एनके सिंह का बिहार के लिए यथास्थितिवादी एजंडा

मौजूदा पंद्रहवें वित्तीय आयोग के मौजूदा प्रमुख एनके सिंह ने 28 अक्टूबर को इंडियन एक्स्प्रेस में बिहार की अर्थ व्यवस्था और इसकी संभावनाओं पर एक लेख लिखा। एनके सिंह जनता दल यूनाइटेड के सदस्य थे और बिहार की नीतीश सरकार के 2005 से लेकर 2014 के कार्यकाल में लगभग आठ साल औपचारिक रूप से सलाहकार थे। जब 2013 में नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ा तो उन्होंने जद (यू) छोड़ा और भाजपा में शामिल हो गए। 

योजना आयोग के सदस्य के रूप में वह कुछ समय तक रहे और बाद में 2015 में इसे जब नीति आयोग बना दिया गया तो उन्हें वित्तीय जिम्मेदारी एवं बजट प्रबंधन समीक्षा समिति का प्रमुख बनाया गया।

मोदी ने उन्हें 2017 में वित्तीय आयोग का प्रमुख बनाया। अखिल भारतीय आर्थिक संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए एनके सिंह को बिहार से दिल्ली लाया गया लेकिन वह बिहार अर्थव्यवस्था में भीष्म पितामह की भूमिका निभाते रहे और इसके विकास के मार्ग का नक्शा बनाते रहे जबकि पिछले 10 सालों से नीतीश सरकारों में उनकी कोई औपचारिक भूमिका नहीं थी। 

अपने लेख में एनके सिंह आने वाली बिहार सरकार के लिए आर्थिक एजंडा की रूपरेखा दे रहे हैं क्योंकि वह उम्मीद कर रहे हैं कि भाजपा-जदयू सरकार सत्ता में लौटेगी।

इस लेख की आलोचनात्मक पड़ताल से बिहार की अर्थ व्यवस्था की वास्तविक हालत की जांच में मदद मिलेगी, यह समीक्षा की जा सकेगी कि बिहार चुनाव प्रचार अभियान में आर्थिक आंकड़ों से सम्बद्ध मुद्दे कैसे आ रहे हैं और उससे भी आगे बढ़कर एनके सिंह के एकसूत्रीय फोकस से परे जाकर व्यापक मूल एजंडा की पहचान की जा सकेगी। उनका फोकस बिहार के लाखों श्रमिक प्रवासियों द्वारा ये भेजने की अर्थव्यवस्था को उत्पादक तरीके से पुनरगठित करने पर है। 

एनके सिंह लेख की शुरुआत बिहार की अर्थव्यवस्था के हालिया प्रदर्शन की तारीफ के साथ करते हैं। उन पाठकों की सुविधा के लिए जिन्होंने इंडियन एक्स्प्रेस का यह लेख नहीं पढ़ा, संक्षेप में इसके प्रमुख बिंदुओं को जान लेते हैं।

जिस टर्न अराउन्ड की वह बात करते हैं उसका मतलब कम विकास वाली एक बीमारू अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होना।   एनके सिंह दावा करते हैं कि बिहार आज देश की सबसे तेज़ विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीएसडीपी में 22 फीसदी के उछाल के साथ 11 लाख करोड़ होने का अनुमान है। यह वित्त वर्ष 2024-25 के 13.5 फीसदी विकास के ऊपर है।

विख्यात अर्थशास्त्री यह स्पष्ट करने से बचते हैं कि यह आँकड़े वर्तमान कीमतों पर न्यूनतम विकास के लिए हैं। नियमित कीमतों पर 2025-26 के लिए प्रोजेक्ट किए आंकड़ों के अनुसार यह 9.2 फीसदी होगा और 2024-25 में वास्तविक वृद्धि नियमित कीमतों पर 8.64 फीसदी थी।

बिहार के विकास के जादू का वरसत्विक मूल्य 

एनके सिंह सुविधाजनक तरीके से यह भी छिपा जाते हैं कि जीएसडीपी के संदर्भ में नियमित कीमतों पर बिहार 29 राज्यों में से 14 वें नंबर पर है। इसका मतलब प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में बिहार और भी निचले पायदान पर होगा। 2025 में बिहार प्रति व्यक्ति आय के मामले में 28 राज्यों में 28 वें स्थान पर है और यदि हम 8 केंद्र शासित प्रदेशों को जोड़ें तो 36 में से यह 33वें स्थान पर होगा।

