हाल के वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में चीन ने अभूतपूर्व प्रगति की है। इससे यह प्रश्न उठता है कि उन्नत पूँजीवादी देशों के बजाय, चीन ही दुनिया की एकमात्र ‘हरित महाशक्ति’ क्यों बनकर उभरा है?
दरअसल, इसका मूल कारण यह है कि चीन की अर्थव्यवस्था इस तरह से काम करती है कि राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएँ पूँजी के निरंतर विस्तार की चाहत से नहीं, बल्कि लोगों की ज़रूरतों और आकांक्षाओं से निर्धारित होती हैं।
दूसरी ओर, पूंजीवादी देशों में शक्ति संतुलन ऐसा है कि अपेक्षाकृत प्रगतिशील सरकारों को भी पूंजी के अल्पकालिक हितों के लिए जनसंख्या के दीर्घकालिक हितों की बलि देनी पड़ती है।
नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, ट्रांसमिशन सिस्टम, बैटरियों आदि में व्यवस्थित निवेश के परिणामस्वरूप, चीन आर्थिक विकास और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बीच के संबंध को सार्थक रूप से तोड़ने वाला पहला देश बन गया है।
जहाँ पश्चिमी सरकारें जलवायु परिवर्तन पर निष्क्रियता को इस आधार पर उचित ठहराती हैं कि इससे आर्थिक विकास को नुकसान होगा, वहीं चीन पहला देश है जिसने हरित परिवर्तन को आर्थिक विकास की एक शक्तिशाली चालक शक्ति बना दिया है, जिससे चीनी लोगों की आधुनिकीकरण की तात्कालिक ज़रूरतें भी पूरी की जा रही हैं और पृथ्वी को इंसानों के रहने योग्य ग्रह बनाये रखने की दीर्घकालिक ज़रूरतें भी पूरी की जा रही हैं।
चीन की प्रगति का वैश्विक स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला है। चीनी नवाचारों और उन पर आधारित बड़े पैमाने के आर्थिक निवेशों के परिणामस्वरूप, लागत में वैश्विक कमी आयी है, जिससे दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सौर और पवन ऊर्जा अब जीवाश्म ईंधन की तुलना में अधिक सस्ती हो गयी है।
उन्नत पूंजीवादी देशों में, जहां राजनीतिक सत्ता पर क्षयग्रस्त पूंजीपति वर्ग का प्रभुत्व है, वहां के लोग चीन का उदाहरण देकर अपनी सरकारों और शासक वर्गों पर व्यापक दबाव बना सकते हैं कि वे धरती को नष्ट करना बंद करें, और पर्यावरणीय मुद्दों पर चीन के साथ समझदारीपूर्ण सहयोग को प्रोत्साहित करें।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस कांग्रेस में भी घोषणा की है कि हम पर्यावरण की कीमत पर कभी भी आर्थिक विकास की कोशिश नहीं करेंगे।
पश्चिम में एक प्रचलित पूर्वाग्रह के तहत चीन पर एक जलवायु अपराधी का ठप्पा लगाया जाता है। बताया जाता है कि चीन दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक है और वह एक ऐसा देश है जो कोयले से चलने वाले बिजलीघरों का निर्माण जारी रखे हुए है। यह अफवाह समाजवादी शासन को पर्यावरण संरक्षण के विरुद्ध मानने की व्यापक धारणा से जुड़ी हुई है।
लेकिन सच्चाई यह है कि प्रदूषण से निपटने, जैव विविधता की रक्षा करने तथा स्वच्छ ऊर्जा विकसित करने में पिछले दो दशकों में चीन की उल्लेखनीय प्रगति के कारण पश्चिम की यह कहानी बिखरने लगी है।
चीन ने हाल ही में अपने ऊर्जा परिवर्तन में एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया है। उसकी संचयी स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 1 टेरावाट से अधिक हो गयी है, जो कुल वैश्विक क्षमता का 45 प्रतिशत है जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ से बहुत आगे है।
