संभवतः यह पहला अवसर है कि एक भारतवंशी के न्यूयॉर्क मेयर बनने पर भाजपा में ख़ुशी की चमक दमक देखने नहीं मिली जो कभी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में खड़े होने वाली कमला हैरिस और ऋषि सुनक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने पर नज़र आती थी। आखिरकार यह उल्लास क्यों परिलक्षित नहीं हुआ है इसकी सबसे बड़ी वजह तो उनका मुसलमान और कम्युनिस्ट होना है। लगभग ईसाई राष्ट्र बनाने संकल्पित डोनाल्ड ट्रम्प और हिंदू राष्ट्र बनाने का ख़्वाब देखने वाले मोदीजी के लिए यह जीत परेशान करने वाली है।
दूसरी बात यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प की यारी इतनी कड़वाहट के बावजूद मोदीजी से बनी हुई है, सबसे प्यारे दोस्त का ख़िताब वे खोना नहीं चाहते। इसलिए यदि वे ज़ोहरान की जीत पर खुशी व्यक्त कर दें तो पता नहीं ट्रम्प की और कौन सी मार उन पर पड़ जाए।
दोनों कथित लोकतांत्रिक देश मुस्लिमों को अब पचा नहीं पा रहे हैं। बिहार चुनाव में ही देख लीजिए भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया है। देश में मुस्लिमों का हाल किसी से छुपा नहीं है। गौवंश, लव-जिहाद, बुल्डोजर और जेल से स्वास्थ्य जांच के लिए जा रहे कथित अपराधी को सरे आम साज़िश के तहत् गोली से मरवाया जाता है। अब तो बुर्के और दाढ़ी की ओट में बढ़ते अपराध में भी मुस्लिम नाम शामिल हो जाते हैं। उन्हें अकारण पांच साल से जेल में बंद रखा जाता है। मुसलमान आज इन कथित लोकतांत्रिक देशों में नफ़रत का पर्याय बना दिया गया है।
खैरियत है वैज्ञानिक पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम पर अभी तक सरकार की नज़रे इनायत हैं। दिलचस्प बात ये है कि संघ इनकी वोट पाने भारत वंशियों का डीएनए एक बताने लगता है और भारतवंशियों के विदेश में बड़े पद पाने पर बल्लियों उछलने लगता है। जबकि अंदर की बात इसके उल्ट होती है।
ट्रम्प की नाराज़गी देखिए वे कह रहे हैं कि वे न्यूयॉर्क की फंडिंग रोक देंगे। इससे ज़्यादा दुर्भावना और क्या हो सकती है। लेकिन इसके जवाब में वाम विचारधारा के ममदानी साफ़ कहते हैं कि वे अमीरों पर टैक्स बढ़ाएंगे ताकि न्यूयॉर्क के विकास में बाधा ना आए।
इधर ज़ोहरान ने जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को याद किया तो भाजपाईयों की भृकुटी तन गई उन्होंने अपने भाषण के दौरान जिन बातों का जिक्र किया, पंडित नेहरू ने वही बातें 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के बाद भाषण में कही थीं। ममदानी ने कहा कि आपके सामने खड़े होकर मुझे जवाहरलाल नेहरू के शब्द याद आते हैं। “इतिहास में कभी-कभी ऐसा क्षण आता है जब हम पुराने से नए युग में कदम रखते हैं, जब एक युग समाप्त होता है और जब किसी राष्ट्र की लंबे समय से दबाई गई आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है। हमने पुराने से नए युग में कदम रख लिया है।”
अब आप ही बताइए जेनजेड के ऐसे माहौल में ज़ोहरान जैसे 34 वर्षीय युवा मेयर को भला ट्रम्प व मोदीजी कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। कैसे उनकी जीत का जश्न मना सकते हैं। लेकिन आज तमाम दुनिया के वे सभी देश जो ट्रम्प की तानाशाही और लूट से परेशान हैं वे जश्न मना रहे हैं। हमारे देश में भी गंगा जमुनी संस्कृति के पक्षधर समन्वयवादी भारतीय इस जीत से उत्साहित हैं और भविष्य को बदलता देख रहे हैं।
इस जीत से दुनियां में एक नए उजाला दिखाई दिया है जो यह बता रहा है कि तानाशाह कितना ही ताकतवर क्यों ना हो, उसे नवजवानों की ताकत और मोहब्बत से परास्त किया जा सकता है। उम्मीद है, बिहार चुनाव पर भी ज़ोहरान की जीत असर डालेगी। लग तो रहा है भारत में राहुल गांधी द्वारा फोड़े हाईड्रोजन बम से ज़्यादा असर भाजपा पर ज़ोहरान की जीत का नज़र आ रहा है।