आश्चर्य नहीं है कि एनके सिंह टिकाऊपन के मामले में संघर्ष कर रही बिहार की अर्थव्यवस्था पर चुनिंदा साफ सुथरे आँकड़े देने में विशेषज्ञ लगते हैं क्योंकि वह हाल के वर्षों के अधिकतर हिस्से में खुद इसके आर्किटेक्ट रहे हैं। 

बिहार के कथित विकास के जादू को सही संदर्भ में समझते हैं। बिहार का मौजूदा थोड़ा अधिक विकास इसके निम्न बेस के कारण है। मौजूदा दर पर भी बढ़ने के बावजूद बिहार तमिल नाडु के जीएसडीपी के स्तर पर पहुँचने में 2035 से 2040 तक का समय लेगा।

यदि बिहार को तमिल नाडु के 2025-26 के स्तर टर 2030 में पहुंचना है तो बिहार को नियमित कीमतों पर 43 फीसदी प्रति वर्ष की दर से और न्यूनतम संदर्भ में 48 फीसदी दर से बढ़ना होगा जो हास्यास्पद तरीके से ऊंचे असंभव आँकड़े हैं। मोदी के विकसित भारत में विकसित बिहार की घोषणाएं और एनडीए के अगले पाँच वर्षों में विकास के दावों की यह सच्चाई है। 

नीतीश भाजपा का ठेकेदार राज 

एनके सिंह का लेख बिहार के “ऊंचे विकास” के एक और अँधियारे पक्ष को सामने लाता है। वह लिखते हैं, ‘बिहार ने इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश में असाधारण उछाल देखा है। केंद्र ने 875 किलोमीटर हाईवे अपग्रेड के लिए 33000 करोड़ मंजूर किए हैं। इसके अतिरिक्त 675 करोड़ रुपए जिला स्तर सड़क विस्तार के लिए और 3822 करोड़ चार लें वाले साहेबगंज-अरेराज-बेतिया कॉरिडर के लिए।

छह और कानेक्टिविटी परियोजनाएं लोजिस्टिक्स क्षमता के लिए और सीमा पहुँच सुधारने के लिए हैं। रेल ढांचे में अभूतपूर्व पूंजी डाली गई है। 2192 करोड़ की परियोजनाएं बख्तियारपुर-राजगीर- तिलैया मार्ग का दोहरीकरण करने, सात नई ट्रेन सेवाओं जिनमें अमृत भारत एक्स्प्रेस रूट शामिल हैं के लिए और एक लाख करोड़ चालू रेल क्षमता परियोजनाओं के लिए जिनमें बक्सर-भागलपुर कॉरिडर शामिल है के लिए हैं।”

तो क्या यह इस बात की स्वीकृति नहीं है कि केंद्र बिहार के विकास के गुब्बारे में हवा भर रहा है। बिहार के आंतरिक गतिवाद में कमी है। डबल इंजन सरकार में एक इंजन दूसरे इंजन को खींच रहा है। 

एनके सिंह ने अनचाहे नीतीश सरकार की बिहार में सड़क विकास में त्रुटिपूर्ण प्राथमिकताओं को बेनकाब किया है। 33000 करोड़ केन्द्रीय मदद हाईवे विकास के लिए, 3822 करोड़ नए चार लेन मार्ग के लिए और केवल 675 करोड़ जिला सड़कों के लिए? 