सितंबर में संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने घोषणा की थी कि चीन 2035 तक कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य तरह के प्रदूषण में कम से कम 7 से 10 प्रतिशत की कटौती करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह पहली बार हुआ है कि चीन ने पेरिस समझौते के तहत अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के हिस्से के रूप में उत्सर्जन को कम करने के लिए एक ठोस लक्ष्य निर्धारित किया है।
विश्वसनीय साक्ष्य बताते हैं कि चीन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती का अपना लक्ष्य वादे से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर चुका है।
2013 से चीन की सौर ऊर्जा स्थापित क्षमता में 180 गुना वृद्धि हुई है, जबकि पवन ऊर्जा क्षमता में छह गुना वृद्धि हुई है।
वैश्विक हरित प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखला में चीन सबसे आगे है, तथा सौर मॉड्यूल, सौर सेल के वेफर्स और बैटरी घटकों का बड़ा हिस्सा उत्पादित करता है।
स्वच्छ ऊर्जा के उदय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण चीन के कुल ऊर्जा उत्पादन में कोयला आधारित उत्पादन की हिस्सेदारी में लगातार गिरावट है। 21वीं सदी की शुरुआत में, चीन की लगभग 80 प्रतिशत बिजली कोयले से उत्पन्न होती थी; अब यह लगभग 50 प्रतिशत रह गयी है और इसके हिस्से में लगातार गिरावट हो रही है।
हालाँकि नये कोयला संयंत्रों का निर्माण भी जारी है, लेकिन या तो ये पुराने संयंत्रों को प्रतिस्थापित करने वाले संयंत्र हैं, जो ज्यादा उन्नत और कुशल तथा कम प्रदूषण पैदा करने वाले हैं या नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर करने के लिए बैकअप क्षमता के रूप में काम करने वाले संयंत्र हैं।
चीन दुनिया की दो-तिहाई इलेक्ट्रिक कारों और 95 प्रतिशत से ज़्यादा इलेक्ट्रिक बसों का उत्पादन करता है। दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में चीन के पास हाई-स्पीड रेल की कुल दूरी सबसे ज़्यादा है।
स्वच्छ तकनीक के नवाचार में चीन दुनिया में काफ़ी आगे है। वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा पेटेंटों में से 75 प्रतिशत पेटेंट उसके पास हैं, जो सदी की शुरुआत में सिर्फ़ 5 प्रतिशत था।
वनरोपण के मामले में चीन एक बार फिर विश्व में अग्रणी है, जहां 1980 के दशक में वनों का क्षेत्रफल लगभग 12 प्रतिशत था, जो आज दोगुना होकर 24 प्रतिशत से अधिक हो गया है।
संक्षेप में, चीन एक पारिस्थितिकी अनुकूल सभ्यता के अपने व्यापक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। चीन मानवता और प्रकृति के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व की दिशा में संतुलित और सतत विकास को बढ़ावा दे रहा है।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शब्दों में, “मानव जाति अब प्रकृति की बार-बार की चेतावनियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती और संरक्षण में निवेश किये बिना संसाधनों का दोहन करने, संरक्षण की कीमत पर विकास करने और बिना पुनर्नवीकरण के संसाधनों का दोहन करने के घिसे-पिटे रास्ते पर नहीं चल सकती।”
आज दुनिया भर के पर्यावरणविद जलवायु संकट से निपटने के लिए चीन को एक आदर्श के रूप में देख रहे हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अवर महासचिव एरिक सोलहेम, चीन को “हरित क्षेत्र के लिए अपरिहार्य देश” बताते हैं।
पूंजीवाद की विफलता
विज्ञान की यह बात स्पष्ट और व्यापक रूप से स्वीकृत है कि मानव औद्योगिक गतिविधि, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के जलने से, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ गयी है।
