क्या एसआईआर लोकतंत्र को कमजोर करने की कवायद है?

मतदाता गणना और सूचियों में आवश्यक संशोधन की “विशेष गहन पुन:निरीक्षण” (एसआईआर) प्रक्रिया की शुद्धता को चुनाव आयोग की कार्यशैली से बड़े सवालों के घेरे में खुद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने ही खड़ा कर दिया है जब असम और महाराष्ट्र राज्यों को इस से बाहर रखने के तर्क दिए । असम में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और महाराष्ट्र में नगरीय निकाय चुनाव होने प्रतीक्षित हैं। विशेष गहन पुन:निरीक्षण के व्याखित उदेश्यों में से एक विदेशी घुसपैठियों को बाहर करना पहले ही सवालों में है जिसके जवाब चुनाव आयोग ने दिए नहीं। अन्य कई सवालों के जवाब देना चुनाव आयोग ने उचित नहीं समझा।

मतदाता सूचियों में पुन:अवलोकन सुधार व संशोधन की प्रक्रिया चुनाव आयोग के निरंतर कार्य का एक भाग है जो सामान्य काल में भी जारी रहता है लेकिन विशेष परिस्थितियों में गहन पुन: निरीक्षण किया जाता है। देश में वर्तमान में ऐसी कौन सी विशेष परिस्थिति का निर्माण हो गया जो यह प्रक्रिया लागू करने को बाध्य करती हैं यह भी चुनाव आयोग पूर्ण विवेक से स्पष्ट नहीं कर पाया है। यह पूरी प्रक्रिया किस कारण से प्रेरित है यह सवाल बड़ा हो गया है। क्या चुनाव आयोग अपनी स्वायत्तता के अनुरूप बिना बाहरी प्रभाव के इस विशेष प्रक्रिया को लागू कर रहा है या चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार  विशेषाधिकार से प्रेरित हो कर कोई पक्षपातपूर्ण निर्णय वर्तमान सत्ता के अप्रत्यक्ष लाभ के लिए कर रहे हैं?

लोकतंत्र में मतदाताओं द्वारा प्रतिनिधियों के चुनाव की पद्धति मूल सिद्धांत है। भारत में मताधिकार का सार्वभौमिक अधिकार राजनीतिक समानता सुनिश्चित करता है। संविधान के अनुच्छेद 326 में निहित अधिकार प्रत्येक वयस्क नागरिक को देश के शासन विधि में भाग लेने की अनुमति देता है। संविधान द्वारा स्थापित चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह देश के सभी पात्र वयस्क नागरिकों के अधिकार को सुनिश्चित करे। लेकिन बिहार के विशेष गहन पुन;निरीक्षण में हुई अनियमितताओं और आमजन की कठिनाइयों पर चुनाव आयोग की कार्यवाही होती दिखाई नहीं दी। 

मतदाता सूचियों के संशोधन की प्रक्रिया निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 (वैधानिक नियम और आदेश) की धारा 21 की उपधारा (2)  अनुसार  चार अलग अलग प्रकार से होती हैं।  गहन (इंटेंसिव),  सारांश ( सम्मरी ), आंशिक रूप से गहन और आंशिक रूप से सारांश,  विशेष (स्पेशल )। लेकिन वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसे विशेष गहन पुन;निरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन ) में परिभाषित कर दिया है।

बिहार विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग द्वारा देश के 12 राज्यों के लिये वैध मतदाता गणना और सूचियों के संशोधन की घोषणा ने देश में राजनीतिक हलचल और उथल पुथल के दौर के अलग तरह के रास्ते खोल दिए है। चुनाव आयोग द्वारा लिया गया यह फैसला कोई साधारण फैसला नहीं है। गहन पुन;निरीक्षण चुनाव आयोग द्वारा पहले  2002 -2003 में करवाया गया था। तब देश में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में थी।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ अन्य चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की उपस्थिति में बीते दिन 27 अक्तूबर  को देश के 12 राज्यों में 28 अक्टूबर से शुरू होने वाले मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुन:निरीक्षण’ के दूसरे चरण की घोषणा की गयी है। देश के अन्य शेष राज्यों में अगले चरण में मतदाता गणना और सूचियों के संशोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाएगी चुनाव आयोग द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है।