नीतीश के पूर्वी कार्यकालों में उन्हें लोकप्रियता मिली केंद्र से वित्त पोषित ग्राम सड़क योजना से जो मनमोहन सिंह ने शुरू की थी। कई गाँवों में तब पहली बार सभी मौसमों के अनुकूल सड़कें देखी गईं। ऐसा ही शिक्षा के अधिकार के तहत केन्द्रीय वित्त पोषण से प्राथमिक शालाओं की स्थापना से हुआ।

लेकिन अब फोकस हाईवे निर्माण की तरफ मुड़ गया है जिसने सिर्फ ठेकेदार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है। आश्चर्य नहीं कि जब आप बिहार में हाईवे और पुल बनाने वाले ठेकेदारों की सूची देखेंगे तो पाएंगे कि उनमें से अधिकांश गुजरात से हैं या आंध्र प्रदेश से। इस पहेली का हाल नीतीश और नायडू के मोदी के साथ राजनीतिक गठजोड़ में मिलेगा जिसके कारण मोदी सत्ता में हैं। 

2024-25 में बिहार के आर्थिक सर्वे में सितंबर 2024 तक पीएमजीएसवाय केन्द्रीय योजना के तहत 53419 किलोमेटर ग्रामीण सड़कों और 1153 पुलों के 28292 करोड़ रुपये के खर्च से निर्माण की शेखी बघारी गई थी। और आश्चर्य नहीं कि नीतीश-भाजपा के कथित सुशासन में हल्की बारिश में बिहार में 12 दिनों में एक दर्जन निर्माणाधीन पुल गिरे थे।

और यह कोई संयोग नहीं है कि कथित “जंगलराज विरोधी” प्रदेश में आज तक इनमें से अधिकतर ठेकेदार गुजरात से हैं और किसी को गिरफ्तार या किसी प्रकार से दंडित नहीं किया गया। 

बिहार अर्थव्यवस्था की समस्याएं 

“विनिर्माण” शब्द इस जाने माने अर्थशास्त्री की तरफ से तैयार बिहार के ब्लू प्रिन्ट में एक बार भी नहीं आता। बिहार में विनिर्माण विकास 2018-19 में 8.5 फीसदी, 2019-20 में 9 फीसदी, 2020-21 कोविड वर्ष में 6.2 फीसदी, 2021-22 में जब अर्थव्यवस्था में कोविड के बाद सुधार हुआ 17.4 फीसदी, 2022-23 में 10.5 फीसदी और उद्योगों के वार्षिक सर्वे में बिहार में 2023-24 में 5.8 फीसदी वृद्धि देखी गई।

विनिर्माण बिहार में “विकास की हिंदू दर” की तरफ क्यों बढ़ रहा है? एनके सिंह, बिहार के बड़े अर्थशास्त्री कोई जवाब नहीं दे पाता। शायद वह खुद भी नहीं जानते क्योंकि उनकी अपनी सोच प्रक्रिया केन्द्रीय ढांचागत सहायता नीत विकास को प्राथमिकता देती है न कि एमएसएमई से होने वाले विकास को। बिहार में 2017 तक पाँच वर्षों में एमएसएमई की संख्या 32.5 लाख से बढ़कर 34.8 लाख हुई जो 10 फीसदी भी नहीं है। यह वार्षिक दो फीसदी से भी कम है।

केवल संख्या ही नहीं उत्पाद ने भी बिहार में मामूली 6 फीसदी की वृद्धि देखि। जबकि औद्योगिक वृद्धि के लिए नीतीश सरकार का लक्ष्य 15 फीसदी था। 

ढांचागत आधार पर बात की जाए तो एनके सिंह खुश होकर बताते हैं कि बिहार की अर्थ व्यवस्था में सेवाओं का हिस्सा 58.6 फीसदी है। लेकिन यह बिहार में ई-कॉमर्स की ऊंचे हिस्से के कारण है। डिलीवरी कर्मी अधिकतर कम वेतन पाने वाले श्रमिक होते हैं। स्थानीय विनिर्माण के अभाव में यह अस्वस्थ वृद्धि ही है। बड़े अखिल भारतीय और बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट घराने जैसे रिलायंस रीटेल, ऐमज़ान और वलमार्ट बिहार के मेहनती लोगों का उपभोग व्यय छीन रहे हैं।  

लेकिन बड़े भारतीय और विदेश बुर्जुआ नाशुक्रे हैं। वह कभी बिहार से लूटी पूंजी वापस निवेश नहीं करते। वह कभी बिहार में विनिर्माण में निवेश नहीं करते। एनके सिंह खुद इस विरोधाभास को पकड़ते हैं। अ