इसके कारण पृथ्वी के वायुमंडल में अधिक ऊष्मा फंस गयी है, जिसके कारण वैश्विक तापमान बढ़ता जा रहा है और अत्यधिक गंभीर मौसम परिवर्तन की घटनाएँ बार-बार घटित होने लगी हैं, जैसे समुद्र का जल स्तर बढ़ना, जंगल की आग, फसलों का चौपट हो जाना, घातक लू, जैव विविधता का ह्रास, महामारियाँ और पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव।
ग्रीनहाउस गैसों का संकेंद्रण बढ़ता ही रहेगा, और इससे जुड़ी पारिस्थितिकी की समस्याएँ और भी बदतर होती जाएँगी, जब तक कि हम अपनी ऊर्जा खपत को असाधारण रूप से कम नहीं कर लेते या पूरी तरह से ऊर्जा के गैर-उत्सर्जक रूपों को नहीं अपना लेते। मानवता की समग्र ऊर्जा खपत को कम करने का विचार स्पष्ट रूप से ऐसे वैश्विक संदर्भ में संभव नहीं है जहाँ अरबों लोगों को अपनी विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिक ऊर्जा की खपत करनी पड़ती है।
माल्थस की अवधारणा थी कि उन्नत देशों को अपने आधुनिकीकरण के बाद वह सीढ़ी तोड़ देनी चाहिए और वैश्विक दक्षिण को विकास के अधिकार से वंचित कर दिया जाना चाहिए। हमें उन्नत पूंजीवादी देशों के अनुकूल विकास की इस परिकल्पना को दृढ़ता से खारिज करना होगा।
इस प्रकार जलवायु विघटन को रोकने के लिए एकमात्र यथार्थवादी विकल्प हरित ऊर्जा के लिए एक बड़े पैमाने पर वैश्विक परिवर्तन करना है। वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों को छोड़े बिना और पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचाए बिना मानवता की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना होगा।
1990 के दशक की शुरुआत से ही इस सवाल पर वैश्विक सहमति रही है, फिर भी उन्नत पूंजीवादी देशों में इस दिशा में प्रगति आश्चर्यजनक रूप से सीमित रही है। दरअसल, ये देश जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी जारी रखते हैं, तेल और गैस के लिए ड्रिलिंग का विस्तार जारी रखते हैं, और निश्चित रूप से पारिस्थितिकी के लिहाज से विनाशकारी सैन्य गतिविधियों में संलग्न हैं।
जहाँ तक वे अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के आंकड़े दिखाते हैं, यह अपने उद्योंगों को मुख्यतः चीन जैसे वैश्विक दक्षिण के देशों में स्थानांतरित करके हासिल करते हैं, न कि वास्तव में उत्सर्जन कम करके। जबकि चीन खुद में उद्योग की बजाय एक विनिर्माण महाशक्ति है, जो उसका विकास मॉडल भी है।
आर्थिक मानवविज्ञानी जेसन हिकेल लिखते हैं कि जलवायु के मामले में “पिछली आधी सदी निष्क्रियता के मील के पत्थरों से भरी पड़ी है… उत्सर्जन में कमी की योजनाओं पर बातचीत के लिए 1995 से हर साल अंतर्राष्ट्रीय जलवायु शिखर सम्मेलन—संयुक्त राष्ट्र कांग्रेस ऑफ पार्टीज़—आयोजित किये जाते रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र के ढाँचे का विस्तार तीन बार किया जा चुका है, 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल, 2009 में कोपेनहेगन समझौता और 2015 में पेरिस समझौता। फिर भी, वैश्विक सीओ2 उत्सर्जन साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है, जबकि पारिस्थितिकी तंत्र घातक गति से नष्ट हो रहे हैं।”
पश्चिम में मुख्यधारा के राजनीतिक और आर्थिक विमर्श में यह धारणा हावी रही है कि “बाज़ार सब कुछ ठीक कर देगा।” पिछले कई दशकों से प्रचलित नवउदारवादी प्रतिमान भी यही है। जीवाश्म ईंधन के महंगा होते जाने और नवीकरणीय ऊर्जा के सस्ता होते जाने के विचार पर आधारित, आपूर्ति और माँग की शक्तियों से हरित परिवर्तन की अपेक्षा की गयी थी।
