डिजिटल दुनिया: बँटते रिश्ते, बिखरता समाज

पिछले दो-ढाई दशकों में इंटरनेट ने हमारे जीवन को जिस तरह बदल दिया है, उसकी तुलना शायद ही किसी और तकनीक से की जा सकती है। 2000 के शुरुआती सालों में जब इंटरनेट घर-घर तक पहुँचना शुरू हुआ था, लोग इसे किसी जादू से कम नहीं मानते थे। लगता था जैसे अब दुनिया की सारी सीमाएँ मिट जाएँगी, हर इंसान तक बराबरी से ज्ञान और जानकारी पहुँचेगी।

लोग इंटरनेट को ऐसे औजार की तरह देखते थे जो लोकतंत्र को और मजबूत करेगा, क्योंकि यह सबको अपनी बात कहने का मंच देगा। उस समय यह सपना सच होने जैसा लगता था। लेकिन आज, 2025 में खड़े होकर देखें, तो साफ महसूस होता है कि वही इंटरनेट जिसने हमें जोड़ा था, उसने हमें बाँटना भी शुरू कर दिया है।

हमारे बीच जो मतभेद पहले घर की बैठकों या छोटे-छोटे दायरों तक सीमित रहते थे, वे अब समाज की सड़कों पर खुलकर टकराव का रूप लेने लगे हैं। इसका कारण सिर्फ इतना नहीं है कि लोग अपनी राय रखते हैं।

असली वजह हैं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के वे एल्गोरिदम, जो यह तय करते हैं कि हमें स्क्रीन पर क्या दिखेगा और क्या नहीं। इन प्लेटफॉर्म्स के लिए हमारी राय, हमारी भावनाएँ या हमारा भविष्य मायने नहीं रखते। उनके लिए मायने रखता है सिर्फ हमारा समय और हमारा अटेंशन, क्योंकि यही उनका कारोबार है। जितनी देर हम उनकी स्क्रीन पर टिके रहेंगे, उतना ही उनका मुनाफा बढ़ेगा।

यहीं से शुरू होता है इको चैंबर का खेल। इको चैंबर यानी ऐसा डिजिटल बुलबुला, जिसमें हम वही देखते और सुनते हैं जो हमारी सोच से मेल खाता है।

मान लीजिए आपने किसी राजनीतिक मुद्दे पर एक वीडियो देखा या किसी पोस्ट को लाइक किया। अब प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम आपको उसी तरह के और वीडियो और पोस्ट दिखाने लगेगा। धीरे-धीरे आपको लगेगा कि पूरी दुनिया आपकी ही तरह सोच रही है। असल में ऐसा नहीं होता, लेकिन आपका ऑनलाइन संसार इतना सीमित हो जाता है कि आपको और कोई दृष्टिकोण दिखाई ही नहीं देता।

इको चैंबर रूपक है, जो यह समझाने के लिए इस्तेमाल होता है कि इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया पर हमारी सोच कैसे सीमित दायरे में बंद हो जाती है। सरल भाषा में कहें तो इको चैंबर मतलब गूंजने वाला कमरा। जैसे अगर आप किसी कमरे में खड़े होकर अपनी आवाज़ लगाएँ तो वही आवाज़ बार-बार लौटकर आपके कानों में गूँजती है। बाहर की कोई नई आवाज़ आपके पास नहीं आती।

सोशल मीडिया पर भी यही होता है। अगर आप किसी खास तरह की राय या विचार को पसंद करते हैं तो प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम आपको उसी तरह का कंटेंट और ज्यादा दिखाने लगता है। नतीजा यह होता है कि आप सिर्फ वही सुनते-पढ़ते रहते हैं जो आपकी सोच से मेल खाता है।

धीरे-धीरे आपकी दुनिया इतनी सीमित हो जाती है कि आपको लगता है पूरी दुनिया आपके जैसी सोचती है। असल में, आप इको चैंबर में फँस चुके होते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आपको अलग विचारों से सामना ही नहीं होता, संवाद और बहस की गुंजाइश घट जाती है, समाज ध्रुवीकृत हो जाता है, यानि लोग अलग-अलग खेमों में बँट जाते हैं।