पने लेख के कैप्शन में वह कहते हैं कि बिहार की अर्थव्यवस्था अब बदली है, अब लोगों और संस्थाओं में निवेश करें। लेकिन अंदर अपने लेख में वह कहते हैं कि निजी पूंजी दूर ही है। इसे विकास का इंजन बनना होगा। बुर्जुआ लोग प्रैक्टिकल होते हैं वह नीतीश के सुशासन के शोर से प्रभावित नहीं होने वाले और वह बिहार को ठेंगा दिखा देते हैं। एनके सिंह लेकिन केवल नौकरशाही को दोष देते हैं। 

वह बिहार के लिए केवल एक विकल्प सुझाते हैं। वह बताते हैं कि 23000 बिहारी श्रमिक 2023 में विदेश गए और बिहार की 7.2 फीसदी आबादी दूसरे राज्यों में काम कर रही है। वह बिहार में उद्योगों को प्रोत्साहित करने का मार्ग नहीं बताते कि बिहार के लोगों को आजीविका कमाने के लिए बाहर जाने की जरूरत न पड़े।

उनकी नजर हजारों करोड़ की उस प्रेषित आय पर है जो बिहारी प्रवासी अपने परिवारों को भेजते हैं और अफसोस जताते हैं कि यह पैसा केवल उपभोग पर खर्च हो रहा है। उनका सुझाव है कि संस्थाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए कि श्रमिक वर्ग का यह पैसा बिहार में बुर्जुआ को चैनलाइज़ किया जाए। दूसरे शब्दों में वह निवेश फंड स्थाईट करने का प्रस्ताव देते हैं जिससे यह पैसा और निवेश कॉर्पोरेट शेयरों में लगाया जा सके।

जाने माने अर्थशास्त्री ऐसे तरीके नहीं सुझाते कि यह पैसा श्रमिक लोगों के अपने को-आपरेटिव और अन्य सामूहिक सामाजिक उद्यमों में लगाया जाए जिसमें राज्य की तरफ से प्रोत्साहन और सब्सिडी भी जुड़े। इससे इस व्यक्ति का वर्ग चरित्र पता चलता है। 

2021 में कृषि बिहार अर्थव्यवस्था/जीएसडीपी का 19.9 फीसदी थी, उद्योग 21.5 फीसदी और सेवाएं 58.6 फीसदी। इसके विपरीत राष्ट्रीय स्तर पर कृषि जीडीपी का 13 फीसदी है और तमिल नाडु में यह जीएसडीपी का 11 फीसदी है।

बिहार के श्रम बल का 46 फीसदी हिस्सा अब भी निम्न उत्पादकता वाले कृषि पर निर्भर है।  समृद्ध गंगा क्षेत्र में कम उत्पादकता क्यों? जवाब जमींदारी – केवल किराया चाहने वाले उत्तरी बिहार के पारंपरिक जमींदार ही नहीं बल्कि मध्य बिहार के पूंजीवादी ढंग से बदली खेती करने वाले अमीर किसान जमींदार – जो पसीना बहाने वाले किसानों की उत्पत्ति में से बड़ा हिस्सा लूट लेते हैं और जो उत्पादकता में सुधार के लिए कृषि मशीनरी में निवेश करने के बजाय मजदूरों का खून चूस लेते हैं।

बिहार के किसान मक्का की खेती में बहुत सफल थे। उन्होंने लीची उत्पादन में भी प्रतिभा का परिचय दिया था। दोनों फसलों में निर्यात की संभावना है और किसानों की आय बढ़ सकती है। लेकिन कोल्ड स्टोरेज और ढुलाई व्यवस्था और हवाई अड्डों जैस आवश्यक निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना किसानों के बूते के बाहर की बात है। यह राज्य को करना होगा।

लेकिन भाजपा-नीतीश गठजोड़ के पास इसके लिए विज़न नहीं है। इसलिए बिहार इन दोनों क्षेत्रों में बुरी स्थिति में है। उनके सरप्लस का बाद हिस्सा लूटने वाली जमींदारी के श्राप के कारण किसान अक्सर एक पिकअप वैन भी खरीद नहीं पाते कि अपनी फसल दूर के बाजारों में भेज सकें।