चूँकि यह साकार नहीं हो पाया है, इसलिए एक और नवउदारवादी कल्पना ने ज़ोर पकड़ लिया है, कि व्यक्तिगत उपभोक्ता अपनी जीवनशैली बदलकर इस ग्रह को बचा सकते हैं।
हमें बस इलेक्ट्रिक कारें चलानी हैं, कम मांस खाना है, ज़्यादा रीसाइकिल करना है, कम उड़ान भरनी है, कम नहाना है, वगैरह। इस तरह संकट व्यक्तियों पर थोप दिया जाता है, और पूँजीवादी व्यवस्था सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाती है।
ट्रम्प प्रशासन ने तो पृथ्वी को रहने योग्य बनाये रखने के मानवता के साझा संघर्ष में भागीदारी का मामूली दिखावा भी छोड़ दिया है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग की घोषणा से कुछ दिन पहले, ट्रम्प ने जलवायु परिवर्तन को “दुनिया के साथ अब तक का सबसे बड़ा धोखा” बताया था, और दावा किया था कि नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख़ चीनी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रचा गया एक छलावा है।
बाइडेन प्रशासन कम से कम बयानबाजी के स्तर पर तो बेहतर था। लेकिन वास्तव में उसने भी पर्यावरणीय मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से ज्यादा प्राथमिकता चीन और रूस के साथ अपने भू-राजनीतिक टकराव, और सबसे बड़ी कॉर्पोरेट पूँजी की सेवा को ही दी। बाइडेन के नेतृत्व में, अमेरिका ने चीनी सौर पैनलों और पॉलीसिलिकॉन पर प्रतिबंध लगाये, साथ ही चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर भारी शुल्क भी लगाया।
रूस के खिलाफ छद्म युद्ध ने अमेरिका में चट्टानों में फंसी शेल गैस की ड्रिलिंग को असाधारण बढ़ावा दिया है। इस गैस को हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग—जो अपने आप में एक खतरनाक प्रक्रिया है—के माध्यम से निकाला जाता है और फिर इसे तरल बनाने के लिए शून्य से 70 डिग्री सेल्सियस नीचे तक ठंडा किया जाता है, जिसके बाद इसे अटलांटिक महासागर के पार भेज दिया जाता है। यह एक पारिस्थितिक बेतुकेपन के अलावा क्या है?
अमेरिकी सेना पृथ्वी पर किसी भी संस्था की तुलना में ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक है। अमेरिकी सेना अगर एक देश होती, तो उत्सर्जन के मामले में यह स्वीडन और पुर्तगाल से भी ऊपर, दुनिया भर में 47वें स्थान पर होती।
पश्चिम में जलवायु संरक्षण की दिशा में प्रगति की कमी अक्षम्य है, और इसका दोष उस पूंजीवादी व्यवस्था पर मढ़ा जाना चाहिए जो पृथ्वी की बजाय मुनाफे को प्राथमिकता देती है। जब कोई समाज मुख्यतः निजी लाभ की खोज के इर्द-गिर्द संगठित होता है; जब कोई अर्थव्यवस्था उपयोग मूल्यों के बजाय विनिमय मूल्यों के उत्पादन पर लगभग पूरी तरह केंद्रित होती है, तो पृथ्वी को बचाने का सवाल कभी भी एजेंडे में सबसे ऊपर नहीं होगा।
समाधान: समाजवाद
पूंजीवादी देशों में शक्ति संतुलन ऐसा है कि अपेक्षाकृत प्रगतिशील सरकारों के लिए भी पूंजी के अल्पकालिक हितों की तुलना में आबादी की दीर्घकालिक आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना बहुत मुश्किल होता है। जॉन बेलमी फोस्टर बताते हैं कि आज चीन में, “हर जगह और हर स्तर पर पर्यावरण को बहाल करने के लिए भारी प्रयास किये जा रहे हैं।”
बेलमी फोस्टर आगे कहते हैं: “चीन ने पारिस्थितिकी अनुकूल सभ्यता की अपनी क्रांतिकारी अवधारणा को लागू करने के लिए कदम उठाये हैं, जो राज्य नियोजन और विनियमन में अंतर्निहित है, जबकि पश्चिम द्वारा घोषित ‘ग्रीन न्यू डील’ की अवधारणा पश्चिम में कहीं भी ठोस रूप नहीं ले पायी है। यह केवल एक नारा बन कर रह गयी है, जिसे व्यवस्था के भीतर कोई वास्तविक राजनीतिक समर्थन प्राप्त नहीं है।”
