिवहन, टिकाऊ ऊर्जा, बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन और शहरी नियोजन। फिर भी, इन प्राथमिकताओं को मजबूत नहीं किया जा रहा है।
बल्कि विज्ञान की दुनिया का एक हिस्सा, जिसमें चुनिंदा शोधकर्ता, सलाहकार और संस्थान शामिल हैं, एक महंगे तमाशे को विश्वसनीय बताने में लगा हुआ है, जबकि इस तमाशे से संकट की जड़ जस की तस बनी रहेगी। ये लोग फौरी समाधानों का भ्रम फैलाने में अपने अधिकारों का दुरुपयोग करके न केवल दुर्लभ सार्वजनिक संसाधनों को बर्बाद करने जा रहे हैं, बल्कि वैज्ञानिक समाधानों की विश्वसनीयता पर भी संकट खड़ा कर रहै हैं, और साथ ही पूरी व्यवस्था में किये जाने वाले ऐसे जरूरी परिवर्तन, जो वास्तविक बदलाव ला सकते हैं, उनसे ध्यान भटका रहे हैं।
दिल्ली या शेष उत्तर भारत की हवा को फरेब पर आधारित तिकड़मी जुगाड़ों से साफ़ नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, ज़मीनी स्तर पर साहस की ज़रूरत है: प्रदूषण की जड़ों पर प्रहार करने और न्यायसंगत, साक्ष्य-आधारित कार्रवाई करने की जरूरत है। इसकी जगह पर की जा रही कोई भी फौरी कार्रवाई न केवल गलत वैज्ञानिक नजरिये से पैदा हो रही है, बल्कि यह एक नैतिक विफलता भी है। पूरे वर्ष स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान पर आधारित जरूरी बुनियादी कामों में बहुत धैर्य की जरूरत होती है, और वे अक्सर बहुत बोरियत भरे होते हैं और आकर्षक नहीं दिखते हैं, लेकिन समाधान उन्हीं से निकलेगा। क्लाउड सीडिंग ऐसे ही जरूरी कामों से ध्यान भटकाने की एक और कवायद है।
(प्रस्तुति : शैलेश)
(24.10.2025 के ‘द हिंदू’ में शहजाद गनी और कृष्ण अच्युत राव के लेख पर)