बिहार में भूमि सुधार का हास्यास्पद इतिहास 

बिहार में भूमि सुधार ढोंग ही रहे। 12 अक्टूबर 2012 की टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक था “राज्य सरकार सीलिंग से अधिक जमीन का अधिग्रहण करने में धीमी”, में राजस्व और भूमि सुधार आयुक्त केएएच सुब्रह्मण्यम (जिन्हें बाद में बिहार राज्य बिजली बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया और मुख्य सचिव के बराबर वेतनमान दिया गया) ने कहा, “ बिहार में सीलिंग से अधिक घोषित कुल 445549 एकड़ जमीन में से मार्च 2000 तक केवल 356959 एकड़ अधिग्रहित की गई है।

बिहार सरकार ने 293675.40 एकड़ जमीन 377296 लाभार्थियों में जुलाई 2001 तक बांटी है और 63282.60 एकड़ जमीन अभी तक वितरित होनी बाकी है।” 

31 मार्च 2013 तक उपलब्ध आधिकारिक डाटा के अनुसार भूमि सुधारों के तहत विभिन्न श्रेणियों में वितरित जमीन, सितंबर 2014 में चन्द्रगुप्त इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, पटना – लेखक दास वी मुकुंदा, शीर्षक “लँड गवर्नन्स अससेस्मेंट फ्रेमवर्क फॉर बिहार :  फाइनल स्टेट रिपोर्ट” जिसे इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर रिपोर्ट “द रिग़ तो शेल्टर – अन ईवैल्यूऐशन ऑफ लैंड ट्रांसफर प्रोग्राम तो महादलित इन बिहार (हिमांशु कुमार और रोहिणी सोमनाथन) में उद्धृत किया गया था ने निम्नलिखित आँकड़े बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के हवाले से दिए: 

-राज्य सरकार के पास उपलब्ध 1796000 एकड़ की ग़ैर मजुरुआ खास/मालिक जमीन, जो पहले जमींदारों की निजी जमीन थी और जमींदारी उन्मूलन के बाद सरकार को हस्तांतरित की गई थी, में से 43.6 फीसदी 1045030 लाभार्थियों में वितरित की गई। 

-907800 एकड़ गैर मजुरुआ आम जमीन जो सामूहिक सामुदायिक जमीन जिसमें रास्ते, बंजर भूमि, ग्रामीण जलाशय और सिंचाई चैनल, शमशान गृह, कब्रिस्तान आदि की ग्रामीण सामूहिक जमीन है में से केवल 3.4 फीसदी 43710 लोगों में वितरित की गई। 

-363400 एकड़ सीलिंग से अधिक जमीन जो सरकार के पास थी उसमें से 75.1 फीसदी जमीन 350374 लोगों में वितरित की गई। 

-सरकार के पास उपलब्ध 648600 एकड़ भूदान जमीन में से केवल 39.5 फीसदी 292616 लोगों में वितरित की गई। 

-इन श्रेणियों के अलावा सरकार ने बिहार प्रीविलेज्ड पर्सन्स होमस्टेड टेनन्सी ऐक्ट 1947 (बिहार अधिनियम 4 1948) जो जमींदारों की जमीन पर श्रम सेव या नत्थी मजदूर के रूप में रह रहे थे उनको सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, के तहत 580214 लोगों को मालिकाना अधिकार दिए गए।

दुखद विडंबना है कि बिहार सरकार की तरफ से कानून की ताकत इस्तेमाल कर जमीन अधिग्रहित करने की मात्रा बिहार जमींदारों द्वारा भूदान आंदोलन के तहत दी गई जमीन का आधा हिस्सा है। 

बिहार में सामंतीवाद के अवशेष बचे होने का उदाहरण पूंजीवाद से पहले बटाईदारी का होना है। एक्शन ऐड गैर सरकारी संगठन ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है जो बिहार में छोटे किसानों और बटाईदारों पर है और रिपोर्ट में कृषि जनगणना आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि खेती योग्य जमीन के 30-40 फीसदी हिस्से पर बटाईदार खेती करते हैं। 52 फीसदी छोटे किसान बटाईदारी में संलिप्त हैं।

