अंबेडकर विश्वविद्यालय में पूजा का विरोध करने पर छात्रों पर हमला : प्रशासन, पुलिस के रवैये पर सवाल

मोदी सरकार के कार्यकाल में शैक्षणिक संस्थानों के स्वायत्तता पर गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं। पाठ्यक्रम से लेकर उच्च पदों पर की जा रही नियुक्तियां सवालों के घेरे में है। छात्र संगठन, छात्र संघ और शिक्षक संघ भी शिक्षा के भगवाकरण से उत्पन्न खतरे से दो-चार हो रहे हैं।

प्रगतिशील तबके का मानना है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में कैंपसों में लोकतांत्रिक स्पेस सिमट चुका है, अब सिर्फ एक विचारधारा को हर संभव मदद दी जा रही ताकि राष्ट्रीव स्वयं सेवक संघ अपने आप को विश्वविद्यालयों में स्थापित कर पाए। 

कुछ इसी तरह का आरोप उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्र लगा रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन पूरी तरह संघ की मानसिकता को बढ़ावा देने का काम कर रहा और विरोध में उठने वाली हर एक आवाज़ पर सख्ती से दमन कर रहा है। 

मामला यह है कि पिछले महीने 17 सितम्बर 2025 को बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (बापसा) और दिशा छात्र संगठन से जुड़े सदस्यों पर विश्वकर्मा पूजा करने पर आपत्ति जताने के कारण प्रशासन के मौजूदगी में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा लाठी-बेल्ट और डंडों की मदद से जानलेवा हमला किया गया।

जानकारी के अनुसार मामला तब शुरू हुआ जब 17 सितंबर  को विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी संस्थान के मैकेनिकल विभाग में विद्यार्थी परिषद द्वारा विश्वकर्मा पूजा मनाया जा रहा था। आंबेडकरवादी छात्रों को जब इसकी सूचना मिली तो उनका एक डेलिगेशन चीफ प्रॉक्टर से मिलने पहुंचा और इस कार्यक्रम पर आपत्ति जताई।

छात्रों की राय यह थी कि एक विश्वविद्यालय में इस तरह के धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन करना सही नहीं है। छात्रों के अनुसार इसके बाद चीफ प्रॉक्टर ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्होंने इस कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी है। अगर उन्हें इस पर आपत्ति है तो ये लोग स्वयं विभागाध्यक्ष से मिलकर उनसे जवाब तलब करें।

विभागाध्यक्ष से मिलने जाने वाले डेलिगेशन में मौजूद छात्रा सिंपी कुमारी, पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के ऐक्ट में साफ तौर पर लिखा है कि विश्वविद्यालय में किसी तरह के धार्मिक आयोजन नहीं होंगे, बावजूद इसके उस दिन शैक्षणिक अवकाश नहीं होने के बाद भी कक्षाओं को बंद करके अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा पूजा पाठ का आयोजन किया गया।

जब हमें इसकी सूचना मिली तो है इस पर आपत्ति जताने के लिए हम उस विभाग में गए। हम वहां पहुंचकर विभागाध्यक्ष सर का लगभग 2 घंटे इंतज़ार करते रहे लेकिन वो हमसे मिलने नहीं आए। इस दौरान विद्यार्थी परिषद के छात्रों को जब इसकी सूचना मिली कि हम इस धार्मिक आयोजन पर आपत्ति जताने आए हैं तो वह लोग आक्रामक हो गए और हमें घेर कर जातिगत गलियां देने लगे।

वह कहने लगे कि तुम साले चमार… पासी। यही करते रह जाओगे, भगवान ने तुमको इस जाति में यही करने के लिए बनाया है। उन्होंने हमारे एक साथी का गला दबाने की कोशिश की जिसका निशान देखा जा सकता है।” 

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इसके जवाब में जब अन्य छात्र ‘ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद’ के नारे लगाने शुरू किए इसके बाद विद्यार्थी परिषद से जुड़े 20 से 30 लोगों ने डेलिगेशन पर हमला बोल दिया।  

गौरतलब है कि ‘ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद’ का नारा एक बेहद प्रचलित नारा है, जो भारतीय समाज में मौजूद जातिगत छुआछूत पर आधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था की निंदा करता है और उसके खात्मे की बात करता है। आंबेडकरवादी संगठन और वामपंथी संगठन लंबे अरसे से इसका इस्तेमाल करते रहे हैं। 

