महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की मॉब लिन्चिंग की चार साल पुरानी घटना को लेकर भाजपा के काशीनाथ चौधरी को 24 घंटे में पार्टी में शामिल करने के फैसले पर स्थगन के बाद चौधरी मंगलवार को पहली बार मीडिया के समक्ष आए और दावा किया कि घटनास्थल पर वह साधुओं की मदद करने गए थे।
मीडिया से बातचीत में कहा कि वह घटनास्थल पर पुलिस के अनुरोध पर ही गए थे। उन्होंने कहा कि वह वहाँ भीड़ को शांत करने गए थे। उन्होंने जांच एजंसियों को सब बता दिया लेकिन फिर भी उन्हें बदनाम किया जा रहा है।
एक संवेदनशील मामले को राजनीतिक रंग दिए जाने से उनके और उनके परिवार का जीना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि उनके बच्चों को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह निजी आलोचना सह सकते थे लेकिन उनके परिवार को मामले में घसीटा जा रहा है। उन्होंने कहा, “मेरा बेटा मुंबई में हॉस्टल में रहता है, उसके सहपाठी उसे परेशान कर रहे हैं।”
चौधरी ने कहा, “भले मेरा राजनीतिक करिअर तबाह हो जाए पर मेरे बच्चों को निशाना न बनाएं।”
चौधरी को दो दिन पहले जब पार्टी में शामिल किया गया तो विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया और कहा कि भाजपा ने खुद चौधरी पर लिन्चिंग की उस घटना में संलिप्तता का आरोप लगाया था, जिसमें आदिवासी ग्रामीणों ने दो साधुओं को बच्चे चुराने और अंग तस्करी में संलिप्त होने के संदेह में पीट पीट कर मार डाला था।
सम्बित पात्रा और सुनील देवधार समेत कई भाजपा नेताओं ने चौधरी पर घटनास्थल पर मौजूद होने का आरोप लगाया था। भाजपा तब विपक्ष में थी और घटना पर खूब बवाल मचाते हुए सीबीआई की जांच की मांग की थी।
स्थानीय निकाय चुनाव के बीच रविवार को जब पार्टी ने चौधरी को शामिल किया तो विपक्ष राकांपा (शरद पवार गुट) ने ऐतराज जताया और सोशल मीडिया में भी घटना पर बवाल मचा। भाजपा ने दूसरे दिन ही फैसले पर स्थगन लगाया।
हालांकि पार्टी के बयान में यह भी दावा किया गया कि चौधरी के बारे में समूची जानकारी मिलने के बाद सोच समझकर उन्हें पार्टी में शामिल किया गया था। चौधरी का नाम न तो मामले से जुड़ी एफआईआर में और न ही आरोपपत्र में था।
चौधरी से पहले सीआईडी और बाद में सीबीआई ने पूछताछ की थी लेकिन कभी मामले में आरोपी नहीं बनाया गया। मामला ट्रायल कोर्ट में लंबित है।
चौधरी आदिवासी बहुल पालघर में राकांपा के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और 2014 में डहाणु विधानसभा सीटी से चुनाव भी लड़ चुके हैं।