यह छोटे किसान हैं और रिपोर्ट मौके पर सर्वेक्षणों से पुष्टि करती है कि जमींदारों से उन्हें कभी अपनी फसल का 50 फीसदी से ज्यादा नहीं मिलता है जबकि टेनन्सी कानूनों के मुताबिक उन्हें 75 फीसदी हिस्सा मिलना चाहिए। उनके पास खेती को आधुनिक बनाने के लिए निवेश हेतु बहुत कम सरप्लस बच पाता है। 

16 जून 2006 को तत्कालीन नीतीश कुमार सरकार ने डी बंधोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया और आयोग ने अपनी रिपोर्ट तीन चरणों में 2008 में दी।

अपनी रिपोर्ट में बंधोपाध्याय ने 19 सिफारिशें कीं जिनमें खेती की जनगणना, बटाईदारों का पंजीकरण, सभी बटाईदारों को किसानों के रूप में टाइटल दीड या पर्चा देना, नया कड़ा कानून जो सुनिश्चित करे कि फसल का 75 फीसदी हिस्सा बटाईदारों को मिले आदि शामिल थीं।

नीतीश कुमार सरकार और अन्य सभी बाद की सरकारों ने कभी इन सिफारिशों पर अमल नहीं किया कि जदयू और भाजपा में जड़ें जमाए शक्तिशाली भूमिहार जमींदार लाबी दूर न हो जाए।

भूमिहार नेता ललन सिंह ने हमेशा बंधोपाध्याय आयोग की सिफारिशों का विरोध किया है। एनके सिंह बिहार के सामंतवाद के आर्थिक नतीजों की तरफ मुंह फेरेंगे ही क्योंकि वह कभी अपने वर्ग बंधुओं के हितों के खिलाफ नहीं आ सकते। 

एनके सिंह का मोदी के रेवड़ी पाखंड पर चुप्पी भी स्पष्ट है। स्वरोजगार के लिए महिलाओं को एक बार के 10000 रुपये का भुगतान किया गया। लेकिन पैसा राज्य के सरकारी खजाने से नहीं आएगा बल्कि महिला आवेदकों को स्थानीय बैंक प्रबंधकों द्वारा अपनी मर्जी से और सभी प्रकार की ऋण शर्तों से सुरक्षित देना होगा।

नीतीश ने 50 फीसदी सीलिंग सरप्लस जमीन और भूदान जमीन महिलाओं को देने का वादा किया था और कभी यह वादा पूरा नहीं किया क्योंकि उन्होंने भूमि सुधारों को अपने एजंडा से ही निकाल दिया था।

अपने पहले कार्यक्रम में उन्होंने दसवीं कक्षा की छात्राओं को साइकिल दी थी, वह कार्यक्रम भी अब प्रचलन में नहीं है। उन्होंने छठी और सातवीं कक्षा की छात्राओं को 750 रुपये देने का वादा किया था, जो उन्हें कभी नहीं मिले। 

मोदी दावा करते हैं कि 73.88 लाख किसान उनके पीएम किसान से लाभ पा रहे हैं और 49 लाख ग्रामीण परिवारों को पीएमएवाय के तहत आवास के लिए ऋण मिला है।

लेकिन 2022 के बिहार जाति सर्वेक्षण, जो नीतीश कुमार ने खुद किया था, 34.13 फीसदी परिवार बिहार में महीने में 6000 रुपये से कम कमाते हैं जो आधिकारिक रूप से गरीब माने जाते हैं। गरीबी के मामले में बिहार पहले नंबर पर है।

केरल ने अति गरीबी को खत्म किया है और तमिल नाडु आने वाले कुछ वर्षों में खत्म करने की राह पर है लेकिन नीतीश ने बिहार की एक तिहाई आबादी को गरीब बनाए रखा है जबकि केंद्र से निधि प्राप्ति और विशेष श्रेणी के दर्जे के लिए बोलते रहते हैं।

उनके लंबे सुशासन में बिहार के बारे में एक ही चीज विशेष है – जिद्दी गरीबी। एनके सिंह इससे भी आँखें फेर लेते हैं। इंडियन एक्स्प्रेस में जो एजंडा उन्होंने सामने रखा है उस बुरी स्थिति में शायद ही कुछ कर पाए, जिसमें नीतीश और मोदी ने बिहार को ला रखा है।

(अनुवाद : महेश राजपूत)

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