शोध बताते हैं कि इको चैंबर्स हमारे समाज को गहराई से बाँट रहे हैं। 2021 में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन ने साफ किया कि पिछले दो दशकों में सोशल मीडिया की बढ़त के साथ ही समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। अलग-अलग विचारों से मुलाकात घट गई है। यह सिर्फ अमेरिका या यूरोप की बात नहीं, बल्कि हर उस देश की हकीकत है जहाँ सोशल मीडिया लोगों के जीवन में घुस चुका है।

हालाँकि, इको चैंबर्स की अवधारणा बिल्कुल नई नहीं है। इंसान हमेशा से अपने जैसे विचारों वाले लोगों के बीच सहज महसूस करता रहा है। लेकिन फर्क यह है कि पहले यह सीमित था गाँव, मोहल्ले या दफ्तर तक। आज एल्गोरिदम ने इसे हजार गुना तेज कर दिया है। अब तो एक छोटा-सा समूह भी समाज में बड़ा विभाजन पैदा कर सकता है।

उदाहरण के लिए, कोविड-19 महामारी के दौरान अमेरिका में ट्विटर पर चर्चाएँ दो ध्रुवों में बँट गईं। एक ओर वैक्सीन के समर्थक थे, दूसरी ओर विरोधी। दोनों के बीच कोई संवाद नहीं हुआ, क्योंकि हर कोई अपने इको चैंबर में बंद था। यही वजह है कि गलत सूचनाएँ आसानी से फैल गईं और समाज में अविश्वास गहराया।

इन सबके पीछे असली ताकत है एल्गोरिदम। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स (पहले ट्विटर), ये सभी प्लेटफॉर्म आपके हर क्लिक को नोट करते हैं। वे देखते हैं कि आप किस वीडियो पर रुके, किसे लाइक किया, किसे शेयर किया। फिर वे आपको वैसा ही और दिखाते हैं। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है और धीरे-धीरे आपकी सोच मजबूत होकर कट्टरपंथी बन जाती है। यही कारण है कि जिन मुद्दों पर पहले लोग सहजता से बात कर सकते थे, आज उन पर चर्चा करना झगड़े में बदल जाता है।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट और कई अन्य शोध संस्थान बताते हैं कि सोशल मीडिया कंपनियाँ जानबूझकर उन पोस्ट्स को बढ़ावा देती हैं जो विवादित हों, जो गुस्सा पैदा करें, जो लोगों को खींचकर स्क्रीन पर बाँधे रखें। क्योंकि गुस्सा और नफरत, दोनों ही अधिक एंगेजमेंट लाते हैं। इसी वजह से नफरत भरे पोस्ट और फेक न्यूज़ इतनी तेजी से फैलते हैं।

अगर हम पिछले दो दशकों का इतिहास देखें, तो यह बदलाव साफ दिखता है। शुरुआती दौर में सोशल मीडिया का मकसद था दोस्तों और परिवार से जुड़ना। लोग खुशी-गम साझा करते थे, तस्वीरें डालते थे। लेकिन 2010 के आसपास से इसमें राजनीति और विचारधारा घुसने लगी।

2015 के एक अध्ययन में पाया गया कि ट्विटर पर राजनीतिक बातचीत अक्सर इको चैंबर्स को मजबूत करती है। और फिर कोविड के दौर में तो यह चरम पर पहुँच गया। खासकर राइट-लीनिंग यूजर्स ने बहुत सघन चैंबर्स बना लिए, जिनमें ज्यादातर लोग उन्हीं के जैसे विचार रखते थे।

इसका असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सोशल मीडिया ने हमारे सामाजिक रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाला है। प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार 19 देशों में आधे से ज्यादा लोग मानते हैं कि सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है। भारत जैसे देशों में भी इसके नतीजे खतरनाक रहे हैं। म्यांमार में फेसबुक पर फैलाई गई नफरत ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को भड़काया। भारत में भी व्हाट्सऐप और फेसबुक पर अफवाहें इतनी तेजी से फैलीं कि उन्होंने कई लिंचिंग की घटनाओं को जन्म दिया।

