बिहार के मोकामा में कल दुलारचंद यादव नाम के एक शख्स की गोली मारने के बाद गाड़ी से रौंदकर बर्बर तरीके से हत्या कर दी गयी। यह घटना भारतीय लोकतंत्र पर किसी कलंक से कम नहीं है। घटना उस समय हुई है जब सूबे में लोकतंत्र का उत्सव मनाया जा रहा है और चुनाव अपने परवान पर है लेकिन इसी बीच जनता के इस त्योहार को खून से रंग दिया गया। दिनदहाड़े जन सुराज के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के जिस समर्थक दुलारचंद की गोलियों से हत्या की गयी है वह कोई अदने इंसान नहीं थे।
अपने जीवन के बड़े हिस्से में वह राजद के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता होने के साथ-साथ लालू यादव के खासमखास लोगों में शामिल रहे हैं। लालू यादव के साथ सामने आयीं उनकी पुरानी तस्वीरें इसकी गवाही देती हैं। इसके अलावा एक दौर में वह सवर्ण सामंती ताकतों के खिलाफ प्रतिरोध के स्वर थे। इस कड़ी में क्षेत्र में उनकी एक विरासत बन गयी थी। नतीजतन वोटरों के भी बड़े हिस्से को वह प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। वह क्षमता सिर्फ यादवों तक सीमित नहीं थी बल्कि इलाके में बड़ी आबादी का निर्माण करने वाले धानुक समुदाय तक विस्तारित थी। लिहाजा उनकी मौजूदगी विरोधियों पर किसी कहर से कम नहीं थी। ऐसे में इस बात में कोई शक नहीं कि हत्या पूरी तरह से राजनीतिक है।
हालांकि इस हत्या की पृष्ठभूमि उसी समय से बननी शुरू हो गयी थी। जब सत्तारूढ़ पार्टी जेडीयू और उसके मुखिया नीतीश कुमार ने इलाके के सबसे बड़े बाहुबली अनंत सिंह को टिकट देने का फैसला किया। रही सही कसर दलाल मीडिया ने अनंत सिंह के अपराधों का महिमामंडन करके पूरा कर दिया। शायद ही मुख्यधारा का कोई चैनल रहा हो जिसने अनंत सिंह का साक्षात्कार न किया हो। उसके बाद यूट्यूब पर फफूंद की तरह उग आए टिड्डी चैनलों ने अनंत की जो अनंत कथा बतानी शुरू की तो उस सिलसिले का अंत ही नहीं होता दिख रहा था। दरअसल लाइक और व्यूवरशिप के लिए मरे जा रहे इन चैनलों के दर्शकों के लिए एक अनपढ़-अंगूठा छाप टाइप के शख्स की दबंग बोली और भाषा बेहद मसालेदार साबित होने लगी थी। जिसका नतीजा यह रहा कि अनंत खुद को हीरो समझने लगे थे।
मीडिया में मिले इस तवज्जो और सत्तारूढ़ पार्टी के साथ ने अनंत के अहंकार को सातवें आसमान पर लाकर खड़ा कर दिया। जिसका नतीजा यह रहा कि अपने समर्थकों की नजरों में ‘छोटे सरकार’ की पदवी हासिल कर चुके अनंत को अब मीडिया के लोग भी ‘छोटे सरकार’ कहने लगे। यह अजीब किस्म का दौर था जब लोकतंत्र के भीतर एक अपराधी का खुला महिमामंडन किया जा रहा था और इस पूरी कार्रवाई की कहीं कोई आलोचना नहीं हो रही थी। यह एक विडंबना है कि जिस बिहार में मरे हुए शहाबुद्दीन का खौफ दिखाकर अमित शाह वोटों की झोली भरना चाहते हैं उसी सूबे में उनके गठबंधन का एक प्रत्याशी न केवल खूंखार अपराधी है बल्कि उसके पक्ष में गोदी मीडिया खुला अभियान छेड़े हुए है।
यह बात किसी से छुपी नहीं है कि अनंत सिंह के खिलाफ 8 से ज्यादा हत्या के मुकदमे दर्ज हैं। इसके अलावा एक दर्जन मामलों में उनके ऊपर हत्या की कोशिश के केस हैं। इसके साथ ही न जाने कितने छोटे-बड़े आपराधिक मामले हैं जिनकी कोई गिनती ही नहीं है। और बहुत सारे उनके ऐसे अपराध रहे होंगे जो या तो सामने आए नहीं और अगर आए भी तो वह थाने की दहलीज तक नहीं पहुंचे। ऐसे में समझा जा सकता है कि अनंत किस स्तर के पेशेवर अपराधी हैं। और इससे बड़ा विरोधाभास और क्या हो सकता है कि वह जेडीयू और बीजेपी उन्हें उस समय प्रत्याशी बनाने का काम करती हैं जब वह खुद चुनाव में लोगों को आज से 20 साल पहले के लालू राज को याद दिलाने की कोशिश कर रही हैं।
और वह भी उस तेजस्वी के लिए जिसका कि उस पूरे दौर से कोई दूर-दूर का रिश्ता नहीं है। दरअसल तेजस्वी के खिलाफ सत्तारूढ़ एनडीए को कोई ऐसा मामला ही नहीं दिख रहा है जिस पर वह उनकी घेरेबंदी कर सके। ऐसे में उन्हें मजबूरी में इस तरह के मुद्दे उछालने पड़ रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही सबसे बड़ा सवाल उनके सुशासनी दामन पर तब उठता है जब वह अनंत जैसे दागदार चेहरों को न केवल साथ खड़ा करते हैं बल्कि लोकतंत्र के मंदिर में उन्हें बैठाने के लिए टिकट के तौर पर गेटपास दे देते हैं।