इसका मूल कारण यह है कि चीन, राष्ट्रपति शी की 20वीं राष्ट्रीय कांग्रेस को दी गयी रिपोर्ट के शब्दों में, “श्रमिक वर्ग के नेतृत्व में जनता की लोकतांत्रिक तानाशाही वाला एक समाजवादी देश है, जो श्रमिकों और किसानों के गठबंधन पर आधारित है; चीन में राज्य की सारी शक्ति जनता के पास है।”
चीन की आर्थिक व्यवस्था इस तरह से संरचित है कि राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएँ पूँजी के निरंतर विस्तार की चाहत से नहीं, बल्कि लोगों की ज़रूरतों और आकांक्षाओं से निर्धारित होती हैं। सरकार, राज्य के स्वामित्व वाले उद्यम, सहकारी और निजी कंपनियाँ, सभी एक समाजवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था के साझा पारिस्थितिकी तंत्र में मिलकर काम करती हैं, जो राज्य द्वारा विनियमित होती है और एक उच्च-स्तरीय योजना का पालन करती है।
सबसे बड़े बैंक सरकारी स्वामित्व वाले हैं, जिसका अर्थ है कि पूंजी के आवंटन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लोगों के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर लिये जाते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, विद्युत परिवहन, वनरोपण, बैटरी, विद्युत पारेषण, परमाणु ऊर्जा, चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन आदि क्षेत्रों में चीन का भारी निवेश मुख्यतः सरकारी बैंकों द्वारा किया गया है, तथा इसकी कई बड़ी परियोजनाएं सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों द्वारा संचालित की गयी हैं।
चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन में अपशिष्ट पदार्थों को कचरा घोषित कर फेंक देने की जगह यथासंभव उनके पुनः इस्तेमाल, रिपेयर और उपयोगी रूप में बदलाव की कोशिश की जाती है ताकि उनका अधिकतम इस्तेमाल हो सके और न्यूनतम कचरा तैयार हो।
इतालवी-अमेरिकी अर्थशास्त्री मारियाना माज़ुकाटो लिखती हैं कि “चीन को उसके अंतरराष्ट्रीय समकक्षों से अलग करने वाला तत्व अल्पावधि और दीर्घावधि में नवीकरणीय ऊर्जा और नवाचार के प्रति प्रतिबद्धता का उसका साहस है।”
यह चीन के नेतृत्व के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात को दर्शाता है, लेकिन “साहस” वास्तव में यहाँ केंद्रीय मुद्दा नहीं है; बल्कि, यह राजनीतिक शक्ति का प्रश्न है। प्रोफ़ेसर हू आंगंग इस मुद्दे के मूल तक पहुँचते हुए बताते हैं कि “पूंजीवादी विकास मॉडल में असीमित पूँजी विस्तार और सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बीच एक मौलिक और असंगत विरोधाभास रहता है।”
पश्चिम में, जीवाश्म ईंधन कंपनियाँ खतरनाक स्तर का राजनीतिक प्रभाव रखती हैं। प्रमुख तेल कंपनियों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़े विज्ञान पर संदेह पैदा करने के लिए भ्रामक प्रचार अभियानों को वित्तपोषित करने के अलावा, जलवायु कार्रवाई के खिलाफ लॉबीइंग और अंतरराष्ट्रीय समझौतों को कमजोर करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किये हैं। चीन में ऐसी कोई समस्या नहीं है, क्योंकि उसकी समाजवादी व्यवस्था ने आर्थिक संपदा और राजनीतिक शक्ति के बीच के संबंध को तोड़ दिया है।
चीनी राष्ट्रपति कुछ ऐसा कह सकते हैं जो पश्चिम में अकल्पनीय होगा। वे कहते कि “हम फिर कभी पर्यावरण की कीमत पर आर्थिक विकास की कोशिश नहीं करेंगे।”