हैरानी की बात यह है कि जिन एल्गोरिदम्स को हमारे जीवन का हर छोटा-बड़ा हिस्सा तय करने की ताकत है, वही एल्गोरिदम्स नफरत फैलाने वाले कंटेंट को रोकने में असफल रहे हैं। और असफल ही क्यों, कई बार तो ऐसा लगता है कि वे नफरत को ही बढ़ावा दे रहे हैं। इसका कारण साफ है; नफरत अटेंशन खींचती है, और अटेंशन मतलब ज्यादा मुनाफा। साइकोलॉजी टुडे की हाल की एक रिपोर्ट कहती है कि एंगेजमेंट एल्गोरिदम वास्तव में सभ्य समाज को कमजोर कर रहे हैं, क्योंकि वे हेट स्पीच को मोनेटाइज करते हैं।

राजनीति में इसका असर और भी ज्यादा खतरनाक है। चुनावों में सोशल मीडिया अब किसी हथियार से कम नहीं। 2014 के लोकसभा चुनाव इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण हैं कि गलत सूचनाएँ और ध्रुवीकरण कैसे लोकतंत्र को हाइजैक कर सकते हैं। शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया असल समाज का प्रतिबिंब नहीं दिखाता, बल्कि विकृत दर्पण की तरह होता है, जिसमें वास्तविकता तोड़-मरोड़ कर दिखाई जाती है।

अब सवाल उठता है कि इसका समाधान क्या है। क्या हम सोशल मीडिया को बदल सकते हैं? विशेषज्ञ कहते हैं कि यह आसान नहीं है। इको चैंबर्स इंसानी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं। हम स्वाभाविक रूप से अपने जैसे विचारों वाले लोगों के करीब रहना पसंद करते हैं।

लेकिन फिर भी कुछ उपाय किए जा सकते हैं। प्लेटफॉर्म्स को अपने एल्गोरिदम्स पारदर्शी बनाने चाहिए। उन्हें समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट से गुजरना चाहिए। सरकारें और संस्थाएँ ऐसे नियम बना सकती हैं जो यह सुनिश्चित करें कि विविध विचारों को जगह मिले। और सबसे जरूरी, हमें खुद अपने स्तर पर कोशिश करनी चाहिए कि अलग सोच रखने वाले लोगों को सुनें, उनसे बातचीत करें।

कई अध्ययनों ने यह भी दिखाया है कि अगर इंसान चाहे तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल सकारात्मक ढंग से भी कर सकता है। अच्छे विचार भी उतनी ही तेजी से फैल सकते हैं जितनी तेजी से बुरे। फर्क सिर्फ इस बात का है कि हम क्या चुनते हैं। यूसी डेविस के एक अध्ययन में कहा गया कि सोशल मीडिया इंसानियत के अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को बड़ा कर दिखाता है। यानी दोष सिर्फ प्लेटफॉर्म्स का नहीं, हमारी पसंद का भी है।

फिर भी, एक बात तय है। पिछले दो ढाई दशकों में इंटरनेट ने दुनिया को जरूर छोटा किया है, लेकिन हमारे दिमागों को और ज्यादा संकुचित कर दिया है। हमने पहले से कहीं ज्यादा लोगों से जुड़ने की ताकत पाई, लेकिन हमने यह ताकत अक्सर दूसरों से दूरी बनाने में खर्च की। अगर हम इसी राह पर चलते रहे, तो समाज में विभाजन और गहरा होगा।

शायद अब वक्त आ गया है कि हम स्क्रीन से बाहर निकलें। हमें फिर से असली बातचीत करनी होगी, असली बहस करनी होगी, जहाँ सामने बैठकर हम एक-दूसरे की आँखों में देख सकें। क्योंकि तकनीक महज़ टूल है। उसे इंसान ने बनाया है। और उसका इस्तेमाल किस दिशा में होगा, यह तय भी इंसान ही करेगा।

इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारे लिए हैं, हम उनके लिए नहीं। अगर यह बात हम समझ पाएँ, तो शायद हम उस वादे को पूरा कर सकें जो इंटरनेट ने हमें अपने शुरुआती दिनों में दिया था; ऐसी दुनिया जहाँ लोग एक दूसरे से जुड़े हों, बँटे हुए नहीं।

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