सिंपी कुमारी बताती है कि “उन लड़कों ने मेरे साथ मेरी दोस्त जया को बुरी तरह घेर लिया और हमें बंधक बनाने की कोशिश की। इस दौरान वो हमें ‘भंगी-चमारिन’ जैसी जातिगत गालियां देते रहे।

जब जया ने अपने मोबाइल से इसका वीडियो बनाने की कोशिश की तो उन लोगों ने उसका मोबाइल छीन लिया और खुलेआम धमकी दी कि बाहर मिलो, देख लेंगे कि तुम लोगों की औकात क्या है।… तुम लोग शूद्र हो, वही रहोगे…इसके बाद कई स्टूडेंट्स सामने आए और हम दोनों को किसी तरह बचाया। हमने उसी दिन इसके खिलाफ स्थानीय पुलिस को तहरीर दे दी है लेकिन अब तक उन पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।”

छात्रों का आरोप है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को विश्वविद्यालय प्रशासन इस तरह के धार्मिक और अवैज्ञानिक कार्यक्रमों की खुली छूट देकर विचारधारा को फलने-फूलने में सहयोग देता है जबकि अन्य प्रगतिशील संगठनों को रोकने की हर संभव कोशिश करता है।

विश्वविद्यालय का काम यहां पढ़ने आए बच्चों में वैज्ञानिक चेतना डालना और विचार विमर्श करने की क्षमता बढ़ाना है। जबकि उनमें धार्मिक चेतना बढ़ाई जा रही है। 

बापसा संगठन से जुड़ाव रखने वाली बी.कॉम की छात्रा जया कहती हैं कि इस हमले के बाद एक लड़की होने के कारण वह ज्यादा भयभीत महसूस कर रही है। विद्यार्थी परिषद से जुड़े हुए गुंडे किस्म के लोग इस प्रदर्शन में शामिल  लड़कियों को चिन्हित कर उनका पीछा तक करते रहे। 

“विश्वविद्यालय में इस तरह के धार्मिक आयोजन नहीं होने चाहिए, ऐसा भारत का संविधान भी कहता है। जिसे भी पूजा करनी है वो बेशक अपने हिसाब से अपने कमरे या घर में कर सकते है। हम पर हमले के बाद हमने विश्वविद्यालय प्रशासन से सुरक्षा की मांग की लेकिन उल्टा हमें ही मारा पीटा गया। हम जानते हैं कि हम गलत नहीं है। हमने सही के पक्ष में आवाज़ उठाई है लेकिन प्रशासन हमारे साथ दोहरा व्यवहार कर रहा है। हम लड़कियां अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं।”

ध्यान देने वाली बात है कि 17 सितंबर को इन छात्रों पर दो बार हमला हुआ था। पहली बार मैकेनिकल विभाग के अंदर, दूसरी बार शाम 5 बजे के बाद जब दलित स्टूडेंट्स इस हमले के खिलाफ धरना समाप्त करके निकले ही थे। छात्रों को डंडों से उनके सिर पर वार किया गया है। 

रितेश उन छात्रों में से एक है जिन्हें 17 सितंबर को शाम को बुरी तरह पीटा गया जब वह धरना समाप्त होने के बाद कैंपस से निकल रहे थे।  रितेश ‘दिशा छात्र संगठन’ से जुड़े हुए है और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं। 

रितेश का मानना है कि छात्रों पर हमला पूरी तैयारी के साथ हुआ। खुद को टारगेट किए जाने के संदर्भ में उनका मानना है कि “मैंने एक महीने पहले पत्रकारिता विभाग में आयोजित एबीवीपी के कार्यक्रम के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। क्लास में आयोजित कार्यक्रम का मकसद छात्रों को एबीवीपी से जोड़ना था और वहां ‘ज्वाइन एबीवीपी’ का बैनर लगा हुआ था। प्रशासन एक विचारधारा को बढ़ावा क्यों दे रहा? “

उनका कहना है कि विरोध करने पर उन्हें  विभागाध्यक्ष गोविंद जी पांडे द्वारा थप्पड़ मारा गया। इसके खिलाफ उन्होंने प्रशासन से लिखित शिकायत भी की और लगातार सुरक्षा की मांग करते रहे लेकिन प्रशासन जानबूझकर उन्हें अनदेखा करता रहा। 