बिहार में विधान सभा चुनावों से ठीक पहले हाल ही में यह प्रक्रिया की गयी जिसे देश के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। बहुत से सवाल इस प्रक्रिया पर उठे लेकिन चुनाव आयोग द्वारा अभी तक कोई संतोषजनक जवाब दिए नहीं गए है। मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुन:निरीक्षण’ का ख्याल चुनाव आयोग को एक लम्बे अरसे बाद आया है या यूँ कहा जा सकता है के ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद इसकी पहल की जा रही है।

जिन 12 राज्यों को इस कार्यक्रम में शामिल किया गया है वो हैं उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, अंडमान निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, केरल, लक्ष्द्वीप और पुडुचेरी।

9  दिसंबर को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित  की जाएगी और 8 जनवरी तक मतदाताओं की आपत्तियां और उनके समाधान किये जायेंगे। फाइनल मतदाता सूचियां 7 फरवरी को प्रकाशित की जाएँगी। इन सभी राज्यों में मतदाता की गणना 4 नवंबर से शुरू होगी और 4 दिसंबर तक चलेगी। मतदाता सूचियों में अशुद्धता दूर करने को चुनाव आयोग ने मुख्य लक्ष्य बताया है। लेकिन बिहार में की गई प्रक्रिया में नागरिकता सत्यापन की जिम्मेदारी नागरिकों पर डालने को ले कर विवाद हुआ था था जिस पर चुनाव आयोग ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। जो सवाल उठ रहे है उनमे सबसे महत्वपूर्ण है कि प्रक्रिया में अभी भी 2002-2003 कटऑफ वर्ष का उपयोग किया जाता है, जबकि साक्ष्यों के अनुसार उस समय नागरिकता का सत्यापन नहीं किया गया था।

नागरिकता के सत्यापन की प्रक्रिया से मतदाता सूची का संकलन  बिलकुल अलग पद्धति है। लेकिन चुनाव आयोग ने इसको किसी तरह स्पष्ट नहीं किया।   

चुनाव आयोग के इस फैसले पर भी विपक्षी राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया आ रही है। कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग पर आरोप लगाए हैं कि यह ‘लोकतंत्र के खिलाफ षड्यंत्र’ है। ‘चुनाव आयोग अब 12  राज्यों में वोट चोरी के नए खेल की तैयारी में है।’ बिहार में एसआईआर के नाम पर 69 लाख वोट काट दिए गए अब इन 12 राज्यों में करोड़ों वोट जायेंगे। यह सरासर वोट चोरी है जिसे नरेंद्र मोदी और चुनाव आयोग मिल कर  कर रहे है। चुनाव  आयोग को इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। बिहार के एसआईआर से चुनाव आयोग और भाजपा  की नियत देश के सामने आ चुकी है । 

शिव सेना के उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग के खिलाफ कानूनी कार्यवाही  की मांग की है।  उद्धव ठाकरे ने कहा है की भ्रष्ट बोगस वोटर मामले में एक केस चुनाव आयोग के खिलाफ  दर्ज होना चाहिए। लोकतंत्र में मतदाता सरकार  को चुनते हैं लेकिन वर्तमान में सरकार  अब मतदाता  चुन रही है। 

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डी एम के के अध्यक्ष  एम के स्टालिन ने कहा है कि  एसआईआर को जल्दबाजी और अस्पष्ट तरीके से संचालित करना और कुछ नहीं बल्कि चुनाव आयोग द्वारा नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश भाजपा को लाभ पंहुचने की कवायद है। स्टालिन ने कहा कि आगामी 2 नवंबर को चेनई में आल पार्टी मीटिंग बुलाई जाएगी। स्टालिन ने प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते कहा कि इससे नगरिकों में गंभीर संदेह पैदा हो रहा है। मतदान का अधिकार प्रजातंत्र की नीव है, तमिलनाडु लोकतंत्र की हत्या के ऐसे किसी भी प्रयास के खिलाफ लड़ेगा और जीतेगा। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने पीटीआई से बात करते हुए साफ कहा  है कि मुख्य चुनाव आयुक्त भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे है। यह देश का दुर्भाग्य है कि ऐसा व्यक्ति मुख्य चुनाव आयुक्त है। 

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