एनडीए सरकार पूरे मामले की लीपापोती में जुट गयी है। इसकी झलक गोदी मीडिया में होने वाली बहसों और पटना प्रशासन द्वारा इस मुद्दे पर जारी बयान में देखी जा सकती है। प्रशासन ने कहा है कि मोकामा में चुनाव प्रचार के दौरान दो प्रत्याशियों के समर्थकों के बीच आपसी झगड़े में दुलारचंद यादव नाम के एक शख्स की मौत हो गयी। जिसका बड़ा आपराधिक इतिहास रहा है। प्रशासन मामला दर्ज कर पूरे मामले की जांच कर रहा है। और इस सिलसिले में जगह-जगह छापेमारी की जा रही है। इस बयान में कहीं दूर-दूर तक अनंत सिंह का नाम नहीं आता है। जबकि प्रत्यक्षदर्शियों समेत मौके पर मौजूद जनसुराज प्रत्याशी चित्रांश प्रियदर्शी का कहना है कि दुलारचंद खुद उनकी गाड़ी में उनके साथ बैठे थे।
उनके पीछे-पीछे प्रचार करते हुए अनंत सिंह का काफिला आ रहा था। तभी एकाएक अनंत सिंह के लोगों ने उनके कार्यकर्ताओं के साथ झड़प शुरू कर दी। जिसको समझने और मामले को निपटाने के लिए दुलार चंद उनकी गाड़ी से उतर कर कार्यकर्ताओं के बीच चले गए। जहां उनके मुताबिक किसी ने कहा कि दुलारचंद की मूंछ उखाड़कर उसको खत्म कर दो। और फिर नतीजतन पहले दुलारचंद के पैर में गोली मारी गयी और फिर उनके ऊपर गाड़ी चढ़ाकर उनकी हत्या कर दी गयी।
हालांकि प्रियदर्शी का कहना है कि अनंत सिंह उनकी हत्या कराना चाहते थे लेकिन बीच में दुलार चंद आ गए और वह उसके शिकार हो गए। अगर ये वर्जन सही है तो इसे समर्थकों के बीच झड़प तो कतई नहीं करार दिया जा सकता है। और अगर अनंत सिंह वहां मौजूद थे तो फिर उनका नाम भी प्रशासन के बयान में क्यों नहीं आना चाहिए?
बहरहाल इस घटना ने नीतीश के सुशासन की पोल खोलकर रख दी है। जिस कथित जंगल राज का हव्वा खड़ा कर एनडीए जनता का समर्थन हासिल करना चाहता है विपक्ष की मानें तो उससे ज्यादा बड़ा जंगल राज नीतीश ने अपने शासन में खड़ा कर दिया है जिसकी खुली बयानी पिछले सालों में हुई आपराधिक घटनाएं करती हैं। इनमें से जो कुछ तत्काल अंगुलियों पर गिनी जा सकती हैं। पटना के पारस अस्पताल में चार लड़कों द्वारा अंजाम दी गयी हत्या की घटना उसी का हिस्सा है।
सूबे के एक बड़े व्यवसायी की गांधी मैदान में हुई हत्या अभी लोगों के दिमाग में तरोताजा है। कोमल पासवान को दबंग सामंतों ने अपनी गाड़ियों के पहियों के नीचे जिस तरह से रौंदा उसको याद कर लोगों की रूह कांप जाती है। पूर्णिया में घास काटने वाली काजल मंडल के साथ न केवल बलात्कार किया जाता है बल्कि उनकी हत्या कर दी जाती है। रोहतास में भी यही कांड एक बेटी के साथ दोहराया जाता है। ये सब घटनाएं आखिर किसके कार्यकाल में हुईं? लिहाजा पुराने दौरे के लालू राज को याद कराने से पहले अमित शाह-नीतीश को खुद अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए।
बल्कि उससे आगे बढ़कर इस मसले को उठाने वाली बीजेपी को जरूर यह बताया जाना चाहिए कि उसके सत्ता में आने के साथ ही सूबे की मरी हुई सामंती और बर्बर ताकतें एक बार फिर से जिंदा हो जाएंगी। और सत्ता का साथ पाने से वह खूंखार होकर न केवल पिछड़ों और दलितों की हत्याएं करेंगी बल्कि मनुवादी वर्णाश्रमी व्यवस्था लागू कर उनसे उनके मनुष्य के दर्जे को भी छीन लेंगी।
इतना ही नहीं अपने नफरती एजेंडे से समाज में बंटवारें की जो दीवार खड़ी करेंगी उसकी भविष्य में भरपाई कर पाना पूरे समाज और सूबे के लिए मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में यह चुनाव बिहार में न केवल सूबे के भविष्य के निर्माण का चुनाव है बल्कि एक ऐसे मोड़ पर पर खड़ा है जहां से इसके फिर से उतना ही पीछे जाने का खतरा पैदा हो गया है।
रही बात इस घटना का मौजूदा चुनाव पर असर की तो इस बात में कोई शक नहीं कि यह एक बड़ा एजेंडा बनने जा रहा है। जिसमें बेरोजगारी, पलायन, गरीबी और तमाम मुद्दों के साथ ही अपराध भी एक बड़ा मुद्दा बन जाएगा। और इस बात की पूरी संभावना है कि इसकी तार्किक परिणति अपने तरीके के जातीय ध्रुवीकरण में हो। जो सवर्ण बनाम पिछड़ा के रूप में सामने आ सकता है। लेकिन यह सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश और प्रशासन इसको कितना रोक पाते हैं और विपक्ष इस मसले को कितना अपने पक्ष में तब्दील कर सकता है।
(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)