छात्र रितेश के अनुसार विभागाध्यक्ष गोविंद वल्लभ का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से करीबी रिश्ता माना जाता है और उन पर करने वाले लड़कों के साथ विभागाध्यक्ष की तस्वीरें देखीं जा सकती है। 

इन सब के बीच विवि प्रशासन ने इस पूरे मामले को दो गुटों की लड़ाई मानते हुए कुलसचिव अश्विनी कुमार सिंह द्वारा तहरीर देकर कई अज्ञात छात्रों पर विश्वविद्यालय में तोड़फोड़ का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवाई गई है और विश्वविद्यालय में एक जांच समिति भी बनाई गई है। 

इस जांच समिति के अनुशंसा पर अब कई छात्र नेताओं को कारण बताओ नोटिस दिया गया है, जिसके अनुसार इन छात्रों ने कुलपति कार्यालय में तोड़फोड़ की और अन्य छात्रों को हिंसा के लिए उकसाया था। गौर तलब है कि नोटिस के अनुसार इस जांच समिति ने इन छात्रों को सस्पेंड करने और भविष्य में किसी कोर्स में दाखिला लेने से डिबार करने की अनुशंसा की है। 

इस कारण बताओ नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए छात्र रितेश का कहना है कि “इस कार्यवाही में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 28 और यूनिवर्सिटी कोड ऑफ कंडक्ट को दरकिनार कर पीड़ित छात्रों पर ही उल्टा कार्यवाही की जा रही है। हमें शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से परेशान किया जा रहा है, कुलपति और कुलसचिव हर उस मतभेदी आवाज़ को कुचलने का कट्टर प्रयास कर रहे हैं जो न्यायपसंद हैं।”

विश्वविद्यालय के शोध छात्र बसंत कन्नौजिया का कहना है कि “विश्विद्यालय में हर धर्म के  लोग पढ़ते हैं इसलिए किसी एक धर्म विशेष का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। लेकिन कैंपस में संघ के लोगों को हिंदू धर्म से जुड़े कार्यक्रम करने की पूरी अनुमति रहती है। जब आम स्टूडेंट्स बाबासाहेब आंबेडकर या अन्य महापुरुषों पर कार्यक्रम करते हैं तो उन्हें रोका जाता है। बहुजन समाज से आने वाले बच्चों को भी संघ द्वारा आयोजित धार्मिक आयोजनों में परीक्षा में फेल कर देने का डर दिखा कर जबरदस्ती शामिल किया जाता है। 

17 सितंबर को भी संघ के कहने पर विश्वकर्मा पूजा कारवाई गई और विरोध करने के बाद  बाहरी लोगों ने आकर स्टूडेंट्स पर हमला किया। इस दौरान कोई भी प्रशासनिक अधिकारी बच्चों से मिलने नहीं आया। मेरे सामने ही 30 से 40 की संख्या में बाहरी लड़कों ने दो छात्रों के साथ बहुत बुरी तरह मारपीट की। इन लड़कों पर कार्रवाई करवाने की जगह प्रशासन उल्टा हमें की तोड़फोड़ का आरोपी बना रहा और कह रहा कि हमने लोगों को हिंसा के लिए भड़काया है।”

पुलिस के कामकाज पर उठते सवाल

छात्रों के आरोप है कि 17 सितंबर को शाम में छात्रों पर हमले के बाद उन्होंने कई बार 112 नंबर पर डायल किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। स्टूडेंट्स के बहुत प्रयास के बाद पुलिस आई भी लेकिन उनका रवैया साफ तौर पर पक्षपाती दिख रहा है। हमले की घटना शाम की है लेकिन पीड़ितों का मेडिकल नहीं करवाया गया, सिर्फ दवा, मरहम-पट्टी करवा कर वापस कैंपस भेज दिया गया जहां उनपर फिर से हमला हो सकता था। स्टूडेंट्स के बढ़ते गुस्से के कारण रात 1 बजे के बाद उनका मेडिकल हुआ वह भी साफ तौर पर सिर्फ खानापूर्ति ही था। 