चीन समाजवाद की सकारात्मकताओं का लाभ उठाकर आर्थिक विकास हासिल करने के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा करने में भी सफल रहा है। वास्तव में, चीन में नयी उत्पादक शक्तियों— “उच्च तकनीक, उच्च दक्षता और उच्च गुणवत्ता”—की ओर देश का रुझान पूरी तरह से हरित परिवर्तन के अनुरूप है, और यह कोई संयोग नहीं है कि नयी उत्पादक शक्तियों में सबसे प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरियाँ हैं।
‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ के प्रमुख विश्लेषक लॉरी माइलीविर्टा के विश्लेषण के अनुसार, स्वच्छ-ऊर्जा प्रौद्योगिकियां 2024 में चीन की अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बनाएंगी, और ये क्षेत्र समग्र चीनी अर्थव्यवस्था की तुलना में तीन गुना तेजी से बढ़ेंगे, जो 2024 में कुल जीडीपी विकास का 26 प्रतिशत होगा।
इसका मतलब यह है कि, जहां पश्चिम में सरकारें इस आधार पर जलवायु पर निष्क्रियता को उचित ठहराती हैं कि इससे आर्थिक विकास को नुकसान होगा, चीन पहला देश है जिसने हरित संक्रमण को आर्थिक विकास की एक शक्तिशाली चालक शक्ति बना दिया है, जिससे आधुनिकीकरण के लिए चीनी लोगों की तात्कालिक जरूरतों और इंसानियत के रहने योग्य टिकाऊ पर्यावरण से पूर्ण पृथ्वी, जो कि मानवता की दीर्घकालिक जरूरत है, दोनों को संबोधित किया जा सके।
वैश्विक महत्व
उपरोक्त बातें यह संकेत देती हैं कि हमारे इस प्यारे ग्रह ‘पृथ्वी’ को बचाने के लिए समाजवाद ही एकमात्र व्यवहार्य राजनीतिक और आर्थिक ढांचा है।
दुर्भाग्य से, केवल कुछ ही देश समाजवादी हैं, और पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। और यह समस्या इतनी गंभीर है कि दुनिया चुपचाप बैठकर ऐतिहासिक भौतिकवाद के अपने रास्ते पर चलने का इंतज़ार नहीं कर सकती।
शुक्र है कि दुनिया चीन के नेतृत्व से लाभान्वित हो सकती है। नवीकरणीय ऊर्जा में चीन के निरंतर निवेश और नवाचार के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर लागत में कमी आयी है, जिससे दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सौर और पवन ऊर्जा जीवाश्म ईंधन की तुलना में अधिक सस्ती हो गयी है।
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, हरित ऊर्जा में चीन के भारी निवेश ने “लागत में 80 प्रतिशत से अधिक की कमी लाने में योगदान दिया है, जिससे सौर बैटरी पैनल दुनिया के कई हिस्सों में सबसे किफायती बिजली उत्पादन तकनीक बन गया है।”
उदाहरण के लिए, उप-सहारा अफ्रीका के देश, जहां आधी आबादी के पास अभी भी बिजली की पहुंच नहीं है, अब कम लागत वाली चीनी प्रौद्योगिकी की बदौलत जीवाश्म ईंधन को छोड़कर सीधे नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ सकते हैं।
उन्नत पूंजीवादी देशों में, जहां राजनीतिक सत्ता पर क्षयग्रस्त पूंजीपति वर्ग का प्रभुत्व है, वहां के लोग चीन का उदाहरण देकर अपनी सरकारों और शासक वर्गों पर व्यापक दबाव बना सकते हैं कि वे धरती को नष्ट करना बंद करें, और पर्यावरणीय मुद्दों पर चीन के साथ समझदारीपूर्ण सहयोग को प्रोत्साहित करें।
माओत्से तुंग ने 1956 में कहा था कि 21वीं सदी की शुरुआत तक चीन “एक शक्तिशाली समाजवादी औद्योगिक देश” बन चुका होगा और “उसे मानवता के लिए और भी बड़ा योगदान देना चाहिए था।” पर्यावरणीय संकट से निपटने और एक पारिस्थितिकी अक सभ्यता के निर्माण में चीन का नेतृत्व निश्चित रूप से मानवता के लिए एक महान योगदान है।
कार्लोस मार्टिनेज। प्रस्तुति : शैलेश
(11-12 अक्टूबर 2025 को चीन के पीकिंग विश्वविद्यालय के मार्क्सवाद स्कूल द्वारा आयोजित ‘मार्क्सवाद पर चौथे विश्व कांग्रेस’ में कार्लोस मार्टिनेज के व्याख्यान पर आधारित : एमआरऑनलाइन डॉट ओआरजी से साभार)