छात्रों की तरफ से तहरीर देने के बाद भी जब एफआईआर नहीं हुआ, तब लगभग दो सौ की संख्या में दलित स्टूडेंट्स ने आशियाना थाने का घेराव किया। इस घेराव के बाद बेहद हल्की धाराओं में विद्यार्थी परिषद के लोगों पर सात नामजद व अन्य 15 लोगों पर एफआईआर दर्ज तो हो गया लेकिन जातिसूचक गालियां देने के बावजूद उन पर अबतक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत कोई धाराएं नहीं लगाईं गई हैं। 

पुलिसिया कार्य प्रणाली का आलम यह है कि  इसके कुछ देर बाद ही 17 सितंबर की सुबह को मैकेनिकल विभाग में धार्मिक आयोजन पर आपत्ति जताने वाले स्टूडेंट्स और उनके अन्य सहयोगियों पर ही गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी गई जिसमें 11 छात्र नामजद हैं। इन छात्रों पर भारतीय न्याय संहिता 2023 की अंतर्गत 115(2), 191(2), 191(3), 299, 352, 351(3) धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। 

इंजिनियरिंग संस्थान में जारी जातिगत उत्पीड़न और विद्यार्थी परिषद द्वारा हमले का जुड़ाव

वैसे तो यूनिवर्सिटी बाबा साहब के नाम पर है जिन्होंने जाति और छुआछूत के खत्म के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया लेकिन आज भी उनके नाम पर बने इस विश्वविद्यालय में जातिगत उत्पीड़न जारी है।

कुछ छात्रों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि विभाग के प्रोफेसर गौरव बाजपेई अपनी ब्राह्मणवादी मानसिकता से दलित बच्चों को क्लास में अपमानित करते रहे हैं। उनके द्वारा दलित बच्चों को क्लास में देर से आने पर उन्हें बेंच पर खड़े होकर खुद को थप्पड़ मारने को कहा जाता है, सजा के तौर पर मुर्गा बनने को कहा जाता है। प्रोफेसर द्वारा नाम के आगे कुमार लिखने वाले बच्चों को (परंपरागत रूप से दलित बच्चे अपने नाम के साथ कुमार लिखते है) खड़ा करके उन्हें जाति के नाम अपमानित किया जाता है।

बापसा संगठन के सदस्य आदेश नाम के छात्र जो खुद इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं उनके नेतृत्व में दलित समुदाय से आने वाले स्टूडेंट्स ने इसका विरोध कर दिया। जिसके बाद प्रोफेसर को मजबूरन सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। इसके दो दिन बाद ही 17 सितम्बर को छात्र आदेश को विद्यार्थी परिषद से जुड़े लड़कों ने बुरी तरह पीटा। 

आदेश के अलावा विश्वविद्यालय के एक और छात्र मृत्यंजय पर 17 सितम्बर को तब विद्यार्थी परिषद के लोगों ने बेरहमी से हमला कर दिया जब वे पीड़ित आदेश को बचाने की कोशिश कर रहे थे। मृत्युंजय दिशा छात्र संगठन से जुड़े हुए हैं और मुखरता से गलत के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। हमले से घायल मृत्युंजय ने एकतरफा पुलिसिया कार्रवाई को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन के नाम खुली चिट्ठी लिखकर भूख हड़ताल की चेतावनी भी दी थी। 

लखनऊ नागरिक समाज के तरफ से दख़ल 

पूरे मामले को देखते हुए लखनऊ नागरिक समाज का एक प्रतिनिधिमंडल दिनांक 19/ 09/25 को पुलिस कमिश्नर ने मिला था और अपनी चिंता जताते हुए एक पत्रक सौंपा है। इसमें प्रो रूप रेखा वर्मा, प्रो रमेश दीक्षित, डॉ वंदना मिश्रा, मधु गर्ग, कात्यायनी आदि शामिल थे।

उनकी मांग थी कि छात्रों का मेडिकल ठीक से करवाया जाए, ठीक धाराओं के साथ हमलावरों पर एफआईआर दर्ज हो और पीड़ित छात्रों पर दर्ज फ़र्जी एफआईआर को रद्द किया जाए। फिलहाल इनमें से कोई भी मांग पूरी नहीं हुई है। इसके अलावा कई स्टूडेंट संगठनों ने विद्यार्थी परिषद -पुलिस – विश्वविद्यालय प्रशासन के गठजोड़ की भर्त्सना करते हुए पीड़ित छात्रों के लिए न्याय की मांग की थी। 

कैंपस में भगवाकरण की कोशिश का इतिहास

1) अप्रैल 2024 में आंबेडकर जयंती पर कार्यक्रम करने के लिए बापसा संगठन से जुड़े छात्रों को कैंपस के अंदर माइक ले जाने की अनुमति नहीं दी। लेकिन अगले दिन ही विद्यार्थी परिषद से जुड़े सदस्यों को प्रशासन द्वारा बड़े-बड़े डीजे सिस्टम लेकर रामनवमी मनाने की अनुमति दे दी गई। 

इस संगठन से जुड़े स्टूडेंट्स ने इस पर सवाल उठाया तो उन्हें सुरक्षाकर्मियों द्वारा बहुत बुरी तरह पीटा गया। जब स्टूडेंट्स उनपर करवाई की मांग करने के लिए धरने पर बैठे तो धरने के नौवें दिन कुल 23 छात्रों को जेल भेज दिया गया जिसमें दो नाबालिग छात्र भी थे।

बापसा संगठन के जुड़े अश्वनी कुमार उन छात्रों में से एक है। वह बताते हैं कि “हमें पीटने के बाद हमारा मेडिकल भी नहीं करवाया गया। जेल से वापस आने के बाद से हम चार छात्रों को कैंपस से सस्पेंड कर दिया गया, और निलंबन अवधि के बाद हमें 8 मई 2024 को अपने ही कैंपस से डिबार करके हमारे प्रवेश को रोक दिया गया। जेल जाने वाले सभी 23 बच्चे दलित समुदाय से आते हैं और संघर्ष करके अपनी पढ़ाई करते हैं। प्रशासन हमें पढ़ने से रोकना चाहता है, यहां तक कि हमें अपने परीक्षाओं में बैठने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ा।”

इन चारों छात्रों ने अश्विनी कुमार (एम ए सोशियोलॉजी) के अलावा आलोक कुमार राव (एम ए पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) , विकास कुमार (एम ए इतिहास) और राहुल कुमार (एम ए इतिहास) इस भेदभावपूर्ण करवाई के खिलाफ कोर्ट का रुख़ किया। एक साल से भी अधिक समय के बाद 28 अगस्त 2025  को कोर्ट का फैसला आया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच ने अपने फैसले में साफ तौर  कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने बच्चों के साथ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन किया है और  विश्वविद्यालय आदेश को रद्द करते हुए चारों छात्रों को पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी है। 

हालांकि छात्रों का कहना है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद भी उन्हें कैंपस में प्रवेश नहीं दिया जा रहा। अश्विनी प्रशासन के छात्र विरोधी रवैए पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि “क्या विश्वविद्यालय प्रशासन देश की न्याय व्यवस्था से ऊपर है? हमें उस अपराध की सज़ा दी जा रही जो हमने किया ही नहीं। प्रशासन जानबूझकर दलित बच्चों के भविष्य को खराब करना चाहता है। पढ़ने का हक हमने जो लड़ कर लिया है वह भी प्रशासन-पुलिस हमसे छीन रही। हमें जानबूझकर परेशान किया जा रहा। हमने भाजपा आरएसएस पर सवाल उठाया, मोदी – योगी सरकार को कठघरे में खड़ा किया इसलिए हमें टारगेट किया जा रहा।”

2) 23 दिसंबर 2024 को विद्यार्थी परिषद से जुड़े हुए स्टूडेंट्स और उनके साथ बाहरी लोगों का हुजूम विश्विविद्यालय के गेट नंबर को तोड़ते हुए अन्दर घुसकर उन्मादी नारे लगाए। इस भीड़ को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अवध प्रांत मंत्री पुष्पेंद्र बाजपेई को नेतृत्व दे रहे थे। पुष्पेंद्र बाजपेई ने सोशल मीडिया पर अपना वीडियो भी साझा किया था और कैंपस में आंदोलन का ऐलान किया था। 

इस भीड़ को कैंपस के अन्दर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद का नारा लगाए जाने पर आपत्ति थी।

आंबेडकरवादी व वामपंथी संगठनों के दबाव में विश्विविद्यालय प्रशासन के तरफ से पुलिस प्रशासन को लिखित शिकायत दी गई लेकिन स्थानीय पुलिस ने अबतक एक भी व्यक्ति पर कानूनी करवाई